डॉ. सतीश पाण्डेय
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र मानता है। उसे लगता है कि वह अपनी इच्छानुसार सोचता है, निर्णय लेता है और जीवन जीता है। किंतु यदि वह एक क्षण ठहरकर अपने अंतर्मन में झांके तो पाएगा कि उसका अधिकांश जीवन उन इच्छाओं, वासनाओं, मोह, भय, लोभ और अहंकार के इर्द-गिर्द घूमता है, जिन्हें उसने स्वयं कभी चुना भी नहीं। यही अदृश्य बंधन हैं, जो जीव को जन्म-मरण के चक्र से लेकर दैनिक जीवन की अशांति तक बांधे रखते हैं। भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व इस सत्य का उद्घोष किया था कि जीव का वास्तविक बंधन संसार नहीं, बल्कि संसार के प्रति उसकी आसक्ति है।
यह सृष्टि अपने आप में न तो बंधन है और न ही मुक्ति। वही संसार किसी के लिए तपो भूमि बन जाता है और किसी के लिए दुःख का अथाह सागर। अंतर केवल दृष्टि का है। जिस मनुष्य ने वस्तुओं का उपयोग करना सीखा, वह स्वतंत्र हो गया, जिसने वस्तुओं को अपना स्वामी बना लिया, वह बंध गया। इसलिए धार्मिक ग्रंथो से लेकर संत साहित्य तक एक ही स्वर सुनाई देता है—बंधन वस्तुओं में नहीं, मन की वृत्तियों में है।
आज का युग अभूतपूर्व उपलब्धियों का युग है। विज्ञान ने दूरी मिटा दी है, तकनीक ने जीवन को सरल बनाया है, संसाधनों की भरमार है, किंतु मनुष्य के भीतर का खालीपन बढ़ता जा रहा है। सुविधाएं बढ़ीं, पर संतोष घटा। संपर्क बढ़े, पर संबंध कमजोर हुए। धन बढ़ा, पर दया कम हो गई। सूचना का विस्फोट हुआ, पर आत्मज्ञान का प्रकाश धुंधला पड़ता गया। यह विरोधाभास इसलिए है कि मनुष्य ने बाहर की दुनिया को जीतने में अपनी सारी शक्ति लगा दी, लेकिन भीतर के मन को जीतने का प्रयास नहीं किया।
भारतीय दर्शन कहता है कि इंद्रियां स्वभाव से विषयों की ओर दौड़ती हैं। आंख रूप चाहती है, कान मधुर शब्द, जिह्वा स्वाद, त्वचा स्पर्श और नासिका सुगंध। जब मन इन विषयों में स्थायी सुख खोजने लगता है, तब आसक्ति जन्म लेती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है, कामना से अपेक्षा, अपेक्षा से निराशा और निराशा से क्रोध। क्रोध विवेक को नष्ट करता है और विवेक के नष्ट होते ही मनुष्य अपने ही बनाए बंधनों का कैदी बन जाता है। यही वह मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक श्रृंखला है, जिसे भारतीय मनीषियों ने अत्यंत सूक्ष्मता से समझाया है।
इसी सत्य को गोस्वामी तुलसीदास ने अपने काव्य में अत्यंत सरल किंतु गहन शब्दों में व्यक्त किया है। वे कहते हैं—”मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला।” अर्थात मोह सभी मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक व्याधियों का मूल कारण है। जब मनुष्य किसी वस्तु, व्यक्ति, पद या प्रतिष्ठा के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है, तब उसका विवेक ढक जाता है और वह सत्य का निर्णय नहीं कर पाता। यही मोह धीरे-धीरे लोभ, क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार का रूप धारण कर लेता है। तुलसीदास का यह विचार भारतीय दर्शन की उसी धारा का विस्तार है, जो मन को ही बंधन और मुक्ति का कारण मानता है।
तुलसीदास आगे कहते हैं—”पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।” सामान्यतः इस पंक्ति को सामाजिक या राजनीतिक संदर्भ में देखा जाता है, किंतु इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं, वासनाओं, क्रोध, लोभ और अहंकार का दास है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। वास्तविक पराधीनता बाहरी नहीं, बल्कि मन की पराधीनता है। जिसने अपने मन को जीत लिया, वही सच्चा स्वतंत्र है।
