Wednesday, February 18, 2026
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वट सावित्री व्रत (सुख सौभाग्य का प्रतीक )

बलिया(राष्ट्र की परम्परा)

वट सावित्री व्रत प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष वटसावित्री व्रत 6 जून गुरुवार को है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं।इसलिए यह व्रत सुहागिनों के लिए और भी महत्वपूर्ण हो गया है। यह अमावस्या स्नान दान की भी अमावस्या है। इस दिन व्रत में पूजा पाठ स्नान व दान का अक्षय फल मिलता है। इस दिन सुहागिन स्त्रियां पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। सनातन धर्म में वट सावित्री व्रत बहुत शुभ माना जाता है। इस व्रत का सुहागिन महिलाओं के बीच खास महत्व है। वट सावित्री व्रत के दिन गाय का दूध जल में मिलाकर चढ़ाना चाहिए ऐसा करने से सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है। ऐसा कहा जाता है कि बरगद के पेड़ में ब्रह्मा विष्णु महेश का वास होता है। अगर बरगद के पेड़ की पूजा विधि अनुसार की जाए तो जीवन की सारी बाधा दूर हो जाती है क्योंकि यह वृक्ष साक्षात ईश्वर का प्रतीक माना जाता है। प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर सुहागिन महिलाएं पूजा की थाली श्रृंगार का सामान बांस का पंखा घी का दीपक हवन सामग्री आदि लेकर वटवृक्ष की विधि विधान से पूजा करती हैं। और कच्चा सूत वट वृक्ष में लपेटकर परिक्रमा करती हैं इस दिनवट वृक्ष की पूजा करने से सौभाग्य में वृद्धि होती है। पूजन के बाद सावित्री देवी की कथा भी सुनाई जाती है। उसके बाद कच्चे धागे की एक माला वट वृक्ष पर चढ़ाती हैं और दूसरी धारण करती हैं| धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता सावित्री अपने पति के प्राणों को यमराज से चुरा कर ले आई थी अतः इस व्रत का महिलाओं के बीच विशेष महत्व बताया जाता है इस व्रत को महिलाएं अखंड सौभाग्यवती रहने की मंगल कामना से करती हैं।
सीमा त्रिपाठी
शिक्षिका साहित्यकार लेखिका
लाल

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