Wednesday, July 22, 2026
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गैस-पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर सपा का विरोध, जनता की समस्याओं को लेकर उठी आवाज

भाजपा सरकार की नीतियों पर सपा लोहिया वाहिनी का हमला, महंगाई-बेरोजगारी को लेकर उठाए सवाल


देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। समाजवादी लोहिया वाहिनी के जिलाध्यक्ष दिव्यांश श्रीवास्तव ने शनिवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकार पर जनविरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है, जिससे आम जनता परेशान है।
दिव्यांश श्रीवास्तव ने कहा कि चुनाव समाप्त होते ही गैस सिलेंडर, पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार महंगाई नियंत्रित करने में पूरी तरह असफल साबित हुई है। बढ़ती बेरोजगारी के कारण शिक्षित युवा निराश हैं और रोजगार के अभाव में मानसिक दबाव झेल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि प्रदेश के कई सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है और अधिकारी-कर्मचारी बेलगाम हो चुके हैं। किसानों और व्यापारियों की समस्याओं की अनदेखी की जा रही है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से खेती-किसानी की लागत बढ़ रही है, जिससे किसानों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है।
सपा नेता ने प्रदेश की कानून व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और आम जनता को न्याय नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार में गरीब, किसान और आम नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
दिव्यांश श्रीवास्तव ने कहा कि उत्तर प्रदेश शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पिछड़ता जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता भाजपा सरकार को सत्ता से बाहर करने का निर्णय लेगी।

80 वर्ष की उम्र में अंग्रेजों को ललकारने वाले वीर कुंवर सिंह को बलिया में भावभीनी श्रद्धांजलि


बलिया (राष्ट्र की परंपरा) प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू कुंवर सिंह के बलिदान दिवस पर जनपद भर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसी क्रम में स्थानीय पंडित दीनदयाल चबूतरा पर एक भव्य सभा का आयोजन हुआ, जहां बड़ी संख्या में लोगों ने एकत्र होकर वीर सपूत को नमन किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भाजपा नेता व समाजसेवी अनूप सिंह ने पुष्पांजलि अर्पित करते हुए कहा कि बाबू कुंवर सिंह भारतीय स्वाभिमान, साहस और वीरता के अद्वितीय प्रतीक थे। उन्होंने कहा कि 80 वर्ष की आयु में जिस अदम्य साहस के साथ उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी, वह आज भी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि देशभक्ति के लिए उम्र नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और मजबूत इरादों की आवश्यकता होती है।
सभा में वक्ताओं ने उनके संघर्षों को याद करते हुए बताया कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में कुंवर सिंह ने न केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ बिगुल फूंका, बल्कि सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी रणनीति और नेतृत्व क्षमता से कई मोर्चों पर अंग्रेजों को पराजित किया। उनका साहस और नेतृत्व भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
इस अवसर पर संजय राय, सोनू सिंह, संजय चौबे, अमित सिंह, अभिषेक यादव, अंकित ठाकुर सहित दर्जनों गणमान्य नागरिक, युवा और कार्यकर्ता उपस्थित रहे। सभी ने उनके आदर्शों पर चलने और राष्ट्रहित में योगदान देने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ, जहां उपस्थित लोगों ने वीर कुंवर सिंह के बलिदान को नमन करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया।

वंदे मातरम विधेयक 2026: राष्ट्रीय सम्मान या अनिवार्य देशभक्ति? संसद में घमासान, संविधान पर छिड़ी बड़ी बहस

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में जुलाई 2026 का मानसून सत्र केवल राजनीतिक टकराव के लिए ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों की संवैधानिक स्थिति को लेकर शुरू हुई एक नई बहस के कारण भी लंबे समय तक याद किया जा सकता है।20 जुलाई 2026 को जब यह विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया,उसी समय विपक्ष ने इसके विरोध में तीखी आपत्ति दर्ज कराई।विभिन्न विपक्षी दलों ने इसे असंवैधानिक बताते हुए अन्य तात्कालिक मुद्दों पर चर्चा की मांग की।सदन में लगातार हंगामा होता रहा और विधेयक पर विस्तृत चर्चा प्रारंभ नहीं हो सकी।21 जुलाई 2026 तक की संसदीय स्थिति के अनुसार यह विधेयक प्रस्तुत तो हो चुका था, किंतु उस पर विचार- विमर्श और आगे की विधायी प्रक्रिया गतिरोध के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। अर्थात विधेयक अभी कानून नहीं बना है और उसे संसद के दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त करना शेष है।केंद्र सरकार द्वारा राज्यसभा में प्रस्तुत राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 ने संसद से लेकर न्यायपालिका,संविधान विशेषज्ञों,राजनीतिक दलों, शिक्षाविदों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक व्यापक चर्चा को जन्म दिया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि प्रस्तावित संशोधन का मूल उद्देश्य राष्ट्रगीत वंदे मातरम को वही वैधानिक संरक्षण प्रदान करना है जो अब तक राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान जन गण मन को प्राप्त है।यदि यह विधेयक वर्तमान स्वरूप में कानून बनता है तो किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर वंदे मातरम का अपमान करना, उसके गायन में बाधा डालना अथवा सार्वजनिक कार्यक्रम में उसका अनादर करना तीन वर्ष तक के कारावास जुर्माने या दोनों से दंडनीय अपराध बन सकता है। यहीं से वह संवैधानिक प्रश्न प्रारंभ होता है जिसने पूरे देश में चर्चा को जन्म दिया है,क्या यह राष्ट्रीय सम्मान को मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है?,या फिर यह देशभक्ति को कानून के माध्यम से अनिवार्य बनाने का प्रयास माना जाएगा? 

