Tuesday, July 7, 2026
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विजन 2035 के तहत भारत-यूके रिश्तों को नई उड़ान, व्यापार और टेक्नोलॉजी साझेदारी पर हुआ फोकस

मुंबई (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने गुरुवार को मुंबई में ऐतिहासिक मुलाकात की। यह बैठक भारत-यूके “विजन 2035 रोडमैप” के तहत दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक सहयोग को और सुदृढ़ करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है। दोनों नेताओं की चर्चा में व्यापार, निवेश, रक्षा, सुरक्षा, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन और शिक्षा के क्षेत्र में साझेदारी को विस्तार देने पर विशेष जोर रहा।

दोनों देशों के बीच हुई वार्ता के दौरान सीईओ फोरम और ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2025 में सहभागिता को लेकर भी विचार-विमर्श हुआ। ब्रिटिश प्रधानमंत्री अपने साथ ब्रिटेन के 125 शीर्ष उद्योगपतियों, निवेशकों और शिक्षाविदों के प्रतिनिधिमंडल के साथ दो दिवसीय भारत यात्रा पर पहुंचे हैं।

यह यात्रा उस ऐतिहासिक पल के बाद हो रही है जब ढाई महीने पहले भारत और ब्रिटेन ने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते से न केवल शुल्कों में कमी आएगी, बल्कि दोनों देशों के बीच बाजार पहुंच बढ़ेगी और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार दोगुना होने की उम्मीद जताई जा रही है।

प्रधानमंत्री मोदी की जुलाई में लंदन यात्रा के दौरान इस व्यापारिक समझौते को अंतिम रूप दिया गया था। ब्रिटिश पीएम स्टार्मर ने इसे दोनों देशों के आर्थिक विकास का “लॉन्चपैड” बताते हुए कहा कि “यह केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि भविष्य की समृद्धि का आधार है।” उन्होंने विश्वास जताया कि भारत 2028 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है और इस साझेदारी से दोनों देशों को अप्रत्याशित अवसर मिलेंगे।

भारत की ओर से वार्ता में ब्रिटेन की भूमि से संचालित कुछ खालिस्तान समर्थक गतिविधियों पर चिंता जताने के साथ-साथ विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे आर्थिक अपराधियों के शीघ्र प्रत्यर्पण का मुद्दा भी प्रमुख रूप से उठाए जाने की संभावना है।

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अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाओं पर इलाहाबाद HC की गहन पड़ताल

KGMU व प्रदेश के अस्पतालों की सुविधाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, मांगी विस्तृत रिपोर्ट

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों की स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर रुख अपनाते हुए विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। अदालत ने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) समेत सभी सरकारी अस्पतालों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उनके पास वर्तमान में कितने वेंटिलेटर उपलब्ध हैं और वास्तविक आवश्यकता कितनी है।

हाईकोर्ट ने इस संबंध में KGMU प्रशासन को शपथपत्र (हलफनामा) दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही राज्य सरकार और संबंधित अस्पतालों से भी पूरी जानकारी एवं आंकड़े प्रस्तुत करने को कहा गया है।

अदालत ने कहा कि जनहित याचिका के माध्यम से उठाए गए स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े मुद्दे पर पारदर्शिता आवश्यक है ताकि जनता को वास्तविक स्थिति की जानकारी मिल सके। मामले की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर को होगी, जिसमें दाखिल रिपोर्टों के आधार पर आगे की कार्यवाही तय की जाएगी।

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मऊ (राष्ट्र की परम्परा)

मऊ जनपद के मधुबन थाना क्षेत्र में तैनात उपनिरीक्षक एवं कस्बा इंचार्ज उमरान खान को भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के चलते पुलिस अधीक्षक (एसपी) इलामारन जी ने निलंबित कर दिया है। दरोगा पर आरोप था कि उन्होंने एक बाइक छोड़ने के नाम पर वाहन स्वामी से दो हजार रुपये की मांग की थी। इस पूरी घटना का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया।

🚨 मामला क्या है

जानकारी के अनुसार, नवरात्रि मेले के दौरान मधुबन-दुबारी रोड पर स्थित बौला पुल के पास दो बाइकों में टक्कर हो गई थी। हादसे में कोई घायल नहीं हुआ, लेकिन एक बाइक बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। दूसरी बाइक सवार मौके से फरार हो गया। उपनिरीक्षक उमरान खान मौके पर पहुंचे और क्षतिग्रस्त बाइक को थाने ले आए।

कई दिनों तक जब कोई शिकायत या दावेदारी नहीं आई तो बाइक स्वामी ने वाहन वापस लेने की गुहार लगाई। आरोप है कि बाइक स्वामी से दरोगा ने दो हजार रुपये की मांग की। पीड़ित ने जब एक स्थानीय पत्रकार से मदद मांगी तो पत्रकार ने भी उपनिरीक्षक से बाइक छोड़ने का अनुरोध किया, लेकिन पैसे की मांग फिर भी जारी रही।

🎙️ वायरल हुआ ऑडियो, जांच में हुई पुष्टि

दरोगा द्वारा पैसे लेने और वापस करने का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही एसपी इलामारन ने मामले को गंभीरता से लिया और सीओ अभय कुमार सिंह को जांच सौंप दी। जांच रिपोर्ट में रिश्वतखोरी की पुष्टि होने के बाद बुधवार की देर शाम एसपी ने दरोगा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।

⚖️ एसपी ने दिए सख्त निर्देश

एसपी इलामारन ने कहा कि “भ्रष्टाचार किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विभाग की छवि धूमिल करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”
एसपी की इस कार्रवाई के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप मचा हुआ है।

📍 स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया

स्थानीय नागरिकों ने एसपी की इस कार्रवाई की सराहना की है और कहा कि ऐसे कदम पुलिस की साख और जनता का भरोसा बढ़ाने में मदद करेंगे।

