Wednesday, July 29, 2026
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गैस-पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर सपा का विरोध, जनता की समस्याओं को लेकर उठी आवाज

भाजपा सरकार की नीतियों पर सपा लोहिया वाहिनी का हमला, महंगाई-बेरोजगारी को लेकर उठाए सवाल


देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। समाजवादी लोहिया वाहिनी के जिलाध्यक्ष दिव्यांश श्रीवास्तव ने शनिवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकार पर जनविरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है, जिससे आम जनता परेशान है।
दिव्यांश श्रीवास्तव ने कहा कि चुनाव समाप्त होते ही गैस सिलेंडर, पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार महंगाई नियंत्रित करने में पूरी तरह असफल साबित हुई है। बढ़ती बेरोजगारी के कारण शिक्षित युवा निराश हैं और रोजगार के अभाव में मानसिक दबाव झेल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि प्रदेश के कई सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है और अधिकारी-कर्मचारी बेलगाम हो चुके हैं। किसानों और व्यापारियों की समस्याओं की अनदेखी की जा रही है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से खेती-किसानी की लागत बढ़ रही है, जिससे किसानों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है।
सपा नेता ने प्रदेश की कानून व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और आम जनता को न्याय नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार में गरीब, किसान और आम नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
दिव्यांश श्रीवास्तव ने कहा कि उत्तर प्रदेश शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पिछड़ता जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता भाजपा सरकार को सत्ता से बाहर करने का निर्णय लेगी।

80 वर्ष की उम्र में अंग्रेजों को ललकारने वाले वीर कुंवर सिंह को बलिया में भावभीनी श्रद्धांजलि


बलिया (राष्ट्र की परंपरा) प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू कुंवर सिंह के बलिदान दिवस पर जनपद भर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसी क्रम में स्थानीय पंडित दीनदयाल चबूतरा पर एक भव्य सभा का आयोजन हुआ, जहां बड़ी संख्या में लोगों ने एकत्र होकर वीर सपूत को नमन किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भाजपा नेता व समाजसेवी अनूप सिंह ने पुष्पांजलि अर्पित करते हुए कहा कि बाबू कुंवर सिंह भारतीय स्वाभिमान, साहस और वीरता के अद्वितीय प्रतीक थे। उन्होंने कहा कि 80 वर्ष की आयु में जिस अदम्य साहस के साथ उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी, वह आज भी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि देशभक्ति के लिए उम्र नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और मजबूत इरादों की आवश्यकता होती है।
सभा में वक्ताओं ने उनके संघर्षों को याद करते हुए बताया कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में कुंवर सिंह ने न केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ बिगुल फूंका, बल्कि सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी रणनीति और नेतृत्व क्षमता से कई मोर्चों पर अंग्रेजों को पराजित किया। उनका साहस और नेतृत्व भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
इस अवसर पर संजय राय, सोनू सिंह, संजय चौबे, अमित सिंह, अभिषेक यादव, अंकित ठाकुर सहित दर्जनों गणमान्य नागरिक, युवा और कार्यकर्ता उपस्थित रहे। सभी ने उनके आदर्शों पर चलने और राष्ट्रहित में योगदान देने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ, जहां उपस्थित लोगों ने वीर कुंवर सिंह के बलिदान को नमन करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया।

डिजिटल संप्रभुता,लोकतंत्र और सोशल मीडिया जवाबदेही :मेटा विवाद, नीट आंदोलन और उभरती वैश्विक नीति चुनौती -28 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणियां -समग्र व्यापक विश्लेषण

भारतीय पीएम द्वारा जेन- ज़ेड, को संबोधित एक फेसबुक पोस्ट, वीडियो प्लेटफ़ॉर्म से हट जाने की घटना ने अनेक प्रश्न खड़े किए -मेटा ने तकनीकी त्रुटि बताते सामग्री पुनःबहाल क़ी 

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में वर्ष 2026 का नीट पेपर लीक विवाद केवल एक परीक्षा की विश्वसनीयता का प्रश्न नहीं रहा,बल्कि यह युवाओं के विश्वास, लोकतांत्रिक अधिकारों, न्यायपालिका की भूमिका, सरकार की जवाबदेही तथा वैश्विक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की शक्ति से जुड़ा बहुआयामी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषय बन गया।जंतर-मंतर पर हुआ व्यापक छात्र आंदोलन, उसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, न्यायपालिका की सक्रियता तथा भारतीय प्रधानमंत्री  की फेसबुक पोस्ट हटाए जाने को लेकर मेटा और भारत सरकार के बीच उत्पन्न विवाद,मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इन सभी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि इक्कीसवीं सदी का लोकतंत्र केवल संसद न्यायालय और चुनाव तक सीमित नहीं रह गया है।अब सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म भी लोकतांत्रिक विमर्श के निर्णायक मंच बन चुके हैं।जंतर-मंतर पर हजारों छात्रों और युवाओं द्वारा किया गया आंदोलन भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जा सकता है। इस आंदोलन का मूल उद्देश्य केवल नीट परीक्षा की निष्पक्षता सुनिश्चित करना नहीं था, बल्कि यह संदेश देना भी था कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और समान अवसर लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला हैं। इस आंदोलन ने भारत के भीतर व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तथा वैश्विक शिक्षा जगत का भी ध्यान आकर्षित किया।इससे यह संदेश गया कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपने युवाओं की आवाज़ को गंभीरता से सुनने की क्षमता रखता है।आंदोलन के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को कई विश्लेषकों ने राजनीतिक जवाबदेही का उदाहरण माना। लोकतांत्रिक शासन में मंत्री केवल प्रशासनिक प्रमुख नहीं होते, बल्कि वे नैतिक उत्तरदायित्व का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।यद्यपि किसी भी इस्तीफे के पीछे अनेक राजनीतिक और प्रशासनिक कारण हो सकते हैं,फिर भी जनता के बीच यह धारणा बनी कि लोकतांत्रिक दबाव और जनआंदोलन शासन को उत्तरदायी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दावों,घटनाक्रमों और लोकतांत्रिक विमर्श के आधार पर विश्लेषण प्रस्तुत करता है।जिन मामलों का संबंध न्यायालय, सरकारी जांच अथवा आधिकारिक पुष्टि से है,उन्हें अंतिम तथ्य नहीं बल्कि उपलब्ध सूचनाओं के संदर्भ में सटीकता से देखा जाना चाहिए। 

साथियों, 28 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हुईसुनवाई ने इस पूरे घटनाक्रम को नया आयाम दिया। विभिन्न समाचार रिपोर्टों के अनुसार न्यायालय ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार,कानून के समक्ष समानता तथा अनावश्यक कठोर कार्रवाई से बचने की आवश्यकता पर गंभीर टिप्पणियाँ कीं। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि अदालत ने 18 वर्ष से कम आयु के आंदोलनकारियों तथा ऐसे प्रदर्शनकारियों के संबंध में, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था,तत्काल मानवीय और विधिसम्मत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। न्यायालय की कार्यवाही का व्यापक संदेश यही माना गया कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और राज्य की शक्ति का प्रयोग संविधान की सीमाओं के भीतर होना चाहिए। अंतिम और बाध्यकारी स्थिति न्यायालय के आधिकारिक आदेश से ही निर्धारित होती है। 