साथियों, मीडिया में आई जानकारी के अनुसार सरकार का पक्ष अत्यंत स्पष्ट है। केंद्र का कहना है कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा रहा है। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष के दौरान लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी गीत को प्रेरणा का स्रोत बनाया। अनेक क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर चढ़ते समय वंदे मातरम का उद्घोष करते थे। संविधान सभा के अंतिम चरण में 24 जनवरी 1950 को तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया था कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा जबकि वंदे मातरम को समान सम्मान प्राप्त रहेगा। सरकार का तर्क है कि स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी ऐतिहासिक भूमिका को देखते हुए अब समय आ गया है कि इसे भी वैधानिक सुरक्षा प्रदान की जाए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति जानबूझकर इसका अपमान न कर सके। सरकार यह भी कह रही है कि यह संशोधन किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए नहीं, बल्कि सटीकता से राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए लाया गया है।

साथियों, यह विधेयक वास्तव में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में संशोधन का प्रस्ताव है। वर्तमान अधिनियम मुख्य रूप से राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के अपमान को दंडनीय बनाता है। प्रस्तावित संशोधन के बाद पहली बार राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को भी इसी श्रेणी में शामिल किया जाएगा। इसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगीत का अपमान करता है, उसके गायन में व्यवधान उत्पन्न करता है, किसी सार्वजनिक समारोह में उसे रोकने का प्रयास करता है या उसके सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली गतिविधि करता है, तो उसके विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की जा सकेगी। सरकार का कहना है कि यह संशोधन केवल जानबूझकर किए गए अपमान पर लागू होगा, यह सटीकता से  सामान्य परिस्थितियों अथवा व्यक्तिगत विवेक पर नहीं। 

साथियों, लेकिन यही वह बिंदु है जहां से संवैधानिक विवाद प्रारंभ होता है। विपक्ष का कहना है कि संविधान सभा ने जानबूझकर राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के बीच कानूनी अंतर बनाए रखा था। यदि संविधान निर्माताओं की मंशा दोनों को समान कानूनी दर्जा देने की होती तो संविधान में उसी समय इसका स्पष्ट उल्लेख किया जाता। विपक्षी दलों, विशेषकर सीपीआई (एम), का आरोप है कि सरकार संविधान सभा की मूल भावना को बदलने का प्रयास कर रही है। उनके अनुसार देशभक्ति एक भावनात्मक और नैतिक मूल्य है, जिसे कानून के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यदि किसी नागरिक के व्यक्तिगत या धार्मिक विश्वास के कारण वह राष्ट्रगीत नहीं गाना चाहता, तो उसे अपराधी नहीं बनाया जा सकता। 

साथियों, सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इस विधेयक को वापस लेने की मांग की। पत्र में कहा गया कि संविधान सभा ने बहुत सोच-समझकर राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत की अलग- अलग संवैधानिक स्थिति निर्धारित की थी। पत्र में यह भी कहा गया कि भारत का संविधान नागरिकों को अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। ऐसे में किसी गीत को कानून के माध्यम से अनिवार्य सम्मान दिलाने का प्रयास भविष्य में संवैधानिक विवादों को जन्म दे सकता है। विपक्ष का तर्क है कि राष्ट्रीय सम्मान और राष्ट्रीय अनिवार्यता के बीच सटीकता से  संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है। 

साथियों, इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ है। वंदे मातरम मूलतः बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा है। गीत के प्रारंभिक दो अंतरे व्यापक रूप से स्वीकार किए जाते हैं, जबकि बाद के अंशों में मां दुर्गा सहित कुछ धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख मिलता है। इतिहास में कई मुस्लिम संगठनों तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों ने इन्हीं धार्मिक संदर्भों के आधार पर इसके पूर्ण गायन पर आपत्ति व्यक्त की थी। संविधान सभा ने भी इन ऐतिहासिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए केवल प्रारंभिक अंशों को सार्वजनिक उपयोग के लिए स्वीकार किया था। आलोचकों का कहना है कि यदि इस विधेयक के बाद किसी नागरिक की धार्मिक मान्यता और कानून के बीच टकराव उत्पन्न होता है, तो न्यायपालिका को अत्यंत जटिल संवैधानिक प्रश्नों का सटीकता से सामना करना पड़ सकता है। 

साथियों, इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का 1986 का ऐतिहासिक निर्णय बिजोए इमैनुएल बनाम केरल राज्य बार-बार चर्चा में आ रहा है। इस मामले में यहोवा विटनेस समुदाय के तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, हालांकि वे सम्मानपूर्वक खड़े रहे। विद्यालय ने उन्हें निष्कासित कर दिया,लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि किसी नागरिक को उसकी अंतरात्मा के विरुद्ध राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यदि वह सम्मानपूर्वक खड़ा है और राष्ट्रगान का अपमान नहीं कर रहा, तो केवल गीत न गाने के आधार पर उसे दंडित नहीं किया जा सकता। यह निर्णय भारतीय संवैधानिक कानून में अंतरात्मा की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। यही कारण है कि कई संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नया संशोधन कानून बनता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा लगभग निश्चित है। मार्च 2026 में भी इस विषय पर न्यायिक चर्चा हुई थी। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कार्यक्रम में वंदे मातरम बजाया जाता है तो केवल उसके बजने मात्र से प्रत्येक नागरिक पर उसे गाना अनिवार्य नहीं हो जाता। सम्मान प्रदर्शित करना और अनिवार्य रूप से गाना दो अलग-अलग बातें हैं। यह दृष्टिकोण भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है क्योंकि नया संशोधन और न्यायालय की पूर्व व्याख्याएं भविष्य में एक-दूसरे के साथ किस प्रकार संतुलित होंगी, यह अभी सटीकता से  स्पष्ट नहीं है।