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लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। प्रदेश के राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) में पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सर्टिफिकेट धारकों को इंजीनियरिंग डिग्रीधारकों के समकक्ष मानते हुए अनुदेशक एवं फोरमैन को प्रधानाचार्य बना दिया गया। इस अनियमित पदोन्नति की शिकायत के बाद अब प्रशिक्षण निदेशालय ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच शुरू कर दी है।

सूत्रों के अनुसार, निदेशालय ने ऐसे 18 प्रधानाचार्यों को 10 अक्टूबर को अभिलेखों सहित वित्त नियंत्रक कार्यालय, निदेशालय लखनऊ में तलब किया है। यह सभी अधिकारी प्रदेश के विभिन्न जिलों में कार्यरत हैं।

इनमें चंदौली, बदायूं (बिसौली), संत कबीर नगर (मेहदावल), बागपत (खेकड़ा), कासगंज, औरैया (अजीतमल), रायबरेली (ऊंचाहार), कौशांबी (सिराथू), सिद्धार्थनगर (नौगढ़), उन्नाव (फतेहपुर चौरासी, पुरवा), लखनऊ (मोहनलालगंज), जालौन (कोंच), हापुड़, कानपुर (कल्याणपुर), अमरोहा, बदायूं एवं झांसी के आईटीआई प्रधानाचार्य शामिल बताए जा रहे हैं।

नियमों के अनुसार प्रधानाचार्य पद के लिए इंजीनियरिंग में डिग्री अनिवार्य है, जबकि कई पदोन्नत अधिकारियों के पास केवल तकनीकी सर्टिफिकेट हैं। शिकायतों के आधार पर न्यायालय में मामला विचाराधीन है और अब जांच से कई बड़े नामों के खुलासे की संभावना जताई जा रही है।

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शमी ने तोड़ी चुप्पी: कहा- चयन मेरे हाथ में नहीं; गिल बने नए वनडे कप्तान पर दी प्रतिक्रिया

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नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। भारत के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी ने लंबे समय बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट पर अपनी राय व्यक्त की। 2025 चैंपियंस ट्रॉफी के बाद से शमी भारत के लिए नहीं खेले हैं। हालांकि, उन्होंने आईपीएल और घरेलू क्रिकेट में बंगाल की तरफ नियमित प्रदर्शन किया, फिर भी उन्हें हाल ही में ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए वनडे और टी20 टीम में शामिल नहीं किया गया।

चयन पर शमी का बयान

शमी ने अपने यूट्यूब चैनल पर कहा, “बहुत सारी अफवाहें और मीम्स बन रहे हैं। लोग जानना चाहते हैं कि मैं ऑस्ट्रेलिया सीरीज में क्यों नहीं हूं। लेकिन चयन मेरे हाथ में नहीं, यह चयन समिति, कोच और कप्तान का फैसला है। अगर उन्हें लगे कि मुझे मौका देना चाहिए तो देंगे, वरना नहीं। मैं तैयार हूं और लगातार अभ्यास कर रहा हूं।”

फिटनेस और वापसी की तैयारी

शमी ने अपनी फिटनेस पर अपडेट देते हुए कहा, “मेरी फिटनेस पूरी तरह ठीक है। मैंने दलीप ट्रॉफी में खेला, 35 ओवर गेंदबाजी की और लय भी सुधारी। मैदान पर लौटने के लिए तैयार हूं।”

गिल-रोहित कप्तानी विवाद पर शमी की राय

हाल ही में बीसीसीआई ने रोहित शर्मा को वनडे कप्तानी से हटाकर शुभमन गिल को नया कप्तान बनाया। इस पर शमी ने कहा, “कप्तानी को लेकर किसी को आपत्ति नहीं करनी चाहिए। शुभमन ने इंग्लैंड में भारत की कप्तानी की है और गुजरात टाइटंस के कप्तान भी हैं। किसी को तो यह जिम्मेदारी देनी ही थी, और बोर्ड ने गिल को चुना है, तो हमें इसे स्वीकार करना चाहिए।”

शमी ने आगे कहा, “कप्तानी का यह चक्र चलता रहेगा। आज कोई कप्तान है, कल कोई और होगा। यह एक निरंतर प्रक्रिया है।”

25 नवंबर को अयोध्या में गूंजेगा ‘जय श्रीराम’, सीतारमण ने संभाली तैयारियों की कमान

“अयोध्या में निर्मला सीतारमण का विशेष दौरा: रामलला के दर्शन के बाद ध्वजारोहण कार्यक्रम की तैयारियों पर उच्चस्तरीय मंथन”

अयोध्या। (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)देश की केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज धार्मिक नगरी अयोध्या के दौरे पर हैं। उन्होंने सुबह तड़के 4 बजे श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में होने वाली मंगला आरती में सम्मिलित होकर भगवान श्रीरामलला के दर्शन-पूजन किए। आरती के बाद सीतारमण ने राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र परिसर में अधिकारियों और ट्रस्ट पदाधिकारियों के साथ बैठक की।

सूत्रों के अनुसार, बैठक में आगामी 25 नवंबर को प्रस्तावित ध्वजारोहण कार्यक्रम की तैयारियों पर विस्तृत चर्चा की जा रही है। यह ध्वजारोहण न केवल मंदिर के निर्माण पूर्ण होने का प्रतीक होगा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम के माध्यम से विश्व को अयोध्या के भव्य स्वरूप का साक्षी बनने का अवसर मिलेगा।

वित्त मंत्री ने मंदिर परिसर का निरीक्षण करते हुए विभिन्न व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उन्होंने आयोजन से जुड़े सुरक्षा, यातायात और श्रद्धालु प्रबंधन से संबंधित बिंदुओं पर अधिकारियों से सुझाव भी मांगे।