साथियों, इस पूरे घटनाक्रम के समानांतर एक दूसरा विवाद सामने आया जिसने राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर डिजिटल शासन और तकनीकी कंपनियों की जवाबदेही पर वैश्विक बहस छेड़ दी।भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा युवाओं,विशेषकर जेन- ज़ेड, को संबोधित एक फेसबुक पोस्ट और वीडियो प्लेटफ़ॉर्म से हट जाने की घटना ने अनेक प्रश्न खड़े कर दिए। बाद में मेटा ने इसे तकनीकी त्रुटि बताते हुए सामग्री पुनःबहाल कर दी,किंतु विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ।भारत सरकार ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना और विस्तृत जानकारी मांगी कि इतनी महत्वपूर्ण आधिकारिक सामग्री आखिर किस प्रक्रिया और किस कारण से हटाई गई।यहीं से यह विवाद केवल एक पोस्ट हटने का नहीं रहा, बल्कि डिजिटल संप्रभुता का विषय बन गया। किसी भी संप्रभु राष्ट्र का यह स्वाभाविक अधिकार है कि उसके निर्वाचित नेतृत्व और सरकारी संचार से संबंधित डिजिटल सामग्री के प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्पष्ट प्रक्रिया हो। यदि किसी वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म पर करोड़ों नागरिक सूचना प्राप्त करते हैं, तो उस प्लेटफ़ॉर्म की नीतियाँ भी सार्वजनिक विश्वास की कसौटी पर सटीकता से  परखी जाएँगी। 

साथियों, मेटा,जो फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे विश्व के सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म संचालित करती है,लंबे समय से विभिन्न देशों में सामग्री मॉडरेशन, गोपनीयता, डेटा सुरक्षा और स्थानीय कानूनों के अनुपालन को लेकर चर्चा और विवाद का विषय रही है। भारत में भी समय-समय पर उस पर भड़काऊ सामग्री हटाने में देरी, फर्जी समाचारों के प्रसार और नियामकीय अनुपालन जैसे मुद्दों पर प्रश्न उठते रहे हैं। इसलिए प्रधानमंत्री की पोस्ट हटने की घटना ने इन पुराने विवादों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया।सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार का दृष्टिकोण यह है कि तकनीकी गलती जैसे सामान्य स्पष्टीकरण से इतने महत्वपूर्ण मामले का समाधान नहीं हो सकता।यदि किसी एल्गोरिद्म, स्वचालित प्रणाली या आंतरिक मॉडरेशन प्रक्रिया के कारण ऐसी घटना हुई, तो उसकी पूरी पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। यही कारण है कि संबंधित अधिकारियों से विस्तृत स्पष्टीकरण और जवाबदेही की अपेक्षा की गई। 

साथियों,दूसरी ओर, तकनीकी कंपनियों का पक्ष भी समझना आवश्यक है। मेटा का कहना रहा कि सामग्री गलती से हट गई थी और जैसे ही त्रुटि का पता चला, उसे तुरंत बहाल कर दिया गया। बड़े डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म प्रतिदिन अरबों पोस्ट, वीडियो और संदेशों का प्रबंधन करते हैं। ऐसे में स्वचालित एल्गोरिद्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियाँ कभी-कभी गलत निर्णय भी ले सकती हैं। किंतु प्रश्न केवल त्रुटि का नहीं, बल्कि उसके निवारण की पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और संस्थागत प्रक्रिया का है।यहीं से एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता और डिजिटल जवाबदेही जैसे सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यदि कोई एल्गोरिद्म यह तय करता है कि कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी, कौन-सी सीमित होगी और कौन-सी हटाई जाएगी, तो लोकतांत्रिक समाज यह जानना चाहेगा कि वह निर्णय किन मानकों पर आधारित था।आधुनिक लोकतंत्र में तकनीकी निर्णय भी सार्वजनिक उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकते। 

साथियों, इस विवाद ने भारत में स्वदेशी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म विकसित करने की मांग को भी बल दिया। अनेक विशेषज्ञों का मत है कि जिस प्रकार भारत ने डिजिटल भुगतान, आधार, यूपीआई और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में वैश्विक मॉडल प्रस्तुत किया है,उसी प्रकार भविष्य में सुरक्षित, पारदर्शी और भारतीय कानूनों के अनुरूप सोशल मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की दिशा में भी गंभीर प्रयास किए जा सकते हैं। हालांकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि कोई भी नया प्लेटफ़ॉर्म अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गोपनीयता और प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों का सम्मान करे।यह विवाद केवल भारत तक सीमित नहीं है। यूरोपीय संघ ने डिजिटल सर्विसेज़ एक्ट, डिजिटल मार्केट्स एक्ट और एआई एक्ट जैसे व्यापक कानूनों के माध्यम से बड़ी तकनीकी कंपनियों पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास किया है। अमेरिका में भी सामग्री मॉडरेशन, प्रतिस्पर्धा, डेटा सुरक्षा और प्लेटफ़ॉर्म की शक्ति को लेकर लगातार बहस जारी है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राज़ील तथा अनेक अन्य लोकतांत्रिक देशों ने भी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की भूमिका पर नए नियामकीय ढाँचे सटीकता से विकसित किए हैं। 

साथियों, भारत भी डिजिटल इंडिया, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन व्यवस्था,आईटी नियमों और साइबर सुरक्षा ढाँचों के माध्यम से संतुलित डिजिटल शासन स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। चुनौती यह है कि तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहन भी मिले और नागरिक अधिकारों, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा भी सुनिश्चित हो।कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस पूरी बहस को और अधिक जटिल बना दिया है। अब केवल पोस्ट हटाने या दिखाने का प्रश्न नहीं है। एआई यह भी निर्धारित करता है कि कौन- सी सामग्री किस उपयोगकर्ता तक पहुँचेगी,कौन-सा वीडियो वायरल होगा और किस समाचार को प्राथमिकता मिलेगी। यदि इन प्रणालियों में पारदर्शिता नहीं होगी, तो लोकतांत्रिक विमर्श पर उनका प्रभाव अत्यधिक व्यापक हो सकता है। डेटा आज केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्ति बन चुका है।नागरिकों का डिजिटल व्यवहार, सामाजिक संबंध, वित्तीय गतिविधियाँ और सूचना उपभोग इन सबका विशाल डेटा भविष्य की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों को प्रभावित करता है। इसलिए डिजिटल संप्रभुता केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि शासन, सुरक्षा और नागरिक अधिकारों का मूल प्रश्न बन चुकी है।भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती संतुलन स्थापित करना है।एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का मूल अधिकार है, वहीं दूसरी ओर फर्जी समाचार,डीपफेक, साइबर अपराध औरडिजिटल दुष्प्रचार जैसी चुनौतियाँ भी वास्तविक हैं। यदि नियमन अत्यधिक कठोर होगा तो स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है,और यदि नियमन अत्यधिक शिथिल होगा तो डिजिटल अराजकता बढ़ सकती है। इसलिए पारदर्शी, न्यायसंगत और न्यायिक समीक्षा के अधीन नियामकीय व्यवस्था ही दीर्घकालिक समाधान हो सकती है। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि नीट आंदोलन, सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता, राजनीतिक जवाबदेही और मेटा विवाद, इन सभी घटनाओं ने एक साझा संदेश दिया है कि लोकतंत्र का भविष्य केवल संस्थागत शक्ति पर नहीं, बल्कि नागरिक विश्वास,पारदर्शिता और डिजिटल उत्तरदायित्व पर भी निर्भर करेगा।आज आवश्यकता सरकार और तकनीकी कंपनियों के बीच टकराव की नहीं,बल्कि नियम-आधारित सहयोग,स्पष्ट जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों के सम्मान की है।यदि लोकतंत्र नागरिकों की आवाज़ है,तो डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म उस आवाज़ का आधुनिक माध्यम हैं। यदि संप्रभुता किसी राष्ट्र की आत्मा है, तो डिजिटल संप्रभुता उसकी डिजिटल पहचान, सुरक्षा और भविष्य की दिशा है। इसलिए मेटा से जुड़ा यह विवाद केवल एक पोस्ट या वीडियो हटने का मामला नहीं माना जा सकता;यह उस व्यापक वैश्विक प्रश्न का प्रतीक है कि डिजिटल युग में लोकतंत्र, तकनीक और कॉर्पोरेट शक्ति के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। आने वाले वर्षों में यही प्रश्न अंतरराष्ट्रीय कानून, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