साथियों,संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, जबकि अनुच्छेद 25 अंतरात्मा तथा धर्म की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। दूसरी ओर अनुच्छेद 51ए (क) प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य बताता है कि वह संविधान,राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करे। उल्लेखनीय है कि इस अनुच्छेद में वंदे मातरम’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। यही कारण है कि कई विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संसद राष्ट्रगीत को वैधानिक संरक्षण देना चाहती है तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि यह संरक्षण मौलिक अधिकारों के साथ किस प्रकार संतुलित रहेगा।समर्थकों का तर्क है कि विश्व के अनेक देशों में राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर कठोर दंड का प्रावधान है। उनका कहना है कि यदि राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान की कानूनी सुरक्षा उचित मानी जाती है तो स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रेरणादायक गीत को भी समान सुरक्षा मिलनी चाहिए। उनके अनुसार राष्ट्रीय एकता केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि नागरिक कर्तव्यों से भी मजबूत होती है। दूसरी ओर आलोचक कहते हैं कि भारत का लोकतांत्रिक मॉडल विविधता, सहमति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित है, इसलिए राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करते समय संवैधानिक स्वतंत्रताओं का भी समान महत्व होना चाहिए। 

साथियों, इस पूरे घटनाक्रम ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा है क्या देशभक्ति कानून से उत्पन्न होती है या सामाजिक चेतना से? भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास बताता है कि वंदे मातरम  और जन गण मन दोनों ने अलग-अलग समय में राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया। किंतु संविधान निर्माताओं ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी समान महत्व दिया। इसलिए भविष्य की किसी भी कानूनी व्यवस्था को इन दोनों मूल्यों के बीच सटिकता से  संतुलन स्थापित करना होगा। 

साथियों, अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से भी यह बहस महत्वपूर्ण है। विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन लगातार न्यायालयों के सामने चुनौती बना रहता है। भारत का यह प्रस्तावित संशोधन भी संभवतः इसी व्यापक वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनेगा कि राष्ट्रीय पहचान की रक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच सर्वोत्तम संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 केवल एक दंडात्मक कानून का प्रस्ताव नहीं है,बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों राष्ट्रीय सम्मान,संवैधानिक स्वतंत्रता और नागरिक कर्तव्य के बीच संतुलन स्थापित करने की परीक्षा भी है। यदि विधेयक कानून बनता है तो उसके प्रावधानों की न्यायिक समीक्षा लगभग निश्चित मानी जा रही है। वहीं यदि संसद में व्यापक सहमति बनती है तो यह राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है। परंतु यदि सहमति नहीं बनती, तो यह बहस आने वाले वर्षों तक संविधान,न्यायपालिका संसद और समाज के बीच चलने वाले सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक विमर्शों में से एक बनी रह सकती है। भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में यही चुनौती है कि राष्ट्रीय गौरव की रक्षा भी हो, संविधान की आत्मा भी सुरक्षित रहे और नागरिक की अंतरात्मा की स्वतंत्रता भी अक्षुण्ण बनी रहे।

-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

कांग्रेस के बीना देश में लोकतंत्र सुरक्षित नहीं – डॉ धर्मेन्द्र पांडेय

संगठन को मजबूत करने की कांग्रेसियों ने बनाई रणनीति

सलेमपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)
कांग्रेस की सरकार के बीना देश मे लोकतंत्र की सुरक्षा सम्भव नहीं हो सकती है, और इसके लिए ग्राम सभा स्तर तक संगठन को मजबूत करने की आवश्यकता है।उक्त बातें नगर के सलाहाबाद वार्ड में कांग्रेस की आयोजित बैठक को सम्बोधित करते हुए जिला कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष डॉ धर्मेन्द्र पांडेय ने कहा कि, भाजपा सरकार छात्रों और नौजवानों को उनकी मांग पूरा करने के बजाय उन पर लाठियां बरसा रही है। उन्होंने कहा महंगाई से जनता पूरी तरह से त्रस्त हो चुकी है। खाद्य सामग्री के दाम बढ़ते जा रहे हैं। जिला महासचिव मार्कण्डेय मिश्र ने कहा कि कांग्रेस हर ग्राम पंचायत में अध्यक्ष की नियुक्ति कर रही है,इसके लिए जनपद के पदाधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। बिना कांग्रेस के मजबूती के जनता का हित सुरक्षित नहीं हो सकता है। ब्लॉक अध्यक्ष मनीष रजक ने कहा कि कांग्रेस को ही दलितों, पिछडों, दबे कुचले लोगों के हित की चिंता है। कांग्रेस का एक एक कार्यकर्ता इसके लिए जनसंघर्ष करने को तैयार है। जिला महासचिव रजनीश प्रसाद ने कहा कि जनता अब जान गई है कांग्रेस के शासन मे देश व जनता सुरक्षित है। जिला सचिव परमानन्द प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस सरकार में ही देश का चौमुखी विकास हो सकता है। कार्यक्रम मे सत्यम पांडेय,परमानन्द प्रसाद, सत्यवान पांडेय, डॉ रमेश कुशवाहा, इस्लाम खान,अवधेश पांडेय, डॉ याहिया अंजुम ,मोहन प्रसाद आदि मौजूद रहे ।

समाजवादी छात्र सभा के नवनियुक्त प्रदेश सचिव अश्वनी गौड़ का भव्य स्वागत

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। समाजवादी छात्र सभा के नवनियुक्त प्रदेश सचिव अश्वनी गौड़ के प्रथम गोरखपुर आगमन पर समाजवादी पार्टी कार्यालय सहित शहर के प्रमुख चौराहों पर कार्यकर्ताओं ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। इस दौरान फूल-मालाओं से अभिनंदन कर उनके संगठन में नई जिम्मेदारी मिलने पर शुभकामनाएं दी गईं।
स्वागत कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं ने कहा कि अश्वनी गौड़ के नेतृत्व में समाजवादी छात्र सभा का संगठन और अधिक मजबूत होगा तथा युवाओं के बीच पार्टी की नीतियों को प्रभावी ढंग से पहुंचाया जाएगा। इस अवसर पर संगठन की मजबूती और आगामी कार्यक्रमों को लेकर भी चर्चा की गई।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से जिलाध्यक्ष बृजेश कुमार गौतम, नगीना प्रसाद साहनी, वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज कुमार शाही, अनूप यादव ईश्वर, इन्द्र प्रताप यादव, खुशियाल चौहान, रोहित यादव, रंजीत गौड़, मनीष गौड़, प्रमोद निषाद, जुगुल निषाद, मोनू चौहान, गिरिजेश यादव, बृजेश यादव सहित बड़ी संख्या में समाजवादी पार्टी एवं समाजवादी छात्र सभा के पदाधिकारी और कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

