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ईश्वर का घर मेरा मनमंदिर हो,
प्रेम सुधा सदा इसमें रख लूँ मैं,
नर देह मिली है मुझको जिसको,
हरि नाम सदा मन से जप लूँ मैं।
सद्भाव अभाव न मेरे मनमानस में,
कुविचार कुसंग कभी न रहा करते,
दुःख-दर्द बड़े इस देह को हैं मिलते,
कर्मन का फल सहा न सहा करते।
वैभव ऐश्वर्य का गर्व नहीं करते,
श्रमशील, सुशील सदैव रहा करते,
जग में मिलते वह मानुष कम ही हैं,
जिनको सब लोग महान कहा करते।
दो तथ्य सत्य महत्व पूर्ण होते हैं,
ईश्वर का घर और ईश्वर का डर,
ईश्वर के घर सदा कृपा बरसती है,
व डर से दुनिया गुनाह नहीं करती है।
पीछे मुड़ का आदेश मिल जाते ही,
पहला सैनिक आख़िरी, आख़िरी
सैनिक पहले नंबर पर आ जाता है,
आदित्य स्थान स्थाई नहीं होता है।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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