बिहार में विधानसभा चुनाव का माहौल दिन-ब-दिन गरमाता जा रहा है। चुनावी बिगुल बजते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी धड़ाधड़ ट्रेनों का उद्घाटन, एयरपोर्टों और सड़कों का शिलान्यास कर रहे हैं। उधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने पिटारे से नई-नई योजनाएँ निकालकर जनता को लुभाने की कोशिश में लगे हैं। वहीं विपक्षी दल युवाओं को रोजगार, वोट चोरी रोकने और लोकतंत्र बचाने जैसे मुद्दों को सामने लाकर जनता को अपनी ओर खींचने में जुटे हैं।
सत्ता पक्ष का दांव – विकास की राजनीति
प्रधानमंत्री और नीतीश सरकार दोनों मिलकर बड़े पैमाने पर विकास कार्यों को चुनावी एजेंडा बना रहे हैं। नई रेल परियोजनाएँ, एयरपोर्ट कनेक्टिविटी, आधुनिक सड़कें और स्वास्थ्य-शिक्षा से जुड़ी घोषणाएँ जनता को यह संदेश देने की कोशिश हैं कि एनडीए सरकार ही बिहार के भविष्य की गारंटी है।
विपक्ष का पलटवार – रोजगार और सामाजिक न्याय
राजद और अन्य विपक्षी दल इस चुनाव में युवाओं के रोजगार को सबसे बड़ा हथियार बना चुके हैं। बिहार से बड़ी संख्या में होने वाले पलायन और बेरोजगारी दर को मुद्दा बनाकर विपक्ष सीधे सरकार की नाकामी गिना रहा है। इसके साथ ही जातिगत समीकरण, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र बचाने का नारा भी विपक्षी खेमे में गूंज रहा है।
मतदाता और युवा – किसके साथ जाएंगे?
बिहार का युवा वर्ग इस बार निर्णायक भूमिका में है। नौकरी, शिक्षा और बेहतर भविष्य की उम्मीदें उसके लिए प्राथमिक मुद्दे हैं। ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे का विकास और शहरी क्षेत्रों में रोजगार की संभावना ही तय करेगी कि जनता किसे चुनती है। जातिगत समीकरण अब भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पहली बार रोजगार और पलायन रोकने की बहस सबसे ऊपर दिखाई दे रही है।
नतीजा किस ओर?
बिहार का यह चुनाव पूरी तरह से विकास बनाम रोजगार की जंग बन चुका है। एक ओर एनडीए सरकार विकास और योजनाओं का हवाला दे रही है, वहीं विपक्ष युवाओं की नाराज़गी को भुनाने में जुटा है। जनता किसके वादों पर विश्वास करेगी, यह आने वाला समय ही तय करेगा। लेकिन इतना तय है कि 2025 का यह चुनाव बिहार की राजनीति की दिशा और दशा दोनों बदल सकता है।
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