मिलावटखोरी पर लगाम के लिए सख्त कानून ही नहीं, ईमानदार तंत्र भी जरूरी
लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। खाद्य पदार्थों में मिलावट का कारोबार देश के सामने लंबे समय से एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। त्योहारों के मौसम में दूध, मावा, मिठाई, पनीर, तेल और मसालों से लेकर रोजमर्रा की कई खाद्य वस्तुओं में मिलावट की शिकायतें सामने आती हैं। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता से समझौता न केवल उपभोक्ताओं के साथ आर्थिक धोखा है, बल्कि यह सीधे उनके स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी गंभीर खतरा बन सकता है।
विडंबना यह है कि मिलावटखोरी के खतरों और इसके लिए मौजूद कानूनी प्रावधानों के बावजूद समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल सख्त कानून बना देने से मिलावट पर अंकुश लगाया जा सकता है? वास्तव में कानून की कठोरता के साथ उसके निष्पक्ष, निरंतर और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ईमानदार प्रशासनिक तंत्र भी उतना ही जरूरी है।
महाराष्ट्र में कार्रवाई से फिर चर्चा में आया मुद्दा
इन दिनों महाराष्ट्र में खाद्य पदार्थों में मिलावट के खिलाफ चल रही कार्रवाई ने इस गंभीर विषय को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के आयुक्त पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में मिलावटखोरों और खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अभियान तेज किए जाने की खबरें सामने आईं।
अभियान के शुरुआती दौर में छापेमारी, संदिग्ध खाद्य पदार्थों की जब्ती, गिरफ्तारियों और नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई की गई। नकली दूध, कथित तौर पर रसायनों से तैयार किए जा रहे खाद्य उत्पाद और ताड़ के तेल से बनाए जा रहे ‘एनालॉग पनीर’ जैसे मामलों पर कार्रवाई ने खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।
नियमों और स्वच्छता मानकों का पालन नहीं करने वाले कुछ बड़े खाद्य प्रतिष्ठानों के खिलाफ लाइसेंस निलंबित अथवा रद्द करने जैसी कार्रवाई भी सामने आई। इससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि यदि नियमित, निष्पक्ष और प्रभावी निगरानी हो तो मिलावटखोरी के बड़े नेटवर्क तक पहुंचना और उन पर कार्रवाई करना कितना कठिन है?
जांच के बावजूद क्यों बनी हुई है समस्या?
सरकार की ओर से खाद्य पदार्थों के नमूनों की जांच और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। खाद्य कारोबारियों के लिए पंजीकरण और लाइसेंस व्यवस्था भी लागू है। इसके बावजूद मिलावटखोरी की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं।
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। सबसे बड़ा कारण अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति है। कुछ कारोबारी कम लागत में अधिक उत्पादन और बिक्री के लिए खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता से समझौता करते हैं। दूसरी ओर कारोबार में नैतिक जिम्मेदारी का कमजोर होना भी समस्या को बढ़ाता है।
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू निगरानी और कार्रवाई की व्यवस्था से जुड़ा है। यदि शिकायत मिलने के बाद जांच में देरी हो, नमूने की जांच समय पर न हो या दोष साबित होने के बावजूद कार्रवाई लंबी खिंचती रहे तो कानून का प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में नियमों का उल्लंघन करने वालों के बीच दंड का भय कम होने की आशंका रहती है।
मिलावट केवल आर्थिक धोखा नहीं, स्वास्थ्य का भी सवाल
मिलावट को केवल उपभोक्ता की जेब से जुड़ा मामला मानना उचित नहीं होगा। दूषित या असुरक्षित खाद्य पदार्थों के सेवन से स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। नकली दूध, मिलावटी मावा, दूषित खाद्य सामग्री और अन्य असुरक्षित उत्पादों से खाद्य जनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
यही कारण है कि खाद्य सुरक्षा को सार्वजनिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए। बाजार में किसी खाद्य पदार्थ की बिक्री से पहले और बिक्री के दौरान उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना प्रशासन, कारोबारियों और संबंधित संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी है।
व्यवस्था के ‘सुराख’ भरने की जरूरत
विनोबा भावे ने अपने निबंध ‘नवयुवकों से दो बातें’ में व्यवस्था में मौजूद सुराखों को सदाचार से भरने की आवश्यकता पर जोर दिया था। मिलावटखोरी के संदर्भ में यह विचार आज भी प्रासंगिक दिखाई देता है।
किसी कानून की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितनी कठोर सजा का प्रावधान है। उसकी वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि कानून को जमीन पर कितनी ईमानदारी और निरंतरता से लागू किया जा रहा है।
नियमित निरीक्षण, वैज्ञानिक नमूना जांच, सक्षम प्रयोगशालाएं, समयबद्ध रिपोर्ट, त्वरित कार्रवाई और अधिकारियों की जवाबदेही—ये सभी मिलकर खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं। यदि इनमें से किसी महत्वपूर्ण स्तर पर कमजोरी रहती है तो सख्त कानून भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाता।
त्योहारों तक सीमित न रहे अभियान
त्योहारों के दौरान मिठाई, दूध, मावा, पनीर, तेल और मसालों की मांग बढ़ जाती है। इसी दौरान खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें भी अधिक सामने आती हैं। ऐसे समय में विशेष अभियान चलाना आवश्यक हो सकता है, लेकिन मिलावटखोरी के खिलाफ कार्रवाई केवल त्योहारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
खाद्य सुरक्षा एक वर्षभर चलने वाली प्रक्रिया है। नियमित निरीक्षण और जोखिम आधारित सैंपलिंग के जरिए उन क्षेत्रों और कारोबारियों की पहचान की जा सकती है जहां नियमों के उल्लंघन की आशंका अधिक हो।
केंद्र और राज्यों की साझा जिम्मेदारी
खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए प्रभावी कार्रवाई के लिए दोनों स्तरों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
खाद्य कारोबारियों के पंजीकरण, लाइसेंस व्यवस्था, नियमित नमूना जांच, आधुनिक प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने, डिजिटल निगरानी और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि कार्रवाई केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित न रह जाए। यदि बड़े निर्माता, आपूर्तिकर्ता या संगठित कारोबारी नेटवर्क नियमों का उल्लंघन करते पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी कानून के अनुसार समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए।
दूसरे देशों से क्या सीखा जा सकता है?