तख़्त पर बैठी वृद्ध महिला की गिरने से मौत परिजनों मे शोक की लहर

बरहज/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)l थाना क्षेत्र बरहज अंतर्गत एक गाँव की वृद्ध महिला की तख्त से गिरने पर मौत हो गयी, परिजनों मे शोक की लहर व्याप्त है।
परिजनों के अनुसार बरहज थाना क्षेत्र ग्राम बड़कागांव निवासी 72 वर्षीय जोखनी देवी पत्नी दीपनारायण प्रसाद, घर से खाना खाकर पड़ोस मे ही किसी के मरने मे गयी थी। वहाँ से ज़ब वह लौटकर घर आयी और घर मे रखे तख्त पर बैठी कि अचानक तख्त से निचे गीर गयी जिससे उनकी हालत गंभीर हो गयी। आनन फानन मे परिजनों द्वारा ईलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बरहज लाया गया जहाँ डाक्टरों ने जांच कर उन्हें मृत घोषित के दिया।
परिजन शव को लेकर ग्राम बड़कागांव चले आये।
परिजनों का रो रो कर बुरा हाल है।

राष्ट्रीय मूट कोर्ट प्रतियोगिता में बीबीएयू का शानदार प्रदर्शन

प्रथम उपविजेता के साथ ‘बेस्ट मेमोरियल’ पुरस्कार भी जीता

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के विधि विभाग, स्कूल ऑफ लीगल स्टडीज़ के विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय स्तर की प्रथम जस्टिस डी.पी. गुप्ता मूट कोर्ट प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए प्रथम उपविजेता (फर्स्ट रनर-अप) का स्थान हासिल किया। बाबू बनारसी दास विश्वविद्यालय, लखनऊ में आयोजित इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में देशभर के प्रमुख विधि संस्थानों की टीमों के बीच बीबीएयू की टीम ने प्रभावशाली मौखिक बहस, गहन विधिक शोध और सशक्त न्यायिक विश्लेषण के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई।
विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व स्पीकर-1 अविरल द्विवेदी, स्पीकर-2 संकल्प भट्ट और रिसर्चर अनुष्का शर्मा ने किया। टीम ने सभी चरणों में शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल में जगह बनाई और प्रथम उपविजेता बनने के साथ ₹31 हजार की पुरस्कार राशि प्राप्त की।
टीम ने प्रतियोगिता का प्रतिष्ठित ‘बेस्ट मेमोरियल’ पुरस्कार भी अपने नाम किया। उत्कृष्ट लिखित तर्क, विधिक शोध और मेमोरियल लेखन के लिए दिए गए इस सम्मान के साथ टीम को ₹5,100 की अतिरिक्त पुरस्कार राशि प्रदान की गई।
प्रतियोगिता का फाइनल मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति शमीम अहमद तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ के समक्ष आयोजित हुआ। समापन समारोह में पूर्व सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश एवं 23वें विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी तथा पूर्व मुख्य न्यायाधीश, मद्रास उच्च न्यायालय न्यायमूर्ति एम.एन. भंडारी ने विजेता टीमों को सम्मानित किया।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने टीम को बधाई देते हुए इसे संस्थान के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया। वहीं विधि विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. सुदर्शन वर्मा सहित विभाग के शिक्षकों ने विद्यार्थियों की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

अवैध शराब के ठिकानों पर छापेमारी, छह लीटर कच्ची शराब बरामद

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। जिले में अवैध शराब के निर्माण और बिक्री पर रोक लगाने के लिए चलाए जा रहे विशेष प्रवर्तन अभियान के तहत आबकारी विभाग ने मेंहदावल क्षेत्र में छापेमारी कर बड़ी कार्रवाई की। इस दौरान भारी मात्रा में महुआ लहन नष्ट किया गया और कच्ची शराब बरामद कर आबकारी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।
जिलाधिकारी के निर्देश पर जिला आबकारी अधिकारी संजय कुमार के नेतृत्व में आबकारी निरीक्षक क्षेत्र-2 मेंहदावल बसंत प्रसाद और उनकी टीम ने ग्राम भिड़ौरा पिकौरा, सोनबरसा तथा आसपास के क्षेत्रों में दबिश दी। कार्रवाई के दौरान मौके पर करीब 290 किलोग्राम महुआ लहन नष्ट किया गया। साथ ही छह लीटर कच्ची शराब बरामद की गई।
आबकारी विभाग ने बरामदगी के आधार पर संबंधित आबकारी अधिनियम के तहत अभियोग पंजीकृत कर अग्रिम विधिक कार्रवाई शुरू कर दी है। विभाग ने स्पष्ट किया कि जनपद में अवैध शराब के निर्माण, भंडारण और बिक्री के विरुद्ध विशेष अभियान आगे भी लगातार जारी रहेगा।