रामलला के मंदिर में ध्वजारोहण कार्यक्रम को लेकर होने वाली यह उच्चस्तरीय बैठक आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा तय करने में निर्णायक साबित होगी। अयोध्या में इस समय आध्यात्मिक आस्था और प्रशासनिक सतर्कता का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।

🛕 गोरखपुर में सीएम योगी का दो दिवसीय प्रवास: श्रद्धांजलि, जनसंपर्क और स्वदेशी मेले का शुभारंभ

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज दो दिवसीय प्रवास पर अपने गृह जनपद गोरखपुर पहुंच रहे हैं। उनका यह दौरा धार्मिक, सामाजिक और जनसंपर्क गतिविधियों से परिपूर्ण रहेगा।
शाम 5 बजे मुख्यमंत्री गोरखनाथ मंदिर में पहुंचकर आशीर्वाद लेंगे और वहीं रात्रि विश्राम करेंगे। इसके उपरांत वे महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अध्यक्ष रहे प्रोफेसर यूपी सिंह की श्रद्धांजलि सभा में शामिल होंगे। प्रो. सिंह शिक्षा जगत में अपने योगदान के लिए सदैव याद किए जाएंगे।

दौरे के दूसरे दिन सीएम योगी प्रातःकालीन पूजा-अर्चना और गौ-सेवा के बाद जनता दर्शन कार्यक्रम में लोगों की समस्याएं सुनेंगे। इसके पश्चात वे रामगढ़ताल क्षेत्र में आयोजित गोरखपुर महोत्सव स्थल पहुंचकर स्वदेशी मेले का शुभारंभ करेंगे।
यह मेला 10 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक चलेगा, जिसमें स्थानीय उत्पादों, कुटीर उद्योगों और स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान रहेगा। मुख्यमंत्री का यह दौरा जनसेवा और आत्मनिर्भर भारत की भावना को प्रोत्साहित करने वाला माना जा रहा है।

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🕯️ इतिहास के दीपस्तंभ: 9 अक्टूबर को बुझी तीन महान विभूतियों की ज्योति

(सैफ़ुद्दीन किचलू, कांशीराम और रवीन्द्र जैन — भारत की आत्मा के तीन उजले चेहरे)

🌺 विशेष: आज के दिन भारत ने तीन महान विभूतियों को खोया — जिन्होंने देश की आत्मा को स्वतंत्रता, समानता और संगीत की स्वर लहरियों में ढाला।

🇮🇳 सैफ़ुद्दीन किचलू (15 जनवरी 1888 – 9 अक्टूबर 1988)
स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक सेनानी और राष्ट्रवादी चिंतक

सैफ़ुद्दीन किचलू का जन्म 15 जनवरी 1888 को अमृतसर (पंजाब) के प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार में हुआ था। वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड और जर्मनी गए, जहां से उन्होंने कानून और दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की। लौटने के बाद उन्होंने वकालत छोड़कर खुद को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में समर्पित कर दिया।
1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड से पूर्व उन्होंने रौलेट एक्ट के विरोध में एक शांतिपूर्ण सभा आयोजित की थी, जिसमें उनकी गिरफ्तारी ने जनआक्रोश को जन्म दिया। उनकी गिरफ्तारी और शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों ने जो गोलीबारी की, वह भारतीय इतिहास की सबसे क्रूर घटनाओं में से एक बन गई।
किचलू जी अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सक्रिय सदस्य रहे। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बताया। उनके जीवन का एक प्रेरक प्रसंग यह है कि जलियांवाला बाग के बाद जब उन्हें जेल से रिहा किया गया, तो उन्होंने कहा—
“मैंने गांधी को नहीं देखा, परंतु उनके विचारों से भारत की आत्मा को महसूस किया।”
वे कम्यूनिस्ट विचारधारा से भी प्रभावित हुए और बाद के वर्षों में उन्होंने शांति आंदोलन तथा भारत-सोवियत मैत्री में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1988 में 100 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। वे इस बात के प्रतीक बने कि शिक्षा, राष्ट्रभक्ति और एकता के माध्यम से भी आज़ादी की लौ जल सकती है।
कांशीराम (15 मार्च 1934 – 9 अक्टूबर 2006)
दलित चेतना के पुरोधा और सामाजिक क्रांति के शिल्पी

कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रूपनगर (अब रोपड़) जिले के छोटे से गांव खवासपुर में हुआ था। उनका परिवार अनुसूचित जाति वर्ग से था, और बचपन से उन्होंने सामाजिक भेदभाव का अनुभव किया। वे विज्ञान स्नातक थे और डी.आर.डी.ओ. (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत थे।
लेकिन एक घटना ने उनकी जीवन दिशा बदल दी। एक दलित कर्मचारी को केवल जाति के कारण अन्याय का शिकार होते देख कांशीराम ने नौकरी छोड़ दी और समाज सेवा को अपना लक्ष्य बना लिया। 1978 में उन्होंने BAMCEF (Backward and Minority Communities Employees Federation) की स्थापना की, जो दलित–पिछड़े कर्मचारियों के अधिकारों की आवाज बनी।
1981 में उन्होंने DS-4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) बनाई और 1984 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) की स्थापना की। उनका नारा “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।”
समानता और राजनीतिक भागीदारी की क्रांति बन गया।
कांशीराम ने डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों को जन-जन तक पहुंचाया। उनके जीवन का एक उल्लेखनीय प्रसंग यह है कि 1983 में जब वे बीमार पड़े, तब भी उन्होंने मंच पर कहा —
“मैं मरूंगा तो दलितों के बीच, जीऊंगा तो उनके लिए।”
2006 में लम्बी बीमारी के बाद उनका निधन हुआ, परंतु उन्होंने जो सामाजिक चेतना जगाई, वह आज भी लाखों दिलों में धड़कती है।
🎵 रवीन्द्र जैन (28 फरवरी 1944 – 9 अक्टूबर 2015)
दृष्टिहीनता के बावजूद स्वर-साम्राज्य के निर्माता

