विस्तृत होता भिक्षावृत्ति क्षेत्र- क़्या भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और जागरूकता की कमी के कारण सरकारी सहायता वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाती?
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत आज विकसित भारत 2047 के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर तेजी से अग्रसर है। विश्व की चौथी बड़े सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के साथ आर्थिक वृद्धि, डिजिटल क्रांति, वैश्विक कूटनीति और बुनियादी ढांचे के विस्तार के बीच एक ऐसा सामाजिक यथार्थ भी मौजूद है,जो इस विकास यात्रा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है और वह है भिक्षावृत्ति की व्यापक समस्या। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर महानगरों तक, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन,बाजार, धार्मिक स्थलों और यहां तक कि कॉर्पोरेट ऑफिसों के बाहर भी महिलाओं, बुजुर्गों युवाओं और बच्चों को भीख मांगते देखना एक आम दृश्य बन चुका है।यह केवल एक सामाजिकसमस्या नहीं, बल्कि राष्ट्र के गौरव,शासन की प्रभावशीलता और विकास के वास्तविक स्वरूप पर गहन प्रश्न उठाने वाला मुद्दा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहता हूं कि सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब केंद्र और राज्य सरकारें महिलाओं, बुजुर्गों, बच्चों और युवाओं के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं, तो फिर यह वर्ग भीख मांगने के लिए क्यों मजबूर है? क्या यह योजनाओं के क्रियान्वयन में कमी का संकेत है? या फिर यह समस्या कहीं अधिक जटिल है,जिसमें आर्थिक असमानता सामाजिक बहिष्कार मानसिक स्वास्थ्य,शिक्षा की कमी और संगठित अपराध जैसे कारक भी शामिल हैं?यह स्पष्ट है कि भिक्षावृत्ति को केवल गरीबी से जोड़कर देखना एक सरलीकरण होगा; यह एक बहुआयामी समस्या है,जिसके समाधान के लिए बहुस्तरीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
साथियों बात अगर हम यदि हम गहराई से विश्लेषण कर इस मुद्दे को समझने की करें तो, भिक्षावृत्ति के पीछे तीन प्रमुख कारण उभरकर सामने आते हैं,मजबूरी, पेशा और आदत। मजबूरी के अंतर्गत वे लोग आते हैं, जो वास्तव में आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर हैं, जिनके पास कोई स्थायी आय का स्रोत नहीं है, और जो सामाजिक सुरक्षा तंत्र से वंचित रह गए हैं। पेशा के रूप में भिक्षावृत्ति उन संगठित गिरोहों से जुड़ी होती है, जो बच्चों और महिलाओं को जबरन भीख मंगवाते हैं। वहीं, आदत के रूप में भिक्षावृत्ति उन लोगों में देखी जाती है, जिन्होंने इसे एक आसान आय का साधन मान लिया है। इन तीनों श्रेणियों के लिए एक समान समाधान संभव नहीं है; प्रत्येक के लिए अलग-अलग नीति और रणनीति की सटीक आवश्यकता है।
साथियों बात अगर मेरे द्वारा की गई प्रस्तुत ग्राउंड रिपोर्टिंग को समझने की करें तो,महाराष्ट्र के अंतिम शोर पर बसी राइस सिटी गोंदिया में हर मंगलवार को एक विशेष दिन के रूप में भिक्षावृत्ति का मेला लगा रहता है यहां केवल लोकल ही नहीं है बाहर से भी महिलाओं बुजुर्गों बच्चों युवाओं के रूप में अनेक भिक्षुक भिक्षा मांगने आते हैं जो मैंने इस मंगलवार 31 मार्च 2026 को दिन भर ग्राउंड रिपोर्टिंग करके दिखा ज़ो यह दर्शाता है कि यह समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी बन चुकी है। जब समाज में कुछ दिन या अवसर विशेष रूप से भिक्षा दान के लिए निर्धारित हो जाते हैं,तो अनजाने में हम भिक्षावृत्ति को प्रोत्साहित भी कर देते हैं। यह स्थिति एक दुष्चक्र को जन्म देती है, जहां दान देने वाला स्वयं को पुण्य प्राप्त करने वाला मानता है और लेने वाला इसे एक स्थायी आय का स्रोत बना लेता है।