कोर्ट सख्त: अमिताभ ठाकुर प्रकरण में विवेचक से 27 जुलाई तक मांगी प्रगति रिपोर्ट

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर एवं उनकी पत्नी डॉ. नूतन ठाकुर से जुड़े चर्चित आपराधिक मामले में न्यायालय ने जांच की प्रगति को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम), देवरिया ने मामले के विवेचक सोबरन सिंह से 27 जुलाई तक विस्तृत प्रगति आख्या (स्टेटस रिपोर्ट) प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
यह आदेश अधिवक्ता प्रवीण द्विवेदी द्वारा न्यायालय में दायर प्रार्थनापत्र पर सुनवाई के दौरान दिया गया। प्रार्थनापत्र में कहा गया कि मुकदमा दर्ज हुए दस माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद पुलिस जांच अभी तक अपने तार्किक एवं कानूनी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी है और न ही जांच रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि एफआईआर दर्ज होने के लगभग दो माह के भीतर ही अमिताभ ठाकुर को शाहजहांपुर में चलती ट्रेन से गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बावजूद विवेचना लंबित रहने और अंतिम रिपोर्ट दाखिल न होने पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
अधिवक्ता प्रवीण द्विवेदी ने न्यायालय से अनुरोध किया कि अब तक की समस्त विवेचना की प्रगति रिपोर्ट तलब की जाए। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि जांच में अनावश्यक विलंब उत्तर प्रदेश पुलिस रेगुलेशन के प्रावधानों तथा डीजीपी द्वारा जारी दिशा-निर्देशों की भावना के अनुरूप नहीं है। उन्होंने इस संबंध में आवश्यक कानूनी कार्रवाई की मांग भी की।
गौरतलब है कि 12 सितंबर 2025 को देवरिया कोतवाली में अमिताभ ठाकुर एवं उनकी पत्नी डॉ. नूतन ठाकुर के विरुद्ध एक औद्योगिक भूखंड (इंडस्ट्रियल प्लॉट) के आवंटन में कथित जालसाजी और अनियमितताओं के आरोपों को लेकर मुकदमा दर्ज कराया गया था। आरोप था कि प्रभाव का अनुचित उपयोग कर कथित रूप से फर्जी नाम के माध्यम से औद्योगिक प्लॉट प्राप्त किया गया।
मामले में अमिताभ ठाकुर को 10 दिसंबर 2025 को शाहजहांपुर से गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उन्हें लगभग दो माह तक देवरिया जिला कारागार में रखा गया था।
अब न्यायालय द्वारा 27 जुलाई तक प्रगति रिपोर्ट तलब किए जाने के बाद इस बहुचर्चित मामले की विवेचना पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। न्यायालय में प्रस्तुत होने वाली रिपोर्ट से आगे की कानूनी प्रक्रिया की दिशा तय होने की संभावना है।

सोशल मीडिया और एआई का जिम्मेदार उपयोग ही भविष्य की सफलता की कुंजी: शुभेन्द्र सत्यदेव

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ हेल्थ एंड लाइफ साइंसेज द्वारा आयोजित दीक्षारंभ-2026 कार्यक्रम के अंतर्गत “जीवन में सोशल मीडिया और एआई की भूमिका” विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। इस अवसर पर अधिवक्ता शुभेन्द्र सत्यदेव ने विद्यार्थियों को सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के सकारात्मक उपयोग, संभावनाओं और चुनौतियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और एआई आज के समय के सबसे प्रभावशाली तकनीकी साधन हैं। यदि इनका विवेकपूर्ण और जिम्मेदारी के साथ उपयोग किया जाए तो ये शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वहीं इनका दुरुपयोग व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए गंभीर चुनौतियां भी खड़ी कर सकता है।
अपने संबोधन में उन्होंने दैनिक जीवन से जुड़े रोचक प्रसंगों, व्यावहारिक उदाहरणों और हास्यपूर्ण शैली के माध्यम से विषय को सरल बनाया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया अब केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि लोगों की सोच, व्यवहार और निर्णय क्षमता को भी प्रभावित करने वाला सशक्त मंच बन चुका है। वहीं एआई कार्यों को आसान और तेज बना रहा है, लेकिन यह मानवीय संवेदनाओं, मौलिक चिंतन और रचनात्मकता का विकल्प नहीं बन सकता।
उन्होंने विद्यार्थियों से सोशल मीडिया का उपयोग ज्ञान अर्जन, शोध, नवाचार और सकारात्मक संवाद के लिए करने तथा एआई को सहयोगी तकनीक के रूप में अपनाने का आह्वान किया। साथ ही तकनीक का उपयोग नैतिकता और जिम्मेदारी के साथ करने पर बल दिया।
व्याख्यान के दौरान विद्यार्थियों ने सोशल मीडिया की लत, फेक न्यूज़, साइबर सुरक्षा, डिजिटल नैतिकता और एआई के भविष्य से जुड़े सवाल पूछे। अधिवक्ता शुभेन्द्र सत्यदेव ने सभी प्रश्नों का व्यावहारिक उदाहरणों के साथ विस्तार से उत्तर दिया। उनका संवादात्मक और प्रभावशाली व्याख्यान विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायी रहा।
कार्यक्रम में अतिथि परिचय शोधार्थी शिवम पाण्डेय ने कराया, जबकि आयोजन समिति के लेफ्टिनेंट डॉ. संदीप कुमार श्रीवास्तव ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में विद्यार्थियों को सोशल मीडिया और एआई के प्रति जागरूक एवं उत्तरदायी बनाना समय की आवश्यकता है।
इस अवसर पर अधिष्ठाता प्रो. सुनील कुमार सिंह, डॉ. अमित दुबे, डॉ. प्रेरणा अदिति, डॉ. पवन कन्नौजिया, डॉ. अवैद्यनाथ, डॉ. धनंजय पाण्डेय, डॉ. रश्मि शाही सहित बड़ी संख्या में नवप्रवेशी छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