संगीतकार, गायक और गीतकार रवीन्द्र जैन का जन्म 28 फरवरी 1944 को अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) के एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जन्म से दृष्टिहीन होने के बावजूद, उनके पिता पंडित इन्द्रमणि जैन ने उन्हें संगीत की शिक्षा दी और उनकी प्रतिभा को पहचाना।
रवीन्द्र जैन ने बचपन से ही हारमोनियम और स्वर साधना में अद्भुत दक्षता प्राप्त की। 1970 के दशक में बंबई (अब मुंबई) पहुंचे और ‘चोर मचाए शोर’ (1974) फिल्म से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। इसके बाद उन्होंने ‘गीत गाता चल’, ‘अंखियों के झरोखों से’, ‘राम तेरी गंगा मैली’, ‘विवाह’, ‘नदिया के पार’ जैसी फिल्मों में संगीत दिया।
उनके गीतों में भक्ति, लोकसंगीत और शास्त्रीय संगीत का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। दूरदर्शन के ऐतिहासिक धारावाहिक ‘रामायण’ (1987) में उनका संगीत भारतीय संस्कृति का स्वर बन गया।
एक प्रेरक घटना यह है कि एक बार राज कपूर ने उनसे कहा—
“तुम्हारी दृष्टि नहीं है, पर तुम्हारे संगीत में वो दृष्टि है जो हममें किसी में नहीं।”
9 अक्टूबर 2015 को मुंबई में उनका निधन हुआ। लेकिन उनका संगीत आज भी भारतीय आत्मा का हिस्सा है।
🪔 तीनों में समानता — एक राष्ट्र आत्मा के तीन आयाम
तीनों विभूतियों में भले ही क्षेत्र अलग-अलग रहे—किचलू राजनीति में, कांशीराम समाज परिवर्तन में, और रवीन्द्र जैन संगीत में—परंतु तीनों की आत्मा में एक ही तत्व था:
संघर्ष, समर्पण और सृजन
9 अक्टूबर भारत के इतिहास में केवल तीन मृत्यु तिथियां नहीं हैं, बल्कि तीन युगों का स्मारक है—
एक ने स्वतंत्रता को स्वर दिया,
दूसरे ने समानता को स्वरूप दिया,
और तीसरे ने संगीत में संस्कार का भाव भरा।
इन तीनों दीपों की ज्योति आज भी भारत के हर हृदय में जल रही है।

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🇮🇳 “जब नागरिक बनें सैनिक: भारतीय प्रादेशिक सेना की अद्भुत यात्रा”

🇮🇳 “कर्तव्य, समर्पण और शौर्य की जीवंत मिसाल — भारतीय प्रादेशिक सेना: मातृभूमि की अदृश्य ढाल”


✍️ लेखक— राजकुमार मणि
🪖 भारत का गौरव उसकी सेना है, और सेना का अभिन्न अंग है — भारतीय प्रादेशिक सेना (Territorial Army)। यह न तो केवल एक यूनिफॉर्मधारी संगठन है, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा, अनुशासन और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। हर वर्ष 9 अक्टूबर को “भारतीय प्रादेशिक सेना दिवस (Territorial Army Day)” मनाया जाता है — यह वह दिन है जब देश उन वीर सपूतों को नमन करता है, जो अपने नागरिक जीवन में डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक या व्यापारी होते हुए भी देश की रक्षा हेतु वर्दी धारण करते हैं।

🇮🇳 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय प्रादेशिक सेना की नींव 9 अक्टूबर 1949 को रखी गई थी।
हालांकि इसकी अवधारणा ब्रिटिश काल में वर्ष 1920 में ‘Territorial Force Act’ के तहत आरंभ हुई थी।
आज़ादी के बाद जब भारत ने अपनी सुरक्षा प्रणाली को स्वदेशी रूप में मजबूत करने का निश्चय किया, तब इसे भारतीय प्रादेशिक सेना (Indian Territorial Army) नाम से पुनर्गठित किया गया।
इसका उद्देश्य था — “राष्ट्रीय सुरक्षा में सहयोग करते हुए, आपातकाल या संकट की स्थिति में भारतीय सेना को सहायता प्रदान करना।”
⚔️ संगठन की संरचना
भारतीय प्रादेशिक सेना, भारतीय सेना का स्वयंसेवी रिजर्व घटक (Volunteer Reserve Component) है।
यह सेना के सक्रिय कर्मियों की तरह ही कार्य करती है, लेकिन इसके सदस्य आमतौर पर अपने नागरिक व्यवसायों में भी सक्रिय रहते हैं।
इनकी यूनिटें मुख्यतः चार श्रेणियों में विभाजित हैं।