संतों ने बार-बार चेताया कि संसार का त्याग आवश्यक नहीं, बल्कि आसक्ति का त्याग आवश्यक है। कमल का फूल कीचड़ में खिलता है, पर कीचड़ उससे चिपक नहीं पाती। नाव जल पर चलती है, लेकिन जल यदि नाव के भीतर भर जाए तो वही नाव डूब जाती है। ठीक इसी प्रकार संसार में रहना बंधन नहीं है; संसार को अपने भीतर भर लेना ही बंधन है। तुलसीदास के रामचरितमानस का प्रत्येक पात्र इसी सत्य का जीवन्त उदाहरण है। भगवान राम राजमहल में रहते हुए भी मर्यादा के प्रतीक हैं और वन में रहकर भी शांत एवं संतुलित हैं। इससे स्पष्ट होता है कि स्थान नहीं, मनःस्थिति मनुष्य को बाँधती या मुक्त करती है।
आज मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उसने अपनी पहचान को बाहरी उपलब्धियों से जोड़ लिया है। पद चला जाए तो आत्मविश्वास चला जाता है। धन घट जाए तो सम्मान का भ्रम टूट जाता है। प्रशंसा न मिले तो मन बेचैन हो उठता है। इसका कारण यह है कि हमने अपने वास्तविक स्वरूप को भुलाकर स्वयं को केवल शरीर, पद और संपत्ति तक सीमित कर लिया है। जबकि भारतीय आध्यात्मिक चिंतन कहता है कि जीव मूलतः चेतना है, आत्मा है, जो न जन्म लेती है और न मरती है। बंधन इसी विस्मृति का नाम है और मुक्ति इसी स्मृति की पुनर्प्राप्ति। तुलसीदास भी बार-बार स्मरण कराते हैं कि ईश्वर का स्मरण और आत्मचिंतन ही मनुष्य को मोह से मुक्त कर सकता है।
जीवन का उद्देश्य भोगों से भागना नहीं, बल्कि उनका विवेक पूर्ण उपयोग करना है। धन कमाना अधर्म नहीं, धन का अहंकार अधर्म है। परिवार से प्रेम करना दोष नहीं, मोह में विवेक खो देना दोष है। सफलता प्राप्त करना अनुचित नहीं, सफलता को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेना भ्रम है। कर्म करते हुए भी यदि मनुष्य फल के मोह से ऊपर उठ सके, तो वही कर्मयोग बन जाता है। यही भारतीय संस्कृति का सबसे व्यावहारिक संदेश है। तुलसीदास ने भी भक्ति, कर्तव्य और वैराग्य का ऐसा समन्वय प्रस्तुत किया, जिसमें जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन का परिष्कार है।
आज समाज अनेक प्रकार के मानसिक तनावों, पारिवारिक विघटन, प्रतिस्पर्धा, हिंसा और असंतोष से गुजर रहा है। इन समस्याओं का समाधान केवल कानून, तकनीक या आर्थिक विकास से नहीं होगा। इसके लिए मनुष्य को अपने भीतर लौटना होगा। शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का आधार बनाना होगा। परिवारों में संस्कारों का पुनर्जागरण, समाज में नैतिकता का सम्मान और जीवन में आत्मानुशासन की प्रतिष्ठा ही व्यक्ति को भीतर से मुक्त कर सकती है। तुलसीदास ने जिस रामराज्य की कल्पना की, उसका आधार केवल सुशासन नहीं, बल्कि आत्म-संयम, करुणा, सत्य और धर्म था।
वास्तविक स्वतंत्रता तब नहीं मिलती जब परिस्थितियां हमारे अनुकूल हों, बल्कि तब मिलती है जब हमारा मन परिस्थितियों का दास न रहे। जिस दिन मनुष्य अपनी इच्छाओं का स्वामी बन जाएगा, उसी दिन उसके बंधनों की जंजीरें टूटने लगेंगी। यही संतों का संदेश है, यही भारतीय दर्शन का सार है और यही आधुनिक समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।
जीव का बंधन बाहर की दुनिया ने नहीं बनाया उसे हमारे ही मन ने रचा है। इसलिए मुक्ति का मार्ग भी बाहर नहीं, भीतर से ही प्रारंभ होता है। जब मन विषयों का दास बनने के बजाय विवेक का अनुयायी बनता है, जब कर्म सेवा का माध्यम बनता है और जब जीवन आत्मबोध की यात्रा में बदल जाता है, तभी मनुष्य सच्चे अर्थों में स्वतंत्र होता है। तुलसीदास का संपूर्ण साहित्य इसी निष्कर्ष की पुष्टि करता है कि मोह से मुक्ति, मर्यादा का पालन, भक्ति का आश्रय और आत्मसंयम का अभ्यास ही जीव को बंधन से मुक्त कर सकता है। यही स्वतंत्रता मोक्ष का प्रथम सोपान है और यही मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।