जनहित मुद्दों को लेकर सपा का भुख हड़ताल

जब तक मांगे पूरी नहीं होगी तब तक चलेगा भूख हड़ताल -विजय रावत

बरहज/देवरिया(राष्ट्र क़ी परम्परा)
मंगलवार को जनहित मुद्दों को लेकर बरहज स्थित काली माँ मंदिर पर सपा नेता विजय रावत ने कार्यकर्ताओ संग भूख हड़ताल शुरू किया। इस अवसर पर सपा नेता विजय रावत ने कहा कि पिछले दस सालों से भाजपा सरकार ने बरहज विधानसभा को विकास कि परिधि से कोसों दूर कर दिया है।
वर्षो से टूटी बरहज से सोनूघाट की सड़क जिसपर आम जनमानस चलने को मजबूर है। लेकिन जनप्रतिनिधिओ को जनता के मुद्दों से कुछ लेना देना नहीं है।
उन्होंने कहा कि मोहन सेतु अपनी दशा पर रो रहा है, बरहज कि बिजली व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है।
क्षेत्र की जनता विकास की राह देखते देखते थक चुकी हैऔर यूपी के मुख्यमंत्री बरहज मे आकर केवल लोगो को जुमला देकर चले जाते है।
उन्होंने जनहित के मुद्दों पर शासन प्रशासन से मांग करते हुए कहा कि बरहज सोनू घाट मार्ग पर तत्काल प्रभाव से गड्ढे पाटे जाए, बरहज विधानसभा की बिजली व्यवस्था जो ध्वस्त हो चुकी हैं उसे तत्काल प्रभाव से ठीक की जाये, मोहन सेतु पर धन आवंटित किया जाये, परसिया विशुनपुर देवरिया कटान रोकने का प्रबंधन किया जाए, नही तो यह भुख हड़ताल लगातार जारी रहेगा। भूख हड़ताल मे मुख्य रूप से विकास यादव, अनरूद यादव, उपेन्द्र सिंह, फरेन्द यादव, भृंगू यादव, छेदी कुमार, रामराज, इस्लाम, गंगा यादव, मुमताज़, दुर्गेश गौड़, भोला गौड़ सहीत आदि लोग मौजूद रहे ।

रंगों के जरिए विद्यार्थियों ने दिया नशा छोड़ने का संदेश, वॉल पेंटिंग प्रतियोगिता में दिखाई रचनात्मकता

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छिंदवाड़ा (राष्ट्र की परम्परा)। शासकीय महाविद्यालय में स्वामी विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ एवं राष्ट्रीय सेवा योजना के संयुक्त तत्वावधान में नशा मुक्त भारत अभियान के अंतर्गत वॉल पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता का उद्देश्य विद्यार्थियों में नशा मुक्ति के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ उनकी सृजनात्मक प्रतिभा को प्रोत्साहित करना था।
प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने आकर्षक एवं संदेशपरक चित्रों के माध्यम से नशे के दुष्परिणाम और स्वस्थ समाज के निर्माण का संदेश दिया। प्रतियोगिता का मूल्यांकन डॉ. पूजा तिवारी, डॉ. अंजू चौहान एवं डॉ. नमिता चौबे ने किया।
प्रतियोगिता में अनुज कुरोथे एवं सत्पूर्णा उईके ने संयुक्त रूप से प्रथम स्थान प्राप्त किया। पूजा आडवर द्वितीय तथा गोविंद उईके तृतीय स्थान पर रहे।
कार्यक्रम का सफल संचालन स्वामी विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ की प्रभारी डॉ. फरहत मंसूरी ने किया। आयोजन में राष्ट्रीय सेवा योजना गर्ल्स विंग की नोडल ऑफिसर डॉ. नसरीन अंजुम खान तथा बॉयज विंग के नोडल ऑफिसर डॉ. नवीन कुमार चौरसिया का महत्वपूर्ण सहयोग रहा।
महाविद्यालय में आयोजित यह प्रतियोगिता विद्यार्थियों में नशा मुक्ति के प्रति जागरूकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और रचनात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा देने की दिशा में एक सार्थक पहल साबित हुई।

जलनिकासी का पुराना रास्ता बंद, 250 बीघा कृषि भूमि जलमग्न; किसानों ने डीएम से लगाई गुहार

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा) जिले के ग्राम बथनी बाबू क्षेत्र में जलनिकासी की समुचित व्यवस्था न होने से किसानों को पिछले लगभग 10 वर्षों से गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बरसात के मौसम में जलभराव के कारण लगभग 200 से 250 बीघा कृषि भूमि जलमग्न हो जाती है, जिससे किसानों की खड़ी फसलें नष्ट हो रही हैं और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को दिए गए प्रार्थना पत्र में बताया कि बारिश का पानी पिपरा चन्द्रभान और धमऊट होते हुए सोनूघाट (देवरिया) की ओर बहता है। पहले यह पानी बरहज तहसील क्षेत्र स्थित गडेर ताल के पुराने जलनिकासी मार्ग से आगे निकल जाता था, लेकिन पिछले कई वर्षों से यह मार्ग अवरुद्ध होने के कारण पानी की निकासी पूरी तरह बाधित हो गई है।

ग्रामीणों का कहना है कि जलनिकासी का रास्ता बंद होने से हर वर्ष खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहता है, जिससे धान सहित अन्य फसलें बर्बाद हो जाती हैं। लगातार हो रहे नुकसान से क्षेत्र के किसान आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।

ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से मांग की है कि मामले का शीघ्र संज्ञान लेते हुए संबंधित अधिकारियों से स्थलीय निरीक्षण कराया जाए तथा जलनिकासी के पुराने मार्ग को अतिक्रमण एवं अवरोध से मुक्त कराकर समस्या का स्थायी समाधान कराया जाए, ताकि किसानों की कृषि भूमि को जलभराव से बचाया जा सके।

प्रार्थना पत्र सौंपने वालों में देवेन्द्र कुशवाहा, चन्द्रमोहन, अरुण, सत्यप्रकाश, केदारनाथ, बिपुल, अजीत, अखिलेश, गुलशन सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं समस्त ग्रामवासी उपस्थित रहे।

मुख्यमंत्री योगी ने जिस बाबा बैजूनाथ धाम में की थी पूजा, उसी प्राचीन मंदिर का पिछला हिस्सा ढहा

300 वर्ष पुराने बाबा बैजूनाथ धाम मंदिर का हिस्सा ढहा, श्रद्धालुओं में गहरा दुख; प्रशासन ने कराया पुनर्निर्माण का भरोसा