  1. इन्फैंट्री यूनिट्स – सीमाओं की सुरक्षा और आपातकालीन स्थितियों में सेना की सहायता।
  2. रेलवे यूनिट्स – संकट के समय रेल संचार को बनाए रखना।
  3. ऑयल और एनर्जी सेक्टर यूनिट्स – ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना।
  4. इंजीनियरिंग और मेडिकल यूनिट्स – आपदा, बाढ़ या भूकंप के समय राहत कार्यों में भागीदारी।
    🫡 भूमिका और योगदान
    प्रादेशिक सेना का मुख्य ध्येय है — “हर नागरिक सैनिक बने, हर सैनिक नागरिक जिम्मेदारी निभाए।”
    देश की रक्षा में इसका योगदान बहुआयामी रहा है।
    1962, 1965 और 1971 के युद्धों में Territorial Army के जवानों ने मोर्चे पर बहादुरी से हिस्सा लिया।
    1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी इनकी टुकड़ियों ने आपूर्ति और समर्थन व्यवस्था को संभाला।
    प्राकृतिक आपदाओं — जैसे भूकंप, बाढ़ और चक्रवात — में Territorial Army ने राहत एवं पुनर्वास कार्यों में अमूल्य योगदान दिया।
    आंतरिक सुरक्षा, विद्रोह नियंत्रण, और राष्ट्रीय एकता अभियानों में इनका योगदान उल्लेखनीय रहा है।
    🪔 आज की भूमिका — आधुनिक भारत में TA की प्रासंगिकता
    वर्तमान भारत तेज़ी से विकसित हो रहा है। ऐसे में प्रादेशिक सेना की भूमिका पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
    यह संगठन नागरिक समाज और सशस्त्र बलों के बीच एक सुनहरी कड़ी (Golden Bridge) का कार्य करता है।
    कॉर्पोरेट सेक्टर, सरकारी संस्थान, निजी उद्योग, सभी से लोग इस सेना में स्वयंसेवा करते हैं।
    यह आधुनिक भारत के उस आदर्श को साकार करती है, जिसमें “राष्ट्र पहले, मैं बाद में” की भावना जीवित है।
    🌍 पर्यावरण और सामाजिक योगदान
    कम लोग जानते हैं कि प्रादेशिक सेना न केवल हथियार चलाती है, बल्कि पर्यावरण की रक्षा में भी अग्रणी है।
    “इको टास्क फोर्सेस (Eco Task Forces)” की स्थापना के माध्यम से इस सेना ने वनरोपण, भूमि पुनर्वास, और जल संरक्षण में ऐतिहासिक कार्य किए हैं।
    इस योगदान के लिए भारतीय प्रादेशिक सेना को कई बार राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया है।
    🏅 वीरता और सम्मान
    प्रादेशिक सेना के जवानों ने समय-समय पर अपनी वीरता का परिचय दिया है।
    कई सैनिकों को शौर्य चक्र, सेना मेडल, और विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया गया है।
    ये पुरस्कार केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे संगठन की प्रतिबद्धता और गौरव का प्रतीक हैं।
    🧭 नागरिक जीवन और सैनिक अनुशासन का संगम
    भारतीय प्रादेशिक सेना का एक अनोखा पहलू यह है कि इसमें शामिल व्यक्ति अपने पेशेवर जीवन में भी सक्रिय रहते हैं।
    वे डॉक्टर, व्यापारी, इंजीनियर, शिक्षक या पत्रकार हो सकते हैं — परंतु जब देश पुकारता है, तो वही व्यक्ति एक सैनिक के रूप में मोर्चे पर खड़ा दिखाई देता है।
    यह संगठन बताता है कि देशभक्ति केवल सीमा तक सीमित नहीं, बल्कि यह हमारे हर कर्म, हर जिम्मेदारी में झलकनी चाहिए।
    🕊️ प्रेरणा का स्रोत
    भारतीय प्रादेशिक सेना आज के युवाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत है।
    यह सिखाती है कि राष्ट्रसेवा के लिए केवल बंदूक नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति, अनुशासन और समर्पण भी जरूरी है।
    यही कारण है कि हर वर्ष Territorial Army Day पर पूरे देश में कार्यक्रम, परेड, और प्रेरणादायक समारोह आयोजित किए जाते हैं।
    🩵 निष्कर्ष
    भारतीय प्रादेशिक सेना, भारत की संकल्प, साहस और सेवा भावना का जीवंत उदाहरण है।
    इस सेना के सैनिक दिखाते हैं कि राष्ट्र की रक्षा केवल सीमा पर नहीं, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में संभव है।
    9 अक्टूबर का यह दिवस हमें याद दिलाता है कि “जब तक देश की माटी की खुशबू सांसों में बसी है, तब तक राष्ट्ररक्षा हमारा परम कर्तव्य है।”
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‘बिग बॉस कन्नड़ 12’ का घर हटाया गया था, अब बैन हुआ खत्म; किच्चा सुदीप ने डिप्टी CM का किया धन्यवाद

मनोरंजन (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। कर्नाटक में सुपरस्टार किच्चा सुदीप का शो ‘बिग बॉस कन्नड़ सीजन 12’ चर्चा में है। हाल ही में पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के कारण शो का बिग बॉस घर सील कर दिया गया था। अब डिप्टी CM डी के शिवकुमार के हस्तक्षेप के बाद शो के सेट को फिर से खोलने की अनुमति मिल गई है।

क्या था मामला?

बेंगलुरु के बिदादी इलाके में स्थित जॉलीवुड स्टूडियोज में शूटिंग चल रही थी। कर्नाटक स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (KSPCB) ने स्टूडियो का निरीक्षण किया और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बंद होने और बिना अनुमति जनरेटर के उपयोग की शिकायत पाई। इसके बाद बेंगलुरु साउथ डिस्ट्रिक्ट प्रशासन ने पुलिस और KSRP फोर्स की मौजूदगी में स्टूडियो को सील कर दिया। सभी कंटेस्टेंट्स को ईगलटन रिजॉर्ट में शिफ्ट किया गया और मोबाइल तथा टीवी का उपयोग प्रतिबंधित किया गया।

सरकार की दखलअंदाजी

डिप्टी CM डी के शिवकुमार ने हस्तक्षेप कर बिग बॉस 12 के सेट से सील हटाने के आदेश दिए। उन्होंने कहा कि मनोरंजन उद्योग को नियमों का पालन करते हुए काम करने का अवसर मिलेगा और पर्यावरण की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

किच्चा सुदीप की प्रतिक्रिया

शो के होस्ट किच्चा सुदीप ने ट्वीट कर डीके शिवकुमार और सभी अधिकारियों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि बिग बॉस टीम ने इस मुद्दे में पूरी तरह सहयोग किया और अब शो अपने निर्धारित समय पर जारी रहेगा।

चेतावनी पहले भी मिल चुकी थी

वन, पारिस्थितिकी और पर्यावरण मंत्री ईश्वर खांदरे ने बताया कि स्टूडियो को 8 मार्च और 11 जून 2024 को दो बार नोटिस भेजा गया था, लेकिन नियमों का पालन न होने के कारण सख्त कार्रवाई करनी पड़ी।