PWD निर्माण कार्यों में रॉयल्टी भुगतान व्यवस्था को लेकर प्रदेशभर के ठेकेदारों की बढ़ी चिंता

उत्तर प्रदेश के ठेकेदारों ने मुख्यमंत्री से लगाई गुहार, उपखनिज रॉयल्टी भुगतान व्यवस्था पर तत्काल निर्णय की मांग


लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश ठेकेदार कल्याण समिति ने लोक निर्माण विभाग (PWD) में निर्माण कार्यों के लिए प्रयुक्त उपखनिजों—स्टोन बैलास्ट, स्टोन डस्ट, रेत एवं अन्य निर्माण सामग्री—पर देय रॉयल्टी भुगतान व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है। समिति का कहना है कि वर्ष 2022 से विभागीय स्तर पर लगातार पत्राचार और निर्देशों के बावजूद अब तक स्पष्ट निर्णय न होने से प्रदेशभर के ठेकेदारों और अधिकारियों को गंभीर प्रशासनिक एवं वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
समिति के अध्यक्ष शरद कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री को भेजे ज्ञापन में बताया कि लोक निर्माण विभाग के प्रमुख अभियन्ता (विकास एवं विभागाध्यक्ष) तथा प्रमुख सचिव द्वारा समय-समय पर भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग को इस समस्या के समाधान के लिए पत्र भेजे गए। इसके बावजूद दोनों विभागों के बीच आवश्यक समन्वय स्थापित नहीं हो सका, जिससे निर्माण कार्यों के दौरान रॉयल्टी भुगतान की प्रक्रिया को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
ज्ञापन में कहा गया है कि स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में प्रदेश के विभिन्न जिलों में कार्यरत ठेकेदारों को अनावश्यक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसका प्रभाव विकास परियोजनाओं की प्रगति पर भी पड़ सकता है। समिति ने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि पूर्व में भेजे गए विभागीय पत्रों पर शीघ्र निर्णय लेते हुए संबंधित विभागों को आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं, ताकि लंबे समय से लंबित इस समस्या का स्थायी समाधान हो सके।
समिति का मानना है कि यदि रॉयल्टी भुगतान व्यवस्था को लेकर स्पष्ट एवं एकरूप नीति लागू की जाती है तो निर्माण कार्यों में पारदर्शिता बढ़ेगी, प्रशासनिक विवाद कम होंगे तथा विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आएगी।

व्यथा धरा की

सुन कर मन की व्यथा धरा की ,
आकाश को रोना पड़ेगा
एक दिन ऐसा आएगा
जब क्षितिज को खोना पड़ेगा

सूर्य को मनोरोग हुआ है
उसका धूप से वियोग हुआ है
छल करके उजाले से
सदा उसका उपभोग हुआ है

झाड़ लालच के हटाकर
बीज संतोष का बोना पड़ेगा
एक दिन ऐसा आएगा
जब क्षितिज को खोना पड़ेगा

व्यर्थ में जल को बहाना
समतुल्य है रक्तपात के
उत्त्तर कैसे मिलेगें आखिर
इंसानो के कुठाराघात के

अश्रु में लिपटी सरिताओं को
श्रृंगार कर संजोना पड़ेगा
एक दिन ऐसा आएगा
जब क्षितिज को खोना पड़ेगा

रात और दिन की वेदना को
सांझ भी समझने लगी है
बिना चहकती चिड़ियों के
स्वंय से ही कटने लगी है

कलरव के बिखरे गीतों को
संगीत से भिगोना पड़ेगा
एक दिन ऐसा आएगा
जब क्षितिज को खोना पड़ेगा

प्रकृति के संबंधों से
मानव ने विच्छेद किया है
किरण और हवा के
ह्रदय तक में छेद किया है

हो चुकी मैली गंगा ,लेकिन
ये पाप तो धोना ही पड़ेगा
एक दिन ऐसा आएगा
जब क्षितिज को खोना पड़ेगा
विजय गुंजन

प्रतिरोध स्वयं  का 

✍️ सोनम सोनी

आज मन का सागर शांत
हो गया — क्यों ।
वो उथल-पुथल, हलचल हलचल,
उलझन सब शांत हो गया … क्यों
मन की लहरें जो बार-बार इच्छा के
बड़े पत्थरों से टकरा रही थी ।

वो लहरें अब टकराती नहीं, वापस चली गई हैं
दूर फलक तक … क्यों ।
सवाल किसी से पूछा नहीं
चाहती मैं — क्यों ।

जवाब चाहे भी नहीं दे पाती । इन
दोनों के बीच कैसा सामंजस्य बैठ गया है
जो मुझे अच्छा नहीं लग रहा …
क्यों ।

पर मैं ऐसी तो न थी …। सब मुझसे
बात क्यों करना चाहते हैं । सब मुझ मुझे
क्यों सुन रहे हैं । आज मैं तो शांत
हूँ …. वो शिकायतें, दर्द, दुख सब
सहन कर लिया मैंने — क्यों ।

वो लोग अपने झूठ और
कुछ भर के आंसुओं से मेरी
स्थिरता को भिगो रहे हैं … क्यों
मन के सागर में मेरे जो
शांति है, उसे मिटाना चाहते
हैं अपने शब्दों के शोर
से ….. क्यों !

छोड़ दे मुझे आज, मेरा साथ
उनके लिए क्या मैं अभी भी हूं
….. क्यों
पर मैं तो जा चुकी सबको
आज़ाद कर दिया अपने से ….
दुख, दर्द, पीड़ा, साथ, साया
जो मेरा था मेरे लिए …

इनके लिए नहीं
तो फिर भी आज भी मुझे
छोड़ेंगे नहीं । क्या आज भी
कुछ गलत किया है मैंने ।

अगर नहीं तो रोका है मुझे … क्यों
मैं बस जाना चाहती हूं उस छोर तक…
जो परे है उन सबसे….
पर ये गलियां, ये घर, ये परिवार,

ये लोग मुझे जाने नहीं देते… क्यों
आखिर में सबके आंखों को वो सरोवर
सूख गया। उनका मन मेरे
जाने से भर गया। और छोड़
दिया मुझे कुछ दिनों का मेहमान बना के,


मुझे भुला दिया गया… क्यों
शायद अब मैं उनको याद नहीं
आना चाहती थी।
बहुत दूर आ चुकी थी
मैं। पर फिर भी मैं तोड़ न पाई बंधन,

वो अहसास, अपनों से वो
मेल… क्यों।
और विदा हो गई मैं इसतरह
मुझे जल की धारा में बह दिया गया