दुनिया के कई देशों ने खाद्य सुरक्षा के लिए कानून के साथ मजबूत निगरानी तंत्र विकसित किए हैं। चीन में 2008 के मेलामाइन-दूध प्रकरण के बाद खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को लेकर व्यापक स्तर पर कार्रवाई और सुधार किए गए। गंभीर मामलों में आर्थिक दंड के साथ अन्य कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान है।
ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में Food Standards Australia New Zealand (FSANZ) खाद्य मानकों से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य करता है। वहां राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ राज्यों और स्थानीय स्तर की संस्थाओं की जिम्मेदारियां भी निर्धारित हैं।
अमेरिका में Federal Food, Drug, and Cosmetic Act खाद्य, दवा और कॉस्मेटिक उत्पादों की सुरक्षा से जुड़े प्रमुख संघीय कानूनों में शामिल है। इसके अलावा Food Safety Modernization Act (FSMA) का जोर खाद्य सुरक्षा जोखिमों को उत्पन्न होने के बाद नियंत्रित करने के बजाय उन्हें पहले से रोकने पर है। संदिग्ध या असुरक्षित खाद्य उत्पादों के मामलों में जब्ती, रिकॉल, जुर्माना और अन्य कानूनी कार्रवाई की व्यवस्था है।
ब्रिटेन में Food Safety Act के तहत स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भोजन तैयार करना या बेचना अपराध है। खाद्य मानकों और सुरक्षा की निगरानी में Food Standards Agency (FSA) की महत्वपूर्ण भूमिका है।
इन देशों की व्यवस्थाओं से यह समझा जा सकता है कि खाद्य सुरक्षा के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं होते। निगरानी, जोखिम की पहचान, वैज्ञानिक जांच, जवाबदेही और त्वरित कार्रवाई भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप मॉडल की जरूरत
भारत को दूसरे देशों की व्यवस्थाओं की हूबहू नकल करने के बजाय अपनी सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुरूप प्रभावी खाद्य सुरक्षा मॉडल विकसित करने की आवश्यकता है।
नियमित सैंपलिंग, आधुनिक प्रयोगशालाएं, तेज जांच प्रक्रिया, डिजिटल ट्रैकिंग, आपूर्ति श्रृंखला की निगरानी, दोषी कारोबारियों पर प्रभावी दंड और अधिकारियों की जवाबदेही इस व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं।
उपभोक्ताओं की शिकायतों पर तत्काल प्रतिक्रिया और मिलावट साबित होने पर समयबद्ध कानूनी कार्रवाई भी जरूरी है। साथ ही कारोबारियों को खाद्य सुरक्षा मानकों, स्वच्छता और गुणवत्ता के संबंध में लगातार जागरूक करना भी आवश्यक है।
ईमानदार तंत्र ही कानून को प्रभावी बनाएगा
मिलावटखोरी के खिलाफ लड़ाई केवल सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें खाद्य कारोबारियों, अधिकारियों, प्रयोगशालाओं, स्थानीय निकायों और उपभोक्ताओं की भी भूमिका है।
कारोबारियों की नैतिक जिम्मेदारी यह है कि वे मुनाफे के लिए लोगों के स्वास्थ्य से समझौता न करें। अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे बिना किसी दबाव या पक्षपात के नियमों का पालन सुनिश्चित करें। वहीं उपभोक्ताओं को भी खाद्य पदार्थ खरीदते समय गुणवत्ता, पैकेजिंग, लेबल और संबंधित मानकों के प्रति जागरूक रहना चाहिए।
आखिरकार सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण भोजन केवल बाजार की वस्तु नहीं, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है। मिलावटखोरी पर प्रभावी रोक के लिए सख्त कानून, नियमित निगरानी, वैज्ञानिक जांच, त्वरित न्याय और जवाबदेह प्रशासन—इन सभी का साथ-साथ मजबूत होना जरूरी है।
कानून में कितनी भी कठोरता क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाला तंत्र ईमानदार और जवाबदेह नहीं है तो उसका प्रभाव सीमित रह सकता है। इसलिए मिलावटखोरी के खिलाफ असली लड़ाई कानून की किताब से आगे बढ़कर व्यवस्था की कार्यशैली में ईमानदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करने की है।
लेखक: अभिषेक कुमार
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