संतकबीरनगर (राष्ट्र की परम्परा)। जिले के धनघटा विधानसभा क्षेत्र में स्थित कुआनो नदी के पावन तट पर बसे अति प्राचीन बाबा बैजूनाथ धाम मंदिर का एक हिस्सा अचानक क्षतिग्रस्त होकर ढह जाने से पूरे क्षेत्र में शोक और चिंता का माहौल है। बसवारी गांव (संतकबीरनगर) और सिकरीगंज (गोरखपुर) की सीमा पर स्थित यह ऐतिहासिक शिवधाम लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। घटना में किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई, लेकिन मंदिर के क्षतिग्रस्त होने से श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं गहराई से आहत हुई हैं।
बताया जा रहा है कि पिछले कई दिनों से लगातार हो रही बारिश के कारण रविवार को मंदिर के पिछले हिस्से और शिखर का एक भाग अचानक भरभराकर गिर गया। घटना की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौके पर पहुंच गए। मंदिर का क्षतिग्रस्त दृश्य देखकर लोगों में मायूसी और चिंता साफ दिखाई दी।
इस घटना की विशेष चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि गत 25 जून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बाबा बैजूनाथ धाम पहुंचकर विधि-विधान से भगवान शिव का पूजन-अर्चन किया था और प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की थी। मुख्यमंत्री के दौरे के कुछ ही दिनों बाद मंदिर का हिस्सा ढह जाने से क्षेत्र में इस घटना को लेकर व्यापक चर्चा है।
सूचना मिलते ही जिलाधिकारी आलोक कुमार और पुलिस अधीक्षक तत्काल घटनास्थल पर पहुंचे। अधिकारियों ने मंदिर परिसर और क्षतिग्रस्त हिस्से का निरीक्षण कर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। एहतियात के तौर पर मलबे वाले क्षेत्र को सुरक्षित कर आम लोगों की आवाजाही सीमित कर दी गई।
जिलाधिकारी ने कहा कि बाबा बैजूनाथ धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। मंदिर के क्षतिग्रस्त होने से प्रशासन भी दुखी है। उन्होंने श्रद्धालुओं को आश्वस्त किया कि विशेषज्ञों की देखरेख में मंदिर का परीक्षण कराया जाएगा तथा शीघ्र ही इसके संरक्षण, मरम्मत और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में यहां पहले से अधिक भव्य और सुरक्षित मंदिर के निर्माण की दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने भी शासन-प्रशासन से मांग की है कि इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। उनका कहना है कि बाबा बैजूनाथ धाम क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है, इसलिए इसकी मूल गरिमा को सुरक्षित रखते हुए शीघ्र पुनर्निर्माण कराया जाना चाहिए।

31 अगस्त तक ढाबों, होटलों और ईंट-भट्ठों पर चलेगा बाल श्रम के खिलाफ विशेष अभियान

डीएम ने दिए सघन जांच के निर्देश, बाल श्रमिक मिलने पर होगी कड़ी कार्रवाई

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा )। जनपद को बाल श्रम मुक्त बनाने की दिशा में प्रशासन ने अभियान तेज कर दिया है। सोमवार को कलेक्ट्रेट सभागार में जिलाधिकारी गौरव सिंह सोंगरवाल की अध्यक्षता में आयोजित श्रम विभाग की जिला स्तरीय टास्क फोर्स की बैठक में बाल श्रम उन्मूलन को लेकर व्यापक रणनीति तैयार की गई। जिलाधिकारी ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि 31 अगस्त 2026 तक जनपद के सभी ढाबों, होटलों, रेस्टोरेंट, ईंट-भट्ठों, कार्यशालाओं, दुकानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का सघन निरीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाए कि कहीं भी कोई बच्चा बाल श्रमिक के रूप में कार्यरत न मिले।
बैठक में जिलाधिकारी ने कहा कि बाल श्रम केवल कानून का उल्लंघन ही नहीं, बल्कि समाज के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है। ऐसे में इसे जड़ से समाप्त करने के लिए सभी विभागों को समन्वय बनाकर कार्य करना होगा। उन्होंने टास्क फोर्स में नामित निरीक्षण अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे नियमित रूप से क्षेत्रीय भ्रमण करें और निरीक्षण अभियान को प्रभावी ढंग से संचालित करें। किसी भी स्तर पर लापरवाही मिलने पर संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी।
डीएम ने श्रम प्रवर्तन अधिकारी को निर्देश दिया कि यदि किसी भी प्रतिष्ठान में बालक या बालिका कार्य करते हुए पाए जाते हैं तो उन्हें तत्काल मुक्त कराया जाए। साथ ही उनके पुनर्वास, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि बाल श्रम से मुक्त कराए गए बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ना प्रशासन की प्राथमिकता है। इसके लिए शिक्षा विभाग, समाज कल्याण विभाग और श्रम विभाग संयुक्त रूप से कार्य करेंगे।
बैठक के दौरान बाल श्रम उन्मूलन अभियान के तहत पूर्व में की गई कार्रवाई की समीक्षा भी की गई। उन्होंने सभी उपजिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि बाल श्रम मामलों में जारी आरसी की समीक्षा कर प्रभावी वसूली सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि कानून का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति बच्चों से मजदूरी कराने का साहस न कर सके। उन्होंने कहा कि बाल श्रम की रोकथाम केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की भी नैतिक जिम्मेदारी है। यदि कहीं कोई बच्चा मजदूरी करता दिखाई दे तो इसकी सूचना तत्काल संबंधित विभाग या प्रशासन को दी जानी चाहिए, ताकि समय रहते कार्रवाई की जा सके। उन्होंने कहा
बाल श्रम सामाजिक अपराध है। बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, मजदूरी के औजार नहीं। किसी भी प्रतिष्ठान में बाल श्रमिक मिलने पर नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी।
बैठक में मुख्य विकास अधिकारी महेंद्र कुमार सिंह, श्रम प्रवर्तनअधिकारी गणेश कुमार, क्षेत्राधिकारी सदर अंकुर गौतम, जिला समाज कल्याण अधिकारी विपिन कुमार, जिला सूचना अधिकारी प्रभाकर मणि त्रिपाठी, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी सुरजीत कुमार सिंह सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी उपस्थित रहें।