… और मैं दूर हो गई
मैं उनके पास दोबारा नहीं आना चाहती
न जाने… क्यों…

-Sonam Soni , B.Sc (Hons.) Semester (7th) Student at Maharishi University Lucknow

सरकारी योजना का लाभ पाने का मौका, जरूरी दस्तावेजों के साथ 31 जुलाई को पहुंचें हाटा

कुशीनगर।(राष्ट्र की परम्परा) जनपद के दिव्यांगजनों के लिए राहत भरी खबर है। उत्तर प्रदेश शासन की एडिप (ADIP) योजना के अंतर्गत पात्र दिव्यांगजनों को मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 31 जुलाई 2026 को विकास खंड परिसर, हाटा में पात्रता परीक्षण एवं चिन्हांकन शिविर आयोजित किया जाएगा। शिविर के माध्यम से योग्य लाभार्थियों का परीक्षण कर उन्हें योजना से जोड़ने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
जिला दिव्यांगजन सशक्तीकरण अधिकारी अभय पाण्डेय ने बताया कि शासन के निर्देशानुसार आयोजित इस विशेष शिविर में जनपद के सभी विकास खंडों के पात्र दिव्यांगजन भाग ले सकते हैं। शिविर का आयोजन 31 जुलाई 2026 को प्रातः 11:00 बजे विकास खंड परिसर, हाटा में किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल योजना का लाभ उन्हीं दिव्यांगजनों को मिलेगा जिनकी दिव्यांगता 80 प्रतिशत या उससे अधिक है। पात्र लाभार्थियों को शिविर में उपस्थित होते समय दिव्यांगता प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, आधार कार्ड तथा दो नवीनतम पासपोर्ट आकार के फोटो साथ लाना अनिवार्य होगा, ताकि परीक्षण एवं चिन्हांकन की प्रक्रिया बिना किसी बाधा के पूरी की जा सके।
जिला दिव्यांगजन सशक्तीकरण अधिकारी ने जनपद के सभी पात्र दिव्यांगजनों से निर्धारित तिथि एवं समय पर शिविर में पहुंचकर शासन की इस महत्वपूर्ण योजना का लाभ उठाने की अपील की है। यह पहल दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाने तथा उनकी सुगम आवाजाही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

यात्रियों की सुरक्षा के लिए देवरिया स्टेशन पर चला विशेष चेकिंग अभियान

देवरिया रेलवे स्टेशन पर चला सघन सुरक्षा अभियान, डॉग स्क्वाड व बम निरोधक दस्ते ने की व्यापक जांच


देवरिया, (राष्ट्र की परम्परा)। पुलिस महानिदेशक रेलवे के निर्देशानुसार रविवार को देवरिया रेलवे स्टेशन पर व्यापक सुरक्षा जांच अभियान चलाया गया। यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए जीआरपी, रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ), डॉग स्क्वाड तथा बम निरोधक दस्ते की संयुक्त टीम ने स्टेशन परिसर के विभिन्न संवेदनशील स्थानों का गहन निरीक्षण किया।
अभियान के दौरान रेलवे स्टेशन के सभी प्रमुख प्लेटफॉर्म, ट्रेनों, पार्किंग क्षेत्र, प्रवेश एवं निकास द्वार, सर्कुलेटिंग एरिया, यात्री प्रतीक्षालय तथा अन्य महत्वपूर्ण स्थानों की बारीकी से जांच की गई। सुरक्षा टीम ने संदिग्ध वस्तुओं एवं गतिविधियों पर विशेष नजर रखते हुए यात्रियों से भी सतर्क रहने और किसी भी संदिग्ध वस्तु अथवा व्यक्ति की सूचना तत्काल रेलवे पुलिस को देने की अपील की।
चेकिंग अभियान के दौरान डॉग स्क्वाड एवं बम निरोधक दस्ते ने आधुनिक सुरक्षा उपकरणों के माध्यम से स्टेशन परिसर का निरीक्षण किया। रेलवे सुरक्षा बल के प्रभारी अपने दल के साथ पूरे अभियान में मौजूद रहे और सुरक्षा व्यवस्था का लगातार जायजा लेते रहे।
पूरे अभियान के दौरान कहीं भी कोई संदिग्ध वस्तु अथवा गतिविधि नहीं मिली। जांच शांतिपूर्ण एवं सफलतापूर्वक संपन्न हुई तथा रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह सामान्य और प्रभावी रही। अधिकारियों ने बताया कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से इस प्रकार के विशेष अभियान आगे भी समय-समय पर जारी रहेंगे।

घर में घुसे जहरीले कोबरा ने ली मासूम की जान, 10 वर्षीय सपना की मौत से गांव में मातम

निचलौल रेफर के बाद जिला अस्पताल ले जाते समय रास्ते में तोड़ा दम, रेस्क्यू टीम ने कोबरा पकड़ कर जंगल में छोड़ा

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। ठूठीबारी कोतवाली क्षेत्र के ग्राम पंचायत बोंदना में शनिवार को जहरीले कोबरा के डंसने से 10 वर्षीय मासूम बच्ची की मौत हो गई। इस हृदयविदारक घटना से पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई, जबकि मृतक बच्ची के परिवार में कोहराम मचा हुआ है। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और गांव में हर किसी की जुबान पर इस दर्दनाक हादसे की चर्चा है। । जानकारी के अनुसार, बोंंदना गांव निवासी जयप्रकाश गौड़ की 10 वर्षीय पुत्री सपना शनिवार को अपने घर के अंदर थी। इसी दौरान घर में कहीं छिपे बैठे जहरीले कोबरा ने अचानक उसे डंस लिया। सांप के काटते ही बच्ची तेज दर्द से चीखने लगी। उसकी आवाज सुनकर परिजन और आस-पास के लोग दौड़ कर मौके पर पहुंचे। बच्ची की हालत बिगड़ती देख परिजन बिना समय गंवाए उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र निचलौल लेकर पहुंचे।
चिकित्सकों ने प्राथमिक उपचार के बाद बच्ची की गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्काल जिला अस्पताल रेफर कर दिया। परिजन उसे एंबुलेंस से जिला अस्पताल ले जा रहे थे, लेकिन रास्ते में ही मासूम सपना ने दम तोड़ दिया। अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। यह खबर मिलते ही परिवार पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। मां समेत अन्य परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।
घटना की सूचना मिलते ही ठूठीबारी कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने आवश्यक कार्रवाई करते हुए शव को कब्जे में लेकर पंचनामा भरवाया और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। हल्का लेखपाल प्रवीण पासवान ने भी घटनास्थल का निरीक्षण कर आवश्यक जानकारी जुटाई तथा शासन स्तर पर मिलने वाली सहायता के संबंध में औपचारिकताएं शुरू कराईं।
इधर, घर में जहरीले कोबरा के होने की सूचना मिलते ही पूरे गांव में दहशत का माहौल बन गया। ग्रामीण अपने-अपने घरों से बाहर निकल आए और बच्चों को घरों के अंदर रहने की हिदायत देने लगे। सूचना मिलने पर साहनी रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची। टीम ने काफी देर तक खोजबीन और मशक्कत के बाद जहरीले कोबरा को सुरक्षित पकड़ लिया। इसके बाद उसे आबादी से दूर जंगल में छोड़ दिया गया। कोबरा के पकड़े जाने के बाद ग्रामीणों ने राहत की सांस ली।
ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के मौसम में गांवों में अक्सर जहरीले सांप निकल आते हैं। ऐसे में लोगों को विशेष सतर्क रहने की आवश्यकता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से गांवों में जागरूकता अभियान चलाने और आवश्यक बचाव उपायों की जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की है।
मासूम सपना की असमय मौत ने पूरे गांव को गमगीन कर दिया है। घटना के बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण शोक संतप्त परिवार के घर पहुंच कर उन्हें ढांढस बंधा रहे हैं।