💌 “जब चिट्ठी बनती थी दिल की धड़कन — जानिए डाक का वो अमर सफर”

✉️ “संदेश से संबंध तक: विश्व डाक दिवस—भरोसे की वो डोर जो हर दिल को जोड़ती है”

🌍 परिचय: डाक—मनुष्यता की अदृश्य कड़ी
हर रिश्ते की डोर किसी न किसी संदेश से जुड़ी होती है। कभी चिट्ठी में स्याही की खुशबू थी, तो आज ईमेल और इंस्टेंट मैसेज की तात्कालिकता है। लेकिन इस पूरे संचार-सफर की जड़ में जो संस्था है — वह है डाक व्यवस्था (Postal System)।
हर वर्ष 9 अक्टूबर को ‘विश्व डाक दिवस (World Post Day)’ मनाया जाता है, ताकि विश्व के हर नागरिक को डाक सेवाओं के महत्व, उनके योगदान और परिवर्तनशील स्वरूप से परिचित कराया जा सके।
🕰️ इतिहास की झलक: डाक व्यवस्था का जन्म
विश्व डाक दिवस की नींव 9 अक्टूबर 1874 को स्विट्ज़रलैंड के बर्न में पड़ी, जब यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (UPU) की स्थापना हुई। यह संगठन 192 सदस्य देशों के बीच डाक सेवाओं को एकीकृत करने और सुचारू संचार का पुल बनने का कार्य करता है।
1969 में टोक्यो में आयोजित UPU कांग्रेस ने इस तिथि को “विश्व डाक दिवस” के रूप में घोषित किया। इसका उद्देश्य था — दुनिया को यह एहसास कराना कि डाक केवल पत्र नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कृति और सभ्यता का माध्यम है।
📮 भारत की डाक सेवा: ‘लाल डिब्बे’ से डिजिटल तक
भारत की डाक सेवा का इतिहास भी गौरवशाली है। 1852 में भारत में पहला डाक टिकट जारी हुआ — जिसका नाम था ‘सिंध डॉक’।
फिर 1854 में ‘भारत डाक विभाग’ की औपचारिक स्थापना हुई।
वक्त के साथ लाल डिब्बे से लेकर डिजिटल इंडिया तक डाक ने सफर तय किया है। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा डाक नेटवर्क रखता है, जिसमें 1.56 लाख से अधिक डाकघर शामिल हैं — जिनमें से लगभग 90% ग्रामीण इलाकों में हैं।
🧭 बदलते युग में डाक का स्वरूप
जहां पहले चिट्ठी का इंतजार हफ्तों तक किया जाता था, वहीं अब क्लिक भर में संदेश पहुंच जाता है।
लेकिन, डाक विभाग ने अपने स्वरूप को बदलते समय के अनुसार ढाला है —स्पीड पोस्ट ने गति दी।
ई-पोस्ट ने ई-मेल का विकल्प बनाया।
इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक ने गांव-गांव तक बैंकिंग पहुंचाई।
और डिजिटल पार्सल ट्रैकिंग ने पारदर्शिता बढ़ाई।
डाक केवल संदेश नहीं पहुंचाता, बल्कि सरकारी योजनाओं, पेंशन, ई-कॉमर्स पार्सल और डिजिटल सेवाओं का भी सबसे भरोसेमंद माध्यम बन गया है।
💌 डाकिया—भावना का दूत
कभी वह बस एक कर्मचारी नहीं था, बल्कि भावनाओं का संदेशवाहक था।डाकिया गांव में आते ही बच्चे, बूढ़े और औरतें उत्सुकता से दौड़ पड़ते थे।उसके थैले में सिर्फ कागज नहीं होते थे — उनमें होती थीं उम्मीदें, प्रेम, समाचार और कभी-कभी आंसू।
आज तकनीक के इस युग में भी डाकिया अपने नए स्वरूप में गांव-गांव तक डिजिटल सशक्तिकरण का प्रतीक है।
🌐 विश्व डाक संघ (UPU): विश्व को जोड़े रखने वाली संस्था यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (UPU) का मुख्यालय बर्न, स्विट्ज़रलैंड में है। यह संस्था न केवल अंतरराष्ट्रीय डाक सेवाओं को नियंत्रित करती है, बल्कि सदस्य देशों के बीच संचार नीतियों, तकनीकी सहयोग और वित्तीय सेवाओं के आदान-प्रदान में भी मदद करती है।
इस वर्ष का थीम है —“Innovation, Inclusion, and Integration”यानि “नवाचार, समावेशन और एकीकरण” — ताकि हर व्यक्ति तक संचार की पहुंच सुनिश्चित की जा सके।
💫 वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता
आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल पेमेंट, और ब्लॉकचेन डिलीवरी सिस्टम की ओर बढ़ रही है, डाक व्यवस्था ने अपने मिशन को विश्वसनीयता और मानवीय जुड़ाव के साथ बनाए रखा है।
डाक सिर्फ सेवा नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक है।
किसी गांव में पेंशन पहुंचाना हो, किसान को बीमा राशि देनी हो, या बच्चे को जन्म प्रमाण पत्र — डाक ही वह माध्यम है जो सरकार और नागरिक के बीच सेतु बनकर खड़ा है।
🇮🇳 भारत में ‘विश्व डाक दिवस’ समारोह
भारत में इस दिन को विविध कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों, प्रतियोगिताओं और जनजागरूकता अभियानों के माध्यम से मनाया जाता है।
डाक कर्मचारी सम्मानित किए जाते हैं, बच्चों को डाक सेवाओं के महत्व से परिचित कराया जाता है।
डाक टिकट प्रदर्शनी, पत्र लेखन प्रतियोगिता, और डिजिटल पोस्ट कार्यशालाएं इस दिन की पहचान बन गई हैं।
🕊️ डाक टिकट: देश की पहचान का सूक्ष्म प्रतीक
हर डाक टिकट अपने भीतर किसी देश की संस्कृति, उपलब्धि, और ऐतिहासिक गौरव को समेटे होता है।
भारत ने स्वतंत्रता सेनानियों से लेकर वैज्ञानिकों तक, महाकाव्यों से लेकर स्मारकों तक पर अनगिनत डाक टिकट जारी किए हैं।
यह केवल संग्रह की वस्तु नहीं, बल्कि इतिहास का जीवंत दस्तावेज़ हैं।
💡 भविष्य की दिशा: डिजिटल और हरित डाक
भविष्य की डाक सेवा “ग्रीन पोस्टल मिशन” की ओर अग्रसर है —
पेपरलेस ई-बिलिंग ,इलेक्ट्रिक वाहन आधारित डिलीवरी
सोलर एनर्जी संचालित पोस्ट ऑफिस ,और स्मार्ट पार्सल लॉजिस्टिक्स सिस्टम ,ये पहलें डाक व्यवस्था को पर्यावरण अनुकूल और तकनीकी रूप से सशक्त बना रही हैं।
🕯️ निष्कर्ष: संबंधों का अमर धागा
डाक सिर्फ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि दिलों का संवाद है।
यह वो माध्यम है जिसने दूरी मिटाई, पीढ़ियों को जोड़ा और संस्कृति को सहेजा। डिजिटल युग में भी, डाक की विश्वसनीयता, अपनापन और भावना की सच्चाई कभी नहीं मिटेगी।
इसलिए आज भी जब कोई पत्र किसी हाथ में पहुंचता है, तो उस पर लिखा हर शब्द विश्वास की अमिट छाप छोड़ जाता है।