हार्ट अटैक से कलेक्ट्रेट कर्मी सतेन्द्र कुमार सिंह का निधन

शोक की लहर

दो मिनट मौन रख दी गई श्रद्धांजलि

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)
कलेक्ट्रेट में तैनात ईआरके सतेन्द्र कुमार सिंह के आकस्मिक निधन से पूरे कलेक्ट्रेट परिसर में गहरा शोक व्याप्त है। रविवार को उन्हें अचानक हार्ट अटैक आया, जिससे उनका निधन हो गया। इस दुखद घटना की सूचना मिलते ही सहकर्मियों और अधिकारियों में शोक की लहर दौड़ गई। सोमवार को जिलाधिकारी दीपक मीणा के नेतृत्व में कलेक्ट्रेट परिसर में शोकसभा का आयोजन किया गया, जहां दिवंगत आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
श्री सिंह वर्ष 1994 में कलेक्ट्रेट सेवा में आए थे और अपने सरल स्वभाव, कर्तव्यनिष्ठा एवं विनम्र व्यवहार के कारण सभी के बीच लोकप्रिय थे। उनके अचानक चले जाने से सहकर्मियों को गहरा आघात लगा है। शोकसभा में उपस्थित अधिकारियों और कर्मचारियों की आंखें नम थीं और सभी के चेहरों पर उनके साथ बिताए पलों की स्मृतियां साफ झलक रही थीं। कई कर्मचारियों ने भावुक होकर कहा कि सतेन्द्र कुमार सिंह का इस तरह अचानक साथ छोड़ देना अब भी विश्वास से परे लग रहा है।
दिवंगत सतेन्द्र कुमार सिंह अपने पीछे पत्नी, दो पुत्रियों और एक पुत्र को छोड़ गए हैं। परिवार के समक्ष इस असमय आई विपत्ति ने सभी को झकझोर कर रख दिया है। उपस्थित लोगों ने कहा कि होनी को कोई टाल नहीं सकता, लेकिन श्री सिंह का इस तरह चले जाना परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है। सहकर्मियों ने उनके परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए हर संभव सहयोग का भरोसा दिलाया।
शोकसभा में एडीएम सिटी गजेंद्र कुमार, एडीएम प्रशासन डॉ. वैभव शर्मा, सिटी मजिस्ट्रेट उत्कर्ष श्रीवास्तव, मुख्य प्रशासनिक अधिकारी गिरीश सिंह, कलेक्ट्रेट संघ अध्यक्ष राजेंद्र शर्मा, मंत्री विश्वेश शुक्ला, कोषाध्यक्ष पंकज श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए ईश्वर से शोकाकुल परिवार को इस दुख की घड़ी में धैर्य प्रदान करने की कामना की।

कमिश्नरी में ‘शान’ के नाम पर अराजक पार्किंग नियमों को ठेंगा दिखाते वाहन चाल

अपने दरवाजे पर खड़ी गाड़ी हो तो आपत्ति, सार्वजनिक परिसर में क्यों नहीं?

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)
कमिश्नरी परिसर में कुछ लोगों की मनमानी अब खुलेआम व्यवस्था को चुनौती देती नजर आ रही है। चारपहिया वाहनों को बेतरतीब ढंग से खड़ा करना यहां कुछ लोगों की आदत ही नहीं, बल्कि ‘शान’ बन चुका है। हैरानी इस बात की है कि ऐसे लोगों पर न तो नियमों का कोई असर दिखता है और न ही प्रशासनिक निर्देशों का।
विडंबना देखिए—अगर यही गाड़ी किसी के अपने घर के दरवाजे पर खड़ी कर दी जाए, तो तुरंत आपत्ति शुरू हो जाती है। रास्ता जाम होने, असुविधा होने और निजी दायरे में दखल की बातें उठाई जाती हैं। लेकिन जब बात कमिश्नरी जैसे सार्वजनिक और संवेदनशील परिसर की आती है, तो वही लोग दूसरों की परेशानी और सुरक्षा को नजरअंदाज कर देते हैं। यह दोहरा व्यवहार न सिर्फ अनुशासनहीनता है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी से भी मुंह मोड़ना है।
कमिश्नरी में रोजाना सैकड़ों फरियादी अपनी समस्याएं लेकर आते हैं। बुजुर्ग, महिलाएं, दिव्यांगजन—सभी को इन बेतरतीब खड़ी गाड़ियों के कारण दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। मुख्य मार्ग और इमरजेंसी रास्ते तक अवरुद्ध हो जाते हैं। अगर किसी समय एंबुलेंस या फायर ब्रिगेड को अंदर जाना पड़े, तो यही वाहन सबसे बड़ी बाधा बन सकते हैं। ऐसे में यह लापरवाही सीधे-सीधे जान जोखिम में डालने जैसी है।
कई कर्मचारियों का कहना है कि कुछ लोग खुद को नियमों से ऊपर समझते हैं, जिससे कार्रवाई भी प्रभावी नहीं हो पाती। यही वजह है कि बार-बार चेतावनी के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। अब जरूरत केवल अपील की नहीं, बल्कि सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई की है।
प्रशासन को चाहिए कि अवैध पार्किंग पर तुरंत जुर्माना, व्हील लॉक और टोइंग जैसी सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे। साथ ही स्पष्ट संकेतक और पार्किंग व्यवस्था को और सुदृढ़ किया जाए, ताकि कोई बहाना न बचे। सबसे जरूरी है—कानून सबके लिए बराबर है, यह संदेश जमीनी स्तर पर लागू होता दिखे।
सार्वजनिक स्थल पर अनुशासन ही असली ‘शान’ है, न कि मनमानी। अगर अपने दरवाजे पर खड़ी गाड़ी से आपत्ति होती है, तो कमिश्नरी में दूसरों को परेशानी देना कैसे सही हो सकता है? समय रहते सुधार जरूरी है, वरना यह लापरवाही किसी बड़े हादसे की वजह बन सकती है।