बीबीएयू में राष्ट्रीय मीडिया कार्यशाला, जिम्मेदार पत्रकारिता और फैक्ट-चेकिंग पर दिया गया जोर

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में शनिवार को जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग तथा अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय स्तर की मीडिया कार्यशाला आयोजित हुई। कार्यशाला में जिम्मेदार पत्रकारिता, डिजिटल मीडिया, फैक्ट-चेकिंग और विकसित भारत के निर्माण में मीडिया की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की, जबकि मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं डीडी न्यूज के एडिटर अशोक श्रीवास्तव रहे। मंच पर अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के अध्यक्ष प्रो. एन.एल. गुप्ता, महासचिव प्रो. गीता भट्ट, जनसंचार एवं पत्रकारिता विभागाध्यक्ष प्रो. गोविंद जी. पाण्डेय तथा राष्ट्रीय संगठन मंत्री महेन्द्र कपूर उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन, सरस्वती वंदना और कुलगीत के साथ हुआ। अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, पौधा और शॉल भेंटकर किया गया।
कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए आर्थिक विकास के साथ सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त नागरिकों का निर्माण भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है और सूचना साझा करने से पहले तथ्यों का सत्यापन करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, ताकि फर्जी खबरों और भ्रामक नैरेटिव से समाज को बचाया जा सके।
मुख्य अतिथि अशोक श्रीवास्तव ने कहा कि विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब नई पीढ़ी को दूरदृष्टि और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने युवाओं को ‘जेन-वी’ यानी विजन वाली पीढ़ी बनने का आह्वान किया। उन्होंने डिजिटल युग में तकनीक के साथ निरंतर अपडेट रहने और तथ्यपरक पत्रकारिता को अपनाने पर बल दिया।
प्रो. एन.एल. गुप्ता ने महासंघ की गतिविधियों, शिक्षा के भारतीयकरण, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन और मूल्यपरक शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों की जानकारी दी। वहीं प्रो. गीता भट्ट ने कहा कि मीडिया समाज में सकारात्मक बदलाव और जनजागरूकता का सशक्त माध्यम है तथा शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में मीडिया एवं शैक्षिक संगठनों के समन्वय की आवश्यकता है।
तकनीकी सत्र में अशोक श्रीवास्तव ने मीडिया नैरेटिव के प्रभाव और फैक्ट-चेकिंग के महत्व पर विस्तार से चर्चा की। दूसरे सत्र में रील्स निर्माण, मोबाइल पत्रकारिता, वीडियो ऑप्टिमाइजेशन, डिजिटल युग में प्रिंट मीडिया की प्रासंगिकता तथा प्रभावशाली कंटेंट निर्माण जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने मार्गदर्शन दिया। तीसरे सत्र में प्रतिभागियों को हैंड्स-ऑन प्रैक्टिकल प्रशिक्षण दिया गया, जबकि चौथे सत्र में महासंघ के मीडिया प्रकोष्ठ की कार्ययोजना से अवगत कराया गया।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. लोकनाथ ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर प्रो. महेंद्र कुमार पाढी, प्रो. रचना गंगवार, डॉ. अरविंद सिंह, डॉ. लोकनाथ सिंह, डॉ. कुंवर सुरेन्द्र बहादुर, डॉ. बबिता पाण्डेय सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी और प्रतिभागी उपस्थित रहे।

भूगोल की पढ़ाई के खुले नए रास्ते, अब किसी भी संकाय के छात्र ले सकेंगे प्रवेश

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की विद्या परिषद ने भूगोल विषय की प्रवेश पात्रता और डिग्री संरचना में बड़ा बदलाव करते हुए छात्रों के लिए नए अवसरों का रास्ता खोल दिया है। अब स्नातक स्तर पर कला, विज्ञान या वाणिज्य किसी भी संकाय से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण छात्र भूगोल विषय में प्रवेश ले सकेंगे। इसके साथ ही विभाग में बीए, बीएससी, एमए और एमएससी (भूगोल) पाठ्यक्रम संचालित करने को भी मंजूरी मिल गई है।
कुलपति प्रो. पूनम टंडन की अध्यक्षता में हुई विद्या परिषद की बैठक में भूगोल विभागाध्यक्ष डॉ. स्वर्णिमा सिंह द्वारा प्रस्तुत प्रस्तावों को सर्वसम्मति से स्वीकृति प्रदान की गई।
नए निर्णय के अनुसार, स्नातक स्तर पर किसी भी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वीं उत्तीर्ण अभ्यर्थी, चाहे वे कला, विज्ञान या वाणिज्य संकाय से हों, भूगोल विषय में प्रवेश के पात्र होंगे। इससे विभिन्न शैक्षणिक पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों को भूगोल विषय में अध्ययन का अवसर मिलेगा।
स्नातकोत्तर स्तर पर प्रवेश के लिए विज्ञान संकाय से स्नातक डिग्री अथवा कला संकाय से भूगोल विषय सहित बीए उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को पात्र माना जाएगा। विश्वविद्यालय का मानना है कि इससे विषय की शैक्षणिक गुणवत्ता और विशेषज्ञता को मजबूती मिलेगी।
विद्या परिषद ने भूगोल विभाग में बीए (भूगोल) और बीएससी (भूगोल) के साथ एमए (भूगोल) एवं एमएससी (भूगोल) की डिग्रियां संचालित करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है। इससे विद्यार्थियों को अपनी रुचि और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के अनुरूप कला तथा विज्ञान दोनों धाराओं में भूगोल की पढ़ाई का विकल्प मिलेगा।
बैठक में कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि विश्वविद्यालय राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप बहुविषयक शिक्षा को बढ़ावा देने और विद्यार्थियों को अधिक शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि इन निर्णयों से भूगोल विषय में अध्ययन, शोध और रोजगार की संभावनाओं को नई गति मिलेगी।

भाजपा नेताओं ने कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही का किया भव्य स्वागत

बभनान/बस्ती(राष्ट्र की परम्परा)
उत्तर प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री एवं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भाजपा सूर्य प्रताप शाही जनपद गोंडा का दौड़ा कर बभनान से गोरखपुर जाते समय आदर्श नगर पंचायत बभनान में भाजपा किसान मोर्चा क्षेत्रीय कोषाध्यक्ष व नवनियुक्त जिला कोषाध्यक्ष राधेश्याम कमलापुरी व भाजपा मंडल अध्यक्ष गौर राजेश कमलापुरी ने किया स्वागत और क्षेत्रीय जन समस्याओं पर चर्चा किया। इस मौके पर इंद्रदेव कमलापुरी, धनश्याम गुप्ता अंकित जायसवाल अमित कमलापुरी सहित भाजपा पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

विज्ञान और कहानी के संगम से निखरी बच्चों की प्रतिभा, ‘एससीआई-टेल्स 2026’ का भव्य आयोजन