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बिजली विभाग की लापरवाही: करंट हादसे में दो घरों के 5 लोग मृत, दो मासूम भाइयों की भी गई जान

झांसी (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। झांसी के आजादपुरा मोहल्ले में सुबह करीब पांच बजे, घर की दीपावली सफाई के दौरान प्रवीण (26) छज्जे की सफाई कर रहा था। इसी दौरान सरिया हाईटेंशन लाइन से टकरा गया और करंट लगने से प्रवीण घायल हो गया। उसकी मां रंजना (50) और दादी विमला (77) उसे बचाने दौड़ीं और वे भी करंट की चपेट में आ गईं। तीनों को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन कुछ देर बाद उनकी मौत हो गई।

चिरगांव में दो मासूमों की मौत

शाम चार बजे चिरगांव थाना क्षेत्र के बिठरी गांव में दो सगे भाई मयंक (5) और आरव (3) अवैध रूप से खींची गई विद्युत लाइन की चपेट में आ गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

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बिजली विभाग की लापरवाही और जिम्मेदारी

विद्युत वितरण खंड ग्रामीण के उपखंड अधिकारी अक्षय कुमार ने बताया कि प्रतिबंधित सफेद तार से करंट लगने के कारण यह हादसा हुआ। यह घटना बिजली विभाग की लापरवाही को उजागर करती है, क्योंकि सफेद तार का उपयोग पहले से ही प्रतिबंधित है।

परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

हादसे के समय परिवार दीपावली की तैयारियों में व्यस्त था। प्रवीण की शादी की तैयारियां जोरों पर थीं। पिता दया किशोर और बहन दीक्षा हादसे के दृश्य से सदमे में हैं।

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पुलिस ने दर्ज की FIR

एसएसपी बीबीजीटीएस मूर्ति ने बताया कि आजादपुर मोहल्ले में हुई घटना के मामले में बिजली विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों के खिलाफ लापरवाही के आरोप में रिपोर्ट दर्ज की गई है।

यह हादसा एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध विद्युत तारों और बिजली विभाग की लापरवाही की तरफ ध्यान खींचता है।

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गाजा में इजराइली ठिकानों पर आतंकवादी हमला नाकाम, आईडीएफ की जवाबी कार्रवाई में कई आतंकवादी ढेर

गाजा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। गाजा में बुधवार को आतंकवादियों ने इजराइली डिफेंस फोर्स (IDF) की सुरक्षा पोस्ट्स पर हमला करने का प्रयास किया, लेकिन आईडीएफ ने इसे नाकाम कर दिया। आईडीएफ ने कहा कि कई आतंकवादियों को जवाबी कार्रवाई में मार गिराया गया और इस घटना में किसी भी आईडीएफ सैनिक को चोट नहीं आई।

आईडीएफ ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर जानकारी दी कि गाजा शहर क्षेत्र में कई आतंकवादियों ने आईडीएफ पोस्ट पर हमला किया। आईडीएफ सैनिकों ने वायुसेना के समर्थन से आतंकवादियों को समाप्त किया और अतिरिक्त आतंकवादियों की तलाश जारी है।

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वे इस सप्ताहांत मध्य पूर्व यात्रा पर जा सकते हैं। उनका यह संभावित दौरा गाजा में बंदी-बदल समझौते और संघर्षविराम वार्ता के बीच हो सकता है। ट्रंप ने कहा, “शांति समझौता बहुत नजदीक है और हमारी टीम वार्ता में उत्कृष्ट काम कर रही है।”

वहीं, इस्राइल के विदेश मंत्री गिडियन सार ने शुक्रवार को पेरिस में होने वाली बैठक की आलोचना की। बैठक में यूरोपीय, अरब और अन्य राजदूत गाजा के युद्धोपरांत संक्रमण और स्थायी संघर्षविराम के प्रयासों पर चर्चा करेंगे। सार ने इसे अनावश्यक और हानिकारक बताते हुए कहा कि यह शार्म एल-शेख में चल रही वार्ता के संवेदनशील समय में इस्राइल की पीठ पीछे तैयार की गई।