साथियों अब यदि हम सरकारी योजनाओं और वित्तीय प्रावधानों की बात करें, तो दिनांक 31 मार्च 2026 को सरकारी रेडियो व संचार के अनेक माध्यमों से यह समाचार बताए जा रहे थे कि 15वें वित्त आयोग द्वारा स्थानीय निकायों को दी जाने वाली राशि,जैसे कि अभी 2 दिन पूर्व लगभग 2 करोड़ 36 लाख 805 रुपए का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी स्तर पर बुनियादी सुविधाओं को सुदृढ़ करना,रोजगार के अवसर बढ़ाना और सामाजिक कल्याण को सुनिश्चित करना है। यह राशि पंचायतों और नगर निकायों के माध्यम से स्वास्थ्य, स्वच्छता, पेयजल, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों पर खर्च की जाती है। लेकिन यहां मूल समस्या आवंटन नहीं, बल्कि कार्यान्वयन है। यदि यह धन सही तरीके से लक्षित लाभार्थियों तक पहुंचे, तो भिक्षावृत्ति जैसी समस्याओं में निश्चित रूप से कमी आ सकती है। परंतु अक्सर देखा जाता है कि भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और जागरूकता की कमी के कारण यह सहायता वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाती। इसके अतिरिक्त, कई बार योजनाएं इतनी जटिल होती हैं कि आम व्यक्ति उनके लाभ तक पहुंच ही नहीं पाता। डिजिटल प्रक्रियाएं, दस्तावेजों की आवश्यकता और सरकारी दफ्तरों के चक्कर ये सब उन लोगों के लिए बड़ी बाधाएं बन जाती हैं, जो पहले से ही हाशिए पर हैं। परिणाम स्वरूप, वे आसान रास्ता चुनते हैं भीख मांगना। इस संदर्भ में यह भी आवश्यक है कि हम भिक्षावृत्ति को केवल कानून और व्यवस्था का मुद्दा न मानें, बल्कि इसे मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से भी देखें। यदि कोई बुजुर्ग सड़क पर भीख मांग रहा है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राज्य तीनों की सामूहिक विफलता है। यदि कोई बच्चा भीख मांग रहा है, तो यह सीधे-सीधे उसके शिक्षा और संरक्षण के अधिकार का उल्लंघन है।
साथियों बात अगर हम भिक्षावृत्ति को कानूनी एंगल से समाप्त करने को समझने की करें तो भीख मांगने की समस्या केवल कानून से नहीं,बल्कि सामाजिक-आर्थिक सुधार, पुनर्वास और मानवीय दृष्टिकोण से ही प्रभावी रूप से हल हो सकती है। फिर भी, मेरे द्वारा बनाए गए इन 10 कानूनी ढांचों क़ो यदि सरकार एक सख्त और समग्र ढांचा बनाना चाहे, तो निम्नलिखित 10 संभावित कानून (या विधेयक) बनाए जा सकते हैं: (1) भिक्षावृत्ति निषेध एवं पुनर्वास अधिनियम-यह कानून सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगने पर रोक लगाएगा और साथ ही भिक्षुकों के लिए अनिवार्य पुनर्वास केंद्रों की व्यवस्था करेगा।(2) बाल भिक्षावृत्ति संरक्षण अधिनियम- इस कानून के तहत बच्चों से भीख मंगवाने वालों पर कठोर दंड (जेल + भारी जुर्माना) लगाया जाएगा तथा बच्चों को शिक्षा और संरक्षण दिया जाएगा।(3)वरिष्ठ नागरिक संरक्षण एवं पुनर्वास कानून- बुजुर्गों को भीख मांगने की स्थिति में पहुंचाने वाले परिजनों या जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई और बुजुर्गों के लिए आश्रय व पेंशन की व्यवस्था। (4) महिला भिक्षावृत्ति उन्मूलन अधिनियम-महिलाओं को भीख मांगने के लिए मजबूर करने वाले गिरोहों या व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और महिलाओं के लिए सुरक्षित पुनर्वास योजनाएं।(5)संगठित भिक्षावृत्ति गिरोह नियंत्रण कानून-भीख मंगवाने वाले माफिया/गिरोहों के खिलाफ विशेष कानून, जिसमें मानव तस्करी और जबरन भिक्षावृत्ति को गंभीर अपराध माना जाए।(6) अनिवार्य कौशल विकास एवं रोजगार अधिनियम-पुनर्वास के दौरान भिक्षुकों को कौशल प्रशिक्षण और रोजगार उपलब्ध कराना अनिवार्य बनाया जाए।(7) सार्वजनिक स्थानों पर भीख निषेध कानून-रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, धार्मिक स्थल, बाजार आदि में भीख मांगने परप्रतिबंध और उल्लंघन पर दंड। (8) सामाजिक सुरक्षा एवं न्यूनतम आय गारंटी कानून- गरीब और बेघर लोगों के लिए न्यूनतम आय, भोजन, आवास और स्वास्थ्य सुविधाओं की कानूनी गारंटी ताकि वे भीख मांगने के लिए मजबूर न हों।(9) दान विनियमन एवं पारदर्शिता कानून- सार्वजनिक स्थानों पर सीधे भीख देने पर रोक और दान को अधिकृत संस्थाओं/एनजीओ के माध्यम से देने की व्यवस्था। (10) पुनर्वास केंद्र नियमन एवं निगरानी अधिनियम- सभी पुनर्वास केंद्रों के लिए मानक तय करना, नियमित निरीक्षण और मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना।यह 10 संभावित कानून इस समस्या के समाधान के लिए एक मजबूत ढांचा प्रस्तुत करते हैं। भिक्षावृत्ति निषेध एवं पुनर्वास अधिनियम, बाल भिक्षावृत्ति संरक्षण अधिनियम, महिला और वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष कानून ये सभी आवश्यक कदम हैं। विशेष रूप से संगठित भिक्षावृत्ति गिरोहों पर कठोर कार्रवाई अत्यंत जरूरी है, क्योंकि यह केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि मानव तस्करी का भी एक रूप है।परंतु भीख मांगने पर केवल प्रतिबंध लगाना पर्याप्त नहीं होगा। यदि कानून के साथ,शिक्षा,रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और पुनर्वास को जोड़ा जाए, तभी यहसमस्या जड़ से खत्म हो सकती है अन्यथा सख्त कानून केवल समस्या को छिपाएंगे,खत्म नहीं करेंगे।हालांकि, केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। भारत में पहले से ही कई राज्यों में भिक्षावृत्ति विरोधी कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव सीमित रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि कानून अक्सर दंड पर केंद्रित होते हैं,जबकि समस्या का समाधान पुनर्वास और “सशक्तिकरण” में निहित है। यदि किसी व्यक्ति को भीख मांगने के लिए गिरफ्तार कर लिया जाए, लेकिन उसके लिए कोई वैकल्पिक आजीविका का साधन न हो, तो वह रिहा होने के बाद फिर उसी स्थिति में लौट आएगा।इसलिए, आवश्यक है कि पुनर्वास केंद्रों को केवल आश्रय स्थल न बनाकर, उन्हें कौशल विकास और रोजगार सृजन के केंद्रों में परिवर्तित किया जाए। अनिवार्य कौशल विकास एवं रोजगार अधिनियम जैसे प्रावधान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि भिक्षुकों को प्रशिक्षण देकर उन्हें छोटे व्यवसाय, हस्तशिल्प, सेवा क्षेत्र या अन्य क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराया जाए, तो वे आत्मनिर्भर बन सकते हैं।साथ ही, सामाजिक सुरक्षा एवं न्यूनतम आय गारंटी जैसे उपाय भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि प्रत्येक नागरिक को न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी मिले जिसमें भोजन, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा शामिल हो तो भिक्षावृत्ति की आवश्यकता स्वतः कम हो जाएगी। इसके अलावा, दान की संस्कृति को भी पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। सीधे भीख देने के बजाय, लोगों को अधिकृत संस्थाओं और एनजीओ के माध्यम से सहायता प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।यहां मीडिया और समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अक्सर हम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अन्य देशों की आर्थिक स्थिति पर व्यंग्य करते हैं, लेकिन अपने देश की जमीनी हकीकत को नजर अंदाज कर देते हैं। यदि हमें वास्तव में विकसित भारत बनना है, तो हमें अपने भीतर की समस्याओं का ईमानदारी से सामना करना होगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि भिक्षावृत्ति की समस्या का समाधान एक समग्र दृष्टिकोण में निहित है जहां कानून, सामाजिक सुधार, आर्थिक सशक्तिकरण और मानवीय संवेदनाएं एक साथ काम करें। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज, परिवार और प्रत्येक नागरिक की भी जिम्मेदारी है। हमें यह समझना होगा कि भिक्षावृत्ति को समाप्त करना केवल “देश की छवि” सुधारने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों को गरिमापूर्ण जीवन देने का संकल्प है।यदि हम इस समस्या को गंभीरता से लेते हैं और समन्वित प्रयास करते हैं, तो न केवल भिक्षावृत्ति में कमी लाई जा सकती है, बल्कि हम वास्तव में एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकते हैं, जहां किसी को भी अपनी जीविका के लिए हाथ फैलाने की आवश्यकता न पड़े। यही सच्चे अर्थों में विकसित भारत 2047 का मार्ग है जहां विकास केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के जीवन में परिलक्षित हो।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र