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर द्वारा आयोजित ‘एससीआई-टेल्स 2026 (साइंस, क्रिएटिविटी एंड इनोवेशन थ्रू स्टोरीटेलिंग)’ का भव्य आयोजन शनिवार को संग्रहालय के यशोधरा सभागार में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में विज्ञान को रोचक कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत कर बच्चों में वैज्ञानिक सोच, कल्पनाशीलता और संवाद कौशल विकसित करने का प्रयास किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य वक्ता एवं स्टोरी टेलर एकांतदीप तथा संग्रहालय के उप निदेशक डॉ. यशवंत सिंह राठौड़ ने भगवान बुद्ध की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर एवं दीप प्रज्वलित कर किया। तीन सत्रों में आयोजित कार्यक्रम में एकांतदीप ने विज्ञान से जुड़े विभिन्न तथ्यों को प्रेरक कहानियों के माध्यम से बच्चों तक पहुंचाया। वहीं विभिन्न विद्यालयों से आए छात्र-छात्राओं ने भी अपनी प्रस्तुतियों से सभी का ध्यान आकर्षित किया।


‘विज्ञान हमारी जिंदगी में’ विषय पर आधारित इस आयोजन में जीडी गोयनका स्कूल, होली फ्लेम एकेडमी, डॉ. राम मनोहर लोहिया गर्ल्स इंटर कॉलेज, ऑक्सफोर्ड पब्लिक स्कूल, एनपीए सीनियर सेकेंडरी स्कूल, गौतम बुद्ध एकेडमी, एमके मेमोरियल इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल सहित अन्य प्रतिष्ठित विद्यालयों के लगभग 200 छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। विद्यार्थियों ने पर्यावरण, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तथा जल संरक्षण जैसे विषयों पर तीन से पांच मिनट की प्रभावशाली कहानियां प्रस्तुत कीं।
आयोजित मनोवैज्ञानिक प्रतियोगिता के आधार पर सभी प्रतिभागियों को सहभागिता प्रमाण पत्र प्रदान किए जाएंगे, जबकि उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का संचालन उद्घोषिका रीता श्रीवास्तव ने किया। अंत में उप निदेशक डॉ. यशवंत सिंह राठौड़ ने सभी प्रतिभागियों, शिक्षकों एवं अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

इस्तीफे की खबर पर छात्रों का जश्न पुलिस ने लिया हिरासत में

इंदिरा बाल विहार में मिठाई बांटकर मना रहे थे खुशी, अचानक पहुंची पुलिस

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)l शहर के इंदिरा बाल विहार इलाके में शनिवार को उस समय अचानक हलचल तेज हो गई, जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर फैलते ही छात्र नेताओं ने जश्न मनाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते मौके पर छात्रों की भीड़ जुट गई और माहौल उत्सव में बदल गया।
छात्र नेता सतीश प्रजापति अपने समर्थकों के साथ सड़क पर उतर आए और राहगीरों सहित आसपास मौजूद लोगों को मिठाई खिलाकर खुशी जाहिर करने लगे। ढोल-नगाड़ों के बिना ही यहां जश्न का माहौल बन गया था। लोग एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर बधाई दे रहे थे और इसे छात्रों की जीत बता रहे थे।
सतीश प्रजापति ने मौके पर कहा कि यह दिन छात्रों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं है। उन्होंने कहा, आज हमारे लिए होली और दिवाली दोनों है। हम लंबे समय से शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। यह लोकतंत्र की जीत है और देश के करोड़ों छात्रों के संघर्ष का परिणाम है।उनके इस बयान के बाद वहां मौजूद समर्थकों ने भी खुशी जाहिर की और नारेबाजी की।
हालांकि, जश्न ज्यादा देर तक नहीं चल सका। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंच गई। पुलिस की गाड़ियां इंदिरा बाल विहार में पहुंचीं और हालात को देखते हुए हस्तक्षेप किया। पुलिस ने जश्न मना रहे छात्र नेता सतीश प्रजापति को हिरासत में ले लिया। इस कार्रवाई के बाद मौके पर मौजूद लोगों में हलचल मच गई और कुछ समय के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि बिना अनुमति सड़क पर इस तरह की गतिविधियों से यातायात और कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, इसलिए एहतियातन कार्रवाई की गई। वहीं, छात्र नेताओं का आरोप है कि शांतिपूर्ण तरीके से जश्न मनाने के बावजूद पुलिस ने अनावश्यक हस्तक्षेप किया।
घटना के बाद क्षेत्र में कुछ देर तक तनाव जैसी स्थिति बनी रही, हालांकि पुलिस की मौजूदगी में हालात जल्द ही सामान्य हो गए। स्थानीय लोगों का कहना है कि अचानक हुई इस घटना से इलाके में काफी भीड़ इकट्ठा हो गई थी, जिससे आवागमन भी प्रभावित हुआ।
फिलहाल पुलिस द्वारा आगे की कार्रवाई की जा रही है और हिरासत में लिए गए छात्र नेता से पूछताछ की जा रही है।

यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ सारनाथ, वैश्विक पहचान को मिली नई ऊंचाई

नवनीत मिश्र

उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक एवं बौद्ध आस्था के प्रमुख केंद्र सारनाथ को यूनेस्को (यूएनईएससीओ) की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने के बाद देशभर में खुशी की लहर है। यह उपलब्धि न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के लिए भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है। सारनाथ का भगवान बुद्ध के जीवन से गहरा संबंध है और इसे बौद्ध धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में गिना जाता है। मान्यता के बाद सारनाथ को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलेगी। इससे यहां आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होने की उम्मीद है, जिससे स्थानीय पर्यटन, रोजगार और अर्थव्यवस्था को भी नया बल मिलेगा। साथ ही, इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और संवर्धन के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं संसाधनों का मार्ग भी प्रशस्त होगा। इतिहास के अनुसार, बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ के मृगदाय (ऋषिपत्तन) में अपने पांच शिष्यों को दिया था। इसी घटना को धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है और यहीं से बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार की औपचारिक शुरुआत हुई। भगवान बुद्ध का ज्ञान, करुणा, अहिंसा और सद्भाव का संदेश आज भी पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत है। सारनाथ में स्थित धामेक स्तूप, चौखंडी स्तूप, अशोक स्तंभ, मूलगंध कुटी विहार तथा पुरातात्विक संग्रहालय इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समृद्धि के प्रमुख प्रतीक हैं। विशेष रूप से अशोक स्तंभ का सिंहशीर्ष भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है, जो इस स्थल के महत्व को और अधिक बढ़ाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने से सारनाथ के संरक्षण, शोध और पर्यटन विकास की संभावनाएं और मजबूत होंगी। इससे विश्वभर के शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और बौद्ध अनुयायियों का आकर्षण भी बढ़ेगा। सारनाथ सदियों से शांति, सहिष्णुता और मानवता का संदेश देता रहा है। विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के साथ अब यह धरोहर वैश्विक सांस्कृतिक विरासत के रूप में और अधिक सशक्त पहचान के साथ विश्व मंच पर स्थापित होगी।

हरियाली का संदेश देने निकली पौधरोपण जागरूकता रैली, विद्यार्थियों ने लिया पर्यावरण संरक्षण का संकल्प