गाजा में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है और दोनों पक्षों के कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद क्षेत्र में संघर्ष की आशंका बनी हुई है।

बेबी पाउडर से मौत, जॉनसन एंड जॉनसन को देना होगा 8,500 करोड़ रुपये का मुआवजा

कैलिफोर्निया (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। अमेरिका के लॉस एंजेलिस की अदालत ने जॉनसन एंड जॉनसन (Johnson & Johnson) को मेसोथेलियोमा कैंसर से मौत होने वाली महिला के परिवार को 8,500 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने महिला की मौत के लिए कंपनी को जिम्मेदार ठहराया।

परिवार का दावा था कि महिला ने अपनी पूरी जिंदगी जॉनसन एंड जॉनसन का बेबी पाउडर इस्तेमाल किया, जिसके कारण उन्हें कैंसर हुआ। जूरी ने फैसला सुनाते हुए माना कि महिला मूर को हुए कैंसर के लिए एस्बेस्टस (Asbestos) ज़िम्मेदार था और कंपनी ने पाउडर में इसके जोखिमों को स्पष्ट नहीं किया।

मुआवजे में करीब 140 करोड़ रुपये और दंड के रूप में 8,360 करोड़ रुपये शामिल हैं। मूर का 2021 में 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। महिला के परिवार की वकील जेसिका डीन ने बताया कि मामले में अदालत में पक्ष साबित करने में पाँच साल लगे।

जॉनसन एंड जॉनसन के वैश्विक कानूनी मामलों के प्रमुख एरिक हास ने कहा कि कंपनी फैसले के खिलाफ अपील करेगी। कंपनी पर बेबी पाउडर से जुड़े 70,000 से अधिक मुकदमे लंबित हैं और इनसे निपटने में कंपनी ने अब तक 3 अरब डॉलर खर्च किए हैं। 2023 में कंपनी ने बेबी पाउडर को दुनियाभर से वापस ले लिया था।

संगीत के संत रविन्द्र जैन: सुरों से संवेदना रचने वाले युगपुरुष

भारतीय संगीत जगत में जब-जब भक्ति, भाव और मधुरता की चर्चा होती है, तब-तब कवि, गायक और संगीतकार रविन्द्र जैन का नाम श्रद्धा और आदर से लिया जाता है। दृष्टिहीनता को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी शक्ति बनाकर उन्होंने आत्मा के संगीत से पूरी दुनिया को आलोकित किया। वे ऐसे विरले व्यक्तित्व थे जिन्होंने सिद्ध कर दिया कि सच्चा दृष्टा वही होता है, जो हृदय से देखता है।
28 फरवरी 1944 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के नजारा कस्बे में जन्मे रविन्द्र जैन के पिता पंडित इंद्रमणि जैन संस्कृत के विद्वान और कवि थे, जबकि माता कांता जैन धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। घर का वातावरण साहित्य, संगीत और संस्कारों से परिपूर्ण था। दृष्टि भले ही नहीं थी, लेकिन संगीत की अनुभूति उन्हें जन्मजात मिली थी। बाल्यावस्था से ही उन्होंने हारमोनियम और स्वर साधना आरंभ कर दी थी। उन्होंने संगीत की शिक्षा पंडित जनार्दन शर्मा और पंडित जयकिशन से प्राप्त की।
मुंबई जाकर उन्होंने संगीत जगत में अपनी पहचान बनाने की ठानी। प्रारंभिक दौर में अस्वीकृति और संघर्षों का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका आत्मविश्वास कभी नहीं टूटा। 1970 के दशक में “चोर मचाए शोर”, “गीत गाता चल”, “चितचोर”, “अंखियों के झरोखों से” और “राम तेरी गंगा मैली” जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा का अमर संगीतकार बना दिया। उनके संगीत में भारतीय लोकधुनों, शास्त्रीय रागों और कविता की गहराई का अद्भुत संगम था। उनके द्वारा रचित गीत- “गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा……”
जब दीप जले आना, जब शाम ढले आना….”
“ओ री चिरैया, नन्ही सी जान,”
आज भी लाखों दिलों को छूते हैं।
फिल्मों के साथ-साथ रविन्द्र जैन ने टेलीविज़न पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। रामानंद सागर की प्रसिद्ध श्रृंखला “रामायण” और “लव कुश” में उनके संगीत ने पात्रों को आत्मा दी। उनके सुरों ने भारतीय जनमानस को भक्ति, श्रद्धा और संस्कार की धारा में प्रवाहित किया। उनके गायन और संगीत निर्देशन में भक्ति और भाव की ऐसी गहराई थी कि उनका हर भजन एक साधना बन गया।
रविन्द्र जैन को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार, लता मंगेशकर पुरस्कार और वर्ष 2015 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनका नाम आज भी भारतीय संगीत के स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे अत्यंत सरल, विनम्र और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। अक्सर कहा करते थे कि संगीत मेरे लिए पूजा है, हर सुर में ईश्वर का अंश है।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सीमाएँ शरीर की नहीं, बल्कि मन की होती हैं। उन्होंने बिना आंखों के वह देखा, जिसे देखने की क्षमता बहुत कम लोगों में होती है। भावनाओं का संगीत और आत्मा की दृष्टि।
9 अक्टूबर 2015 को जब रविन्द्र जैन ने अंतिम सांस ली, तब संगीत जगत ने अपना एक सच्चा साधक खो दिया। परंतु उनके रचे गीत आज भी हर घर में गूंजते हैं। कभी प्रेम बनकर, कभी भक्ति बनकर और कभी प्रेरणा बनकर। उनकी धुनों में जीवन की मिठास है, भक्ति की गहराई है और भारतीय संस्कृति की आत्मा है।
रविन्द्र जैन सचमुच संगीत के संत थे। जिन्होंने सुरों से संवेदना, शब्दों से दर्शन और संगीत से मानवता रची।
प्रस्तुति – पुनीत मिश्र