महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। सरकारी योजनाओं और जमीनी सच्चाई के बीच की खाई एक बार फिर सामने आई है। लक्ष्मीपुर ब्लाक के एकसड़वां ग्राम पंचायत स्थित डंडा नदी के किनारे जोगियाबारी घाट पर बना अंत्योष्ट स्थल सिर्फ कागजों में ही पूर्ण दिखाया गया है, जबकि वास्तविकता में आज भी ग्रामीणों को खुले आसमान के नीचे अपनों का अंतिम संस्कार करना पड़ रहा है।
सरकार की मंशा ग्रामीण क्षेत्रों में सुव्यवस्थित और सुविधायुक्त अंत्येष्टि स्थल उपलब्ध कराने की थी, ताकि शोक की घड़ी में परिजनों को मूलभूत सहूलियत मिल सके। लेकिन जोगियाबारी घाट की बदहाल तस्वीर यह साबित करती है कि यह योजना फाइलों से आगे नहीं बढ़ सकी।
प्राप्त जानकारी के अनुसार सरकारी अभिलेखों में करीब 10 वर्ष पूर्व इस अंत्येष्टि स्थल के निर्माण पर लगभग 10 लाख रुपये खर्च किए गए थे। इस राशि में टीन शेड, शवदाह के लिए पक्का स्टैंड, शौचालय, पेयजल व्यवस्था, लकड़ी भंडारण कक्ष और केयर टेकर की सुविधा शामिल थी। लेकिन मौके पर स्थिति इसके ठीक उलटा है।
टीन शेड जर्जर हो चुके हैं, बैठने के लिए बने स्लैब टूटे पड़े हैं और शवदाह के लिए आज तक पक्का स्टैंड ही नहीं बन सका। जहां स्टैंड होना था, वहां मिट्टी धंस चुकी है। मजबूरी में परिजन खुले मैदान में चिता सजाते हैं
बरसात के दिनों में स्थिति और भयावह हो जाती है। खुले में शवदाह करना न केवल कठिन होता है, बल्कि शोकाकुल परिजनों को मानसिक व शारीरिक दोनों तरह की पीड़ा झेलनी पड़ती है।
अंत्येष्टि स्थल पर बने शौचालयों की हालत भी बेहद खराब है। सेप्टिक टैंक का ढक्कन गायब है, दरवाजे टूट चुके हैं और चारों ओर झाड़ियां उग आई हैं। उपयोग के लायक न होने से शौचालय बंद पड़े हैं। शवदाह के लिए लकड़ी रखने के लिए बनाए गए गोदाम जर्जर हैं और उनमें आज तक दरवाजे नहीं लग सके।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि पूरा बजट निकाल लिया गया, लेकिन काम अधूरा छोड़ दिया गया। वर्षों से यह घाट आस-पास के दर्जनों गांवों के लिए अंतिम संस्कार का प्रमुख केंद्र है, इसके बावजूद न मरम्मत कराई गई और न ही अधूरे कार्य पूरे हुए।
इस संबंध में जब बीडीओ लक्ष्मीपुर मृत्युजंय कुमार से बात की गई तो उन्होंने कहा कि उन्हें समस्या की जानकारी मिली है। कमियों को दूर कराने के लिए कार्रवाई की जाएगी और जो भी खामियां हैं, उन्हें जल्द पूरा कराया जाएगा।अब सवाल यह है कि क्या जिम्मेदारों की यह कार्रवाई कागजों से निकलकर धरातल पर दिखेगी, या ग्रामीणों को यूं ही खुले आसमान के नीचे अपनों का अंतिम संस्कार करना पड़ेगा?