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। ब्लूमिंग बड्स स्कूल में पर्यावरण संरक्षण एवं वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शनिवार को पौधरोपण जागरूकता रैली का आयोजन किया गया। विद्यालय परिसर से निकली रैली को सचिव एवं प्रबंधक पुष्पा चतुर्वेदी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। रैली के माध्यम से विद्यार्थियों ने लोगों से अधिक से अधिक पौधे लगाने और उनकी सुरक्षा करने की अपील की।
रैली को रवाना करते हुए एमडी पुष्पा चतुर्वेदी ने कहा कि प्रकृति का संरक्षण हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि आज वृक्षों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि प्रत्येक छात्र-छात्रा अपने जीवन में कम से कम एक पौधा अवश्य लगाए और उसकी देखभाल का संकल्प भी ले। यही सच्ची पर्यावरण सेवा होगी।
रैली में शामिल छात्र-छात्राएं हाथों में पौधे और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संदेशों वाले बैनर लेकर विद्यालय परिसर एवं आसपास के क्षेत्र में निकले। इस दौरान सभी ने लोगों को हरियाली बढ़ाने, जल संरक्षण करने और स्वच्छ वातावरण बनाए रखने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम के अंत में विद्यालय परिसर में विभिन्न प्रजातियों के पौधों सहित शताधिक आम का रोपण भी किया गया।
इस अवसर पर प्रमुख रूप से मुख्य समन्वयक विजय कुमार राय, व्यवस्थापक राजेश कुमार पांडेय, नीलम दुबे, अजय कुमार दुबे, प्रधानाचार्य शैलेश त्रिपाठी, डीसी पाण्डेय, उप प्रधानाचार्य अनूप कुमार, नवनीत मिश्र, तरुण कुमार, सुजीत गौंड, विनय कुमार, अजय कुमार, मिथिलेश पांडेय, नेहा राय, प्रीति मिश्रा, मनोरमा सहित विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाएं, कर्मचारी एवं सैकड़ों छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता की नई शुरुआत या राजनीतिक दबाव का परिणाम?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा: देर आए, दुरुस्त आए या जवाबदेही की नई शुरुआत?

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत सहित पूरी दुनियाँ की नजरें लगी हुई थी, सबके मन में एक ही बात थी क़ि क्या भारतीय केंद्रीय शिक्षा मंत्री इस्तीफा देंगे?इसका जवाब 25 जुलाई 2026 को दोपहर के बाद में मिल गया “देर कर दी मेहरबाँ आते-आते,मगर आए तो सही।” यह पंक्ति भारतीय राजनीति और शिक्षा व्यवस्था पर सबसे अधिक लागू होती दिखाई दी।देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट सहित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, लाखों छात्रों के भविष्य पर उठे सवाल, जंतर -मंतर पर लंबे समय तक चले आंदोलन,संसद के मानसून सत्र में लगातार गतिरोध और देश-विदेश तक गूंजे विरोध के बाद केंद्रीय शिक्षामंत्री ने पीएम क़ो अपना इस्तीफा सौंप दिया।यह वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री के 12 वर्षों के कार्यकाल में जनदबाव के बाद किसी वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की सबसे बड़ी राजनीतिक घटनाओं में से एक माना जा रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह तथ्य सबको याद दिलाना चाहूंगा क़ि भारतीय लोकतंत्र में नैतिक जवाबदेही का सबसे चर्चित उदाहरण आज भी पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का माना जाता है। वे रेल मंत्री रहते हुए 23 नवंबर 1956 को तमिलनाडु के अरियालुर रेल हादसे के बाद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे बैठे थे। उस दुर्घटना में 140 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी।यद्यपि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पहले इस्तीफा स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे,लेकिन अंततःशास्त्री का त्यागपत्र स्वीकार किया गया और यह भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक जवाबदेही का ऐतिहासिक उदाहरण बन गया।आज धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा संसद से सड़क तक बड़े आंदोलनों के बाद हुआ?, हालांकि परिस्थितियां और राजनीतिक संदर्भ अलग हैं।इस्तीफे के तुरंत बाद सरकार और सीजेपी प्रतिनिधियों के बीच संविधान क्लब में वार्ता हुई।उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों पर चर्चा हुई। सीजेपी द्वारा प्रमुख रूप से तीन मांगें उठाई गई थीं आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को आर्थिक सहायता, आंदोलन में शामिल छात्रों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई न हो तथा पुलिस कार्रवाई पर जवाबदेही तय की जाए। इन मांगों को लेकर सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत हुई 25 जुलाई 2026 को शाम 6 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर बताया गया क़ि  इन मांगों पर सहमति की स्थिति बताई गई है,मांगे स्वीकार किए जाने के बाद प्रदर्शन समाप्त करने की घोषणा की गई तथा छात्रों से शांतिपूर्वक अपने घर लौटने की अपील की गई। हालांकि कुछ मांगों की स्वीकृति और उनके क्रियान्वयन को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में भिन्न जानकारी भी सामने आई है।सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जिन्होंने आंदोलन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को लोकतंत्र की जीत बताया। उन्होंने कहा कि यह सड़कों से निकली लोकतांत्रिक शक्ति, शांति, धैर्य और निरंतर प्रयास की जीत है तथा अब अगला चरण सटीकता से शिक्षा सुधार का होना चाहिए। 

साथियों, भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, विश्वसनीयता और निष्पक्षता को लेकर पिछले कुछ वर्षों में लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। देश के विभिन्न राज्यों में पेपर लीक की घटनाओं ने लाखों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया, जिसके कारण केवल परीक्षाएं ही नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की साख भी कठघरे में आ गई। पिछले 27 दिनों तक चले व्यापक जनआंदोलन, विपक्ष के लगातार दबाव, संसद में तीखी बहस और देशभर में छात्रों के विरोध प्रदर्शन ने अंततः केंद्र सरकार को बहुआयामी कार्रवाई के लिए बाध्य किया। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से पहले जिस प्रकार एक के बाद एक प्रशासनिक, कानूनी और राजनीतिक कदम उठाए गए, उन्होंने यह स्पष्ट संकेत दिया कि सरकार अब केवल दोषियों को पकड़ने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र को नई कानूनी संरचना के माध्यम से बदलने की दिशा में आगे बढ़ रही है। 

साथियों, इस पूरी प्रक्रिया की पहली महत्वपूर्ण कड़ी बड़े पैमाने पर हुई गिरफ्तारियां रहीं।जांच एजेंसियों ने विभिन्न राज्यों में समन्वित अभियान चलाकर अब तक 14 प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया। इनमें कथित मास्टरमाइंड बिचौलिए, तकनीकी विशेषज्ञ तथा परीक्षा संचालन से जुड़े कुछ कर्मचारी भी शामिल बताए गए। जांच में यह सामने आया कि पेपर लीक केवल स्थानीय स्तर का अपराध नहीं था,बल्कि इसके पीछे संगठित नेटवर्क कार्य कर रहे थे, जो आधुनिक तकनीक, सोशल मीडिया और आर्थिक लेनदेन के माध्यम से प्रश्नपत्रों की गोपनीयता भंग कर रहे थे। इन गिरफ्तारियों ने यह संदेश दिया कि सरकार अब केवल छोटे अपराधियों पर नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क को समाप्त करने की रणनीति अपना रही है। दूसरा बड़ा कदम प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के रूप में सामने आया। सरकार ने विभिन्न विभागों और परीक्षा प्रबंधन से जुड़े 27 अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। यह कार्रवाई केवल अनुशासनात्मक नहीं थी, बल्कि यह संकेत भी था कि भविष्य में किसी भी अधिकारी की लापरवाही या मिलीभगत को केवल विभागीय त्रुटि मानकर नहीं छोड़ा जाएगा। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों का एक साथ निलंबन यह दर्शाता है कि अब जवाबदेही केवल राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरी प्रशासनिक श्रृंखला उत्तरदायी होगी। 

