किसानों की आय बढ़ाने, कृषि को लाभकारी बनाने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए बांस की खेती (Bamboo Cultivation) एक प्रभावी विकल्प के रूप में तेजी से उभर रही है। महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, लखनऊ के महर्षि स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर के डीन डॉ. धीरज यादव के अनुसार बांस की खेती किसानों के लिए दीर्घकालिक आय, रोजगार सृजन और पर्यावरणीय संतुलन का सशक्त माध्यम बन सकती है।
बांस को “हरा सोना” (Green Gold) और “गरीबों की लकड़ी” (Poor Man’s Timber) कहा जाता है। यह विश्व के सबसे तेजी से बढ़ने वाले पौधों में शामिल है तथा इसकी उपयोगिता भवन निर्माण, हस्तशिल्प, कृषि उपकरण, फर्नीचर, कागज उद्योग, अगरबत्ती निर्माण, प्लाईवुड, जैव ईंधन और निर्यात उद्योग तक फैली हुई है।
विशेषज्ञों के अनुसार बांस की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दीर्घकालिक उत्पादन क्षमता है। एक बार रोपण करने के बाद बांस 3 से 4 वर्षों में उत्पादन देना शुरू कर देता है और लगभग 40 से 50 वर्षों तक लगातार उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इससे किसानों को स्थायी आय का स्रोत मिलता है।
भारत के अधिकांश राज्यों में बांस की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसके लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी तथा उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु उपयुक्त मानी जाती है। आधुनिक टिश्यू कल्चर तकनीक के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाले पौधों की उपलब्धता से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ है।
आर्थिक दृष्टि से बांस की खेती कम लागत और कम रखरखाव वाली फसल है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने में मदद कर रही है। कृषि वानिकी (Agroforestry) प्रणाली में बांस को शामिल कर किसान अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं।
बांस की खेती ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन का भी महत्वपूर्ण साधन बन रही है। पौध उत्पादन, नर्सरी प्रबंधन, कटाई, प्रसंस्करण, फर्नीचर निर्माण और हस्तशिल्प उद्योग से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिल रहा है। ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए यह स्वरोजगार का एक बेहतर अवसर साबित हो रही है।
पर्यावरण संरक्षण में भी बांस की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है। इसकी मजबूत जड़ें मृदा अपरदन रोकने और भूमि की उर्वरता बनाए रखने में सहायक होती हैं।
भारत सरकार का राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission) किसानों को गुणवत्तायुक्त पौधे, तकनीकी प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है। सरकार के इन प्रयासों से किसानों में बांस की व्यावसायिक खेती के प्रति रुचि लगातार बढ़ रही है।
डॉ. धीरज यादव का मानना है कि यदि किसानों को आधुनिक तकनीक, प्रसंस्करण सुविधाएं और बेहतर बाजार उपलब्ध कराए जाएं, तो बांस की खेती ग्रामीण विकास, रोजगार और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। वर्तमान समय में यह खेती किसानों की आर्थिक समृद्धि और पर्यावरण संरक्षण का एक मजबूत आधार बनकर उभर रही है।
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