लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। भारत के इतिहास में 16 जनवरी एक ऐसी तारीख है, जो देश की साहसी बेटी कल्पना चावला की ऐतिहासिक अंतरिक्ष यात्रा की याद दिलाती है। 16 जनवरी 2003 को कल्पना चावला ने नासा के स्पेस शटल कोलंबिया से दूसरी बार अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी थी। यह मिशन STS-107 न केवल उनके करियर की ऊंचाई का प्रतीक बना, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अध्याय भी साबित हुआ। हालांकि, यही यात्रा उनकी अंतिम यात्रा भी बनी।
कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 को हरियाणा के करनाल में हुआ था। बचपन से ही उन्हें आकाश, सितारों और विमानों के प्रति गहरा लगाव था। इसी जुनून ने उन्हें पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया। उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका गईं और वर्ष 1994 में उनका चयन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा में अंतरिक्ष यात्री के रूप में हुआ।
अंतरिक्ष में भारत की पहली महिला
साल 1997 में कल्पना चावला ने स्पेस शटल कोलंबिया के मिशन STS-87 के जरिए पहली बार अंतरिक्ष की यात्रा की। इसके साथ ही वह अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला बनीं। यह उपलब्धि न केवल उनके लिए, बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का क्षण थी।
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STS-107 मिशन और दुखद हादसा
16 जनवरी 2003 को कल्पना चावला अपने दूसरे मिशन STS-107 पर रवाना हुईं। यह मिशन 16 दिनों तक चला, जिसके दौरान अंतरिक्ष यान में 80 से अधिक वैज्ञानिक प्रयोग किए गए।
लेकिन 1 फरवरी 2003 को पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश के समय स्पेस शटल कोलंबिया दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हादसे में कल्पना चावला सहित चालक दल के सभी सात सदस्यों की दुखद मृत्यु हो गई। इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया।
प्रेरणा बन चुकी हैं कल्पना चावला
कल्पना चावला का जीवन साहस, संघर्ष और सपनों को साकार करने की मिसाल है। उन्होंने कहा था,
“सपनों में सफलता तक पहुंचने का रास्ता होता है, बस उसे देखने की दृष्टि और उस पर चलने का साहस चाहिए।”
भारत और अमेरिका में उन्हें मरणोपरांत कई सम्मानों से नवाजा गया। आज उनके नाम पर अनेक संस्थान, छात्रवृत्तियां और शैक्षणिक कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। कल्पना चावला भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अमर विरासत और प्रेरणादायक कहानी आने वाली पीढ़ियों को हमेशा नई ऊंचाइयों तक पहुंचने का हौसला देती रहेगी।
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