साथियों, इसी बीच मंत्रिमंडल ने परीक्षा सुरक्षा को लेकर अत्यंत कठोर नया विधायी प्रस्ताव भी स्वीकृत किया। प्रस्तावित कानून का सबसे चर्चित प्रावधान यह है कि पेपर लीक जैसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट ट्रैक न्यायालय स्थापित किए जाएंगे और ऐसे मामलों का अंतिम निर्णय लगभग 13 महीनों के भीतर सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा। भारत में सामान्यतः न्यायिक प्रक्रिया कई वर्षों तक चलती है, जिससे अपराधियों में दंड का भय कम हो जाता है। यदि यह समयबद्ध न्याय व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू होती है, तो यह देश की परीक्षा प्रणाली में सबसे बड़ा संरचनात्मक सुधार माना जाएगा।इस प्रस्तावित कानून का दूसरा अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक दंड है। पेपर लीक जैसे संगठित अपराधों में शामिल संस्थाओं या व्यक्तियों पर 10 करोड़ रुपये तक का भारी जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है। अब तक अधिकांश मामलों में कुछ लाख रुपये या सीमित आर्थिक दंड ही लगाया जाता था, जिससे अपराधियों के लिए जोखिम अपेक्षाकृत कम था। नई व्यवस्था का उद्देश्य अपराध की आर्थिक लाभप्रदता को समाप्त करना है, ताकि संगठित गिरोहों के लिए यह कारोबार पूरी तरह घाटे का सौदा बन जाए। अब विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुधार केवल दंडात्मक नीति नहीं, बल्कि शासन प्रणाली में संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत भी है। परीक्षा सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, प्रश्नपत्रों की एन्क्रिप्टेड ट्रांसमिशन, उत्तरदायित्व निर्धारण और समयबद्ध न्याय ये सभी तत्व मिलकर भारत को वैश्विक स्तर की परीक्षा सुरक्षा प्रणाली विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ा सकते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, जापान और सिंगापुर जैसे देशों में परीक्षा सुरक्षा के लिए बहुस्तरीय तकनीकी और कानूनी व्यवस्था पहले से लागू है। भारत यदि अपने नए कानून को प्रभावी ढंग से लागू कर पाता है, तो वह विश्व के सबसे बड़े परीक्षा तंत्र को अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है। 

साथियों, राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो इनघटनाक्रमों का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा रहा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी मंत्री का इस्तीफा केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता, बल्कि वह राजनीतिक जवाबदेही का प्रतीक माना जाता है। इस्तीफे से पहले सरकार द्वारा गिरफ्तारियां, निलंबन और नया कानून लाना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक तथा राजनीतिक दोनों स्तरों पर जवाबदेही स्थापित करने का प्रयास किया गया। इससे यह संदेश देने की कोशिश हुई कि सरकार केवल नेतृत्व परिवर्तन तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन का भी दावा कर रही है।आर्थिक दृष्टि से भी यह सुधार अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक पेपर लीक के कारण परीक्षाओं के पुनः आयोजन, सुरक्षा प्रबंधन, न्यायिक प्रक्रिया तथा प्रशासनिक खर्च पर करोड़ों रुपये व्यय होते हैं। इसके अतिरिक्त लाखों अभ्यर्थियों को मानसिक, आर्थिक और सामाजिक क्षति होती है। यदि नई व्यवस्था वास्तव में पेपर लीक की घटनाओं को रोकने में सफल होती है, तो इससे सरकारी संसाधनों की बचत होगी, युवाओं का समय सुरक्षित रहेगा तथा रोजगार प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी।सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो यह केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास की पुनर्स्थापना का प्रयास है। प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले करोड़ों विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। जब प्रश्नपत्र लीक होते हैं, तब केवल परीक्षा ही नहीं, बल्कि उनकी मेहनत, परिवार की उम्मीदें और व्यवस्था पर विश्वास भी प्रभावित होता है। इसलिए सरकार की हालिया कार्रवाइयों को केवल कानूनी कदम नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास बहाली की प्रक्रिया के रूप में भी सटीकता से देखा जा रहा है। 

साथियों, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। विश्व के अनेक देशों में उच्च शिक्षा, सरकारी भर्ती और पेशेवर परीक्षाओं की विश्वसनीयता राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता से जुड़ी होती है। यदि भारत समयबद्ध न्याय, कठोर आर्थिक दंड, डिजिटल सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही के इस मॉडल को प्रभावी ढंग से लागू कर देता है, तो यह विकासशील देशों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बन सकता है। इससे भारत की संस्थागत विश्वसनीयता, निवेशकों का विश्वास और वैश्विक शिक्षा प्रणाली में उसकी साख भी मजबूत हो सकती है। 

साथियों, वर्ष 2026 का पूरा घटनाक्रम केवल एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा। पिछले कई वर्षों से विभिन्न भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने छात्रों का विश्वास कमजोर किया था। नीट विवाद ने इस असंतोष को राष्ट्रीय आंदोलन का रूप दे दिया। छात्रों, अभिभावकों, सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की मांग तेज कर दी।जंतर-मंतर देशव्यापी असंतोष का केंद्र बना, जबकि संसद का मानसून सत्र भी इस मुद्दे की भेंट चढ़ गया। 20 जुलाई से शुरू हुआ सत्र 25 जुलाई तक बार-बार बाधित रहा।इस पूरे आंदोलन में उभरकर सामने आई कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने अपने आंदोलन को केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं रखा बल्कि परीक्षा सुधार,छात्रों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही को भी प्रमुख मुद्दा बनाया। आंदोलन धीरे-धीरे देश के अनेक राज्यों तक फैल गया और सोशल मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक इसकी सटीकता से चर्चा होने लगी। 

साथियों, धर्मेंद्र प्रधान ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपना इस्तीफा सार्वजनिक करते हुए लिखा कि उन्होंने चार दशकों से अधिक समय छात्र, शिक्षक और शिक्षा सुधार के लिए समर्पित किया है तथा उनका विश्वास रहा है कि सशक्त शिक्षा व्यवस्था ही सशक्त राष्ट्र की आधारशिला होती है। उन्होंने यह भी कहा कि वे छात्रों के भविष्य को सर्वोपरि रखते हैं और नहीं चाहते कि वर्तमान परिस्थितियों का दुरुपयोग राष्ट्रविरोधी तत्व करें। अब राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह इस्तीफा केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश भी है। पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया पर “समय सबको झुका देता है, सिंहासन डोलने पर डैमेज कंट्रोल करना पड़ता है जैसी टिप्पणियां लगातार चर्चा में थीं। हालांकि सरकार की ओर से इसे छात्रों के हित में लिया गया निर्णय बताया गया, जबकि विपक्ष ने इसे जनता की जीत करार दिया। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि  25 जुलाई 2026 का दिन भारतीय लोकतंत्र, शिक्षा व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही के इतिहास में एक महत्वपूर्ण तिथि के रूप में याद किया जा सकता है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक राजनीतिक घटना नहीं बल्कि यह संदेश भी है कि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करना अब सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में होना चाहिए। “देर आए, दुरुस्त आए” की कहावत तभी सार्थक होगी जब इसके बाद व्यापक परीक्षा सुधार, पारदर्शी प्रशासन और छात्रों के भविष्य की वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। तभी यह अध्याय केवल एक इस्तीफे का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास की पुनर्स्थापना का अध्याय कहलाएगा।

-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र