फ़िराक़ की जयंती पर शेरो-शायरी की सजी महफ़िल

ग़ज़लों की गूंज से फिराक को डी गयी श्रद्धांजलि

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। उर्दू साहित्य के अमर कवि, ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत और ग़ज़लों के सम्राट कहे जाने वाले रघुपत सहाय ‘फ़िराक़ गोरखपुरी’ की जयंती पर गुरुवार को गोरखपुर, साहित्य और शायरी की रूहानी फिज़ाओं में डूब गया। जब फ़िराक़ लिटरेरी फ़ाउंडेशन गोरखपुर द्वारा अध्यक्ष अरशद जमाल समानी के आवास पर एक भव्य काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस विशेष आयोजन की अध्यक्षता अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर और काव्य संपादक डॉ. कलीम कैसर ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. रहमत अली और इंजीनियर तनवीर सलीम मौजूद रहे। कार्यक्रम में शहर और बाहर से आए साहित्य प्रेमियों की भी उपस्थिति रही, जिन्होंने अपनी शायरी और संवेदनाओं से फ़िराक़ साहब की याद को और गहरा बना दिया। मुख्य अतिथि डॉ. रहमत अली ने कहा कि उनका नाता अलीगढ़ से है और अलीगढ़ का माहौल हमेशा शायरी से सराबोर रहा है, जब भी फ़िराक़ साहब वहाँ मुशायरे में आते थे तो छात्रों का उत्साह देखने लायक होता था, उनकी आवाज़ और लहजा आज भी कानों में गूंजता है। वहीं विशिष्ट अतिथि इंजीनियर तनवीर सलीम ने अपने जीवन का अनुभव साझा करते हुए कहा कि युवावस्था में वे अपने पिता के साथ लखनऊ के मुशायरों में जाया करते थे और वहीं उन्होंने पहली बार फ़िराक़ साहब को मंच पर सुना और देखा था, वह अनुभव आज भी उनके ज़ेहन में ज़िंदा है और उन्हें गर्व है कि वे उसी गोरखपुर के वासी हैं जिसका नाम फ़िराक़ गोरखपुरी से विश्व में जाना जाता है। फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष अरशद जमाल समानी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि फ़िराक़ साहब गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े रहे हैं और इसलिए यह गोरखपुर के लोगों का दायित्व है कि उनकी याद को जिंदा रखें और नई पीढ़ियों तक उनका साहित्य पहुँचाएँ, उनकी जयंती पर यह आयोजन उसी जिम्मेदारी का प्रतीक है। शेर-ओ-शायरी से सजी इस महफ़िल में जब ग़ज़लें, नज़्में और अशआर पेश हुए तो देर रात तक वाह-वाह और दाद की गूंज वातावरण में भरती रही और हर श्रोता साहित्यिक भावनाओं से सराबोर होता नज़र आया। यह आयोजन फ़िराक़ गोरखपुरी को श्रद्धांजलि देने के साथ यह भी साबित किया कि गोरखपुर की सांस्कृतिक विरासत में शायरी की वही चमक आज भी मौजूद है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

Karan Pandey

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