लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से व्यंजना आर्ट एंड कल्चर सोसायटी द्वारा ‘भारतीय रंगमंच की संगीत परंपरा एवं प्रयोग’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन नौटंकी विधा पर पदमश्री पंडित रामदयाल शर्मा नौटंकी ने कहा कि नौटंकी का मूल रूप आज निश्चित रूप से विलुप्त हो रही है, नौटंकी का उद्देश्य मनोरंजन करना जितना है, उससे ज्यादा जनसंदेश देना है।
डॉ. विद्या बिंदु सिंह ने कहा नक्टौरा में जब पहले के समय में पुरुष चले जाते थे, जो स्त्रियां घर पर रहती थीं वह गारी गाती थी, हास-व्यंग्य, गाना नाचना करती थी, उनका मानना था कि आसुरी शक्तियां चली जाती हैं, साथ ही साथ इन्हीं माध्यमों से वह अपने मन की व्यथाएं, अपने विचार भी कह जाती थीं।
डाॅ. धनंजय चोपड़ा ने कहा जब भाषा संवाद के लिए नहीं भी आई होगी, उसके पहले का संवाद का पहला माध्यम था कठपुतली रही होगी और उन्होंने अलग-अलग प्रदेशों के कठपुतलियों के बारे में विस्तार से बताया।
डॉ. के.सी. मालू राजस्थान के लोकनाट्य के बारे में विस्तार से बताया। दयाराम ने ख्याल एवं दिलीप भट्ट ने तमाशा का परिचय व उसके प्रयोग बताया और सत्र का समापन प्रख्यात कलाकार संजय उपाध्याय जी ने बिदेसिया लोकनाट्य के बारे में बताया।
उक्त जानकारी मयंक श्रीवास्तव दी है।
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