Sunday, March 1, 2026
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विशेष संचारी रोग नियंत्रण पखवाडा चलाकर रोग से बचाव एवं नियंत्रण हेतु किया जायेगा जागरूक

देवरिया(राष्ट्र की परम्परा) जिला कृषि रक्षा अधिकारी रतन शंकर ओझा ने बताया है कि जनपद में जे०ई०ए०ई०एस० रोग की रोकथाम हेतु विशेष संचारी रोग नियंत्रण पखवाडा के अन्तर्गत चूहा एवं छछूंदर नियंत्रण कार्यक्रम चलाया जायेगा जो शनिवार से 30 अप्रैल तक चलेगा। अभियान के अन्तर्गत कार्यक्रम चलाकर समस्त कृषकों/जनसमुदाय को रोग से बचाव एवं नियंत्रण हेतु जागरूक किया जायेगा।
चूहा नियंत्रण का साप्ताहिक कार्यक्रम केविवरण में बताया है कि जे०ई० / ए०ई०एस० रोग की रोकथाम हेतु विरोध संचारी रोग नियंत्रण पखवाडा के अन्तर्गत चूहा एवं छछूंदर नियंत्रण,चूहा नियंत्रण अभियान के अन्तर्गत तिथिवार किये जाने वाले कार्य,प्रथम दिन-क्षेत्र भ्रमण एवं कार्यस्थल की पहचान करना, दूसरा दिन खेत / क्षेत्र का निरीक्षण एंव बिलो को बन्द करते हुये चिन्हित कर झण्डे लगाये, तीसरा दिन खेत / क्षेत्र का निरीक्षण कर जो बिल बन्द हो वहा झण्डे हटा दे, जहा पर बिल खुले पाये वहां पर झण्डा लगे रहने दे खुले बिल में एक भाग सरसो का तेल एंव 48 ग्राम भुना चना / गेंहू / चावल आदि से बने चारे को बिना जहर मिलाये बिल में रखे, चौथा दिन बिलो का निरीक्षण कर बिना जहर का वास पुनः रखे, पांचवा दिन जिंक फास्फाईड 80 प्रतिशत की 01 ग्राम मात्रा को 01 ग्राम सरसों तेल व 48 ग्राम भुना चना / गेहू आदि से बने चारे को बिल में रखे , छठवां दिन- बिलो का निरीक्षण करें तथा भरें चूहो को एकत्र कर जमीन में गाड़ दे, सातवा दिन बिलो को पुनः बन्द कर दे, अगले दिन यदि बिल खुले पायें जाए तो कार्यक्रम पुनः अपनाये ।
चूहे मुख्यतः दो प्रकार के होते है घरेलु एवं खेत / क्षेत्र के चूहें घरेलू चूहा घर में पाया जाता है जिसे मूषक कहा जाता है । खेत / क्षेत्र के चूहों में फील्ड रेट साप्ट फील्ड रेट एवं फील्ड माउस प्रमुख हैं, भूरा चूहा खेत / क्षेत्र व घर में दोनो में तथा जंगली चूहा जंगल रेगिस्तान, झाडियों में पाया जाता है । चूहे की संख्या नियंत्रित करने के लिये अन्न भण्डारण पक्का कंक्रीट तथा धातु से बनी बखारी/पात्रों में करना चाहिए ताकि उनको भोज्य पदार्थ सुगमता से उपलब्ध ना हो ।चूहे अपना बिल झाडियों मेढो कूड़ी आदि में स्थायी रूप से बनाते है, क्षेत्रों का समय समय पर निरिक्षण एवं साफ-सफाई करके उनकी संख्या नियंत्रित कर सकतें है । चूहों के प्राकृतिक शत्रुओं – बिल्ली, सांप, उल्लू, बाज, चमगादण आदि द्वारा चूहों को भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है । इनको संरक्षण देने से चूहों की संख्या नियंत्रित हो सकती है। एल्यूमिनियम फास्फाईड दवा की 3-4 ग्राम मात्रा प्रति जिन्दा बिल में डालकर बिल बन्द कर देने से उससे निकलने वाली गैस से चूहे मर जाते है।चूहा नियंत्रण अभियान का क्रियान्वयन चूहा नियंत्रण कार्यक्रम अभियान के रूप में चलाया जायेगा जिसमें स्वयं सेवी संगठनों स्वयं सहायता समूहों किसान क्लबों, कृषि तकनीकी प्रबन्ध अभिकरण ( आत्मा ), बीज / उर्वरक / रसायन विक्रेता इफको सहकारिता का सहयोग प्राप्त किया जायेगा । विभागीय योजनान्तर्गत अनुमन्य 50 प्रतिशत अनुदान पर मूषकनाशी रसायनों को कृषकों को उपलब्ध कराया जायेगा । चूहा नियंत्रण के विषय में परिचर्चा मोबाईल, व्हाट्सप ऐप इत्यादि के माध्यम से जनपद / तहसील / ब्लाक, ग्राम पंचायत स्तर पर चूहा नियंत्रण अपनाने के लिये जन सामान्य को प्रोत्साहित किया जायेगा स्थानीय ग्रामवासियों की सहभागिता से चूहा नियंत्रण से सम्बन्धित नारों की बाल राईटिंग कराकर भी लोगो को जागरूक किया जायेगा इस अभियान के क्रियान्वयन में जनसामान्य का सहयोग प्राप्त करते हुए जनसहभागिता सुनिश्चित करने पर विशेष बल दिया जायेगा ।मच्छर प्रतिरोधी पौधे के संबंध में बताया कि जे०ई० रोग के विषाणु के वाहक मच्छरों को कुछ विशेष पौधों को लगाकर नियंत्रण किया जा सकता है जैसे गेंदा, गुलदाउदी सिट्रोनेला रोज मेरी तुलसी लेवेन्डर, जिरेनियम ये पौधे तीव्र गंध वाले एसेन्शियल आयल अवमुक्त करते है जिनसे मच्छर दूर भाग जाते है इस प्रकार इन फूल पौधों को घरों के आस पास लगाने से वातावरण तो सुगन्धित होता ही है साथ ही खतरनाक मच्छरों से भी बचाव होता है । मेंथा जैसे पौधे चूहों एवं छछूंदरी आदि जीव जन्तुओं को अत्यन्त प्रतिकर्षित करते हैं। कुछ पौधों की प्रजातियों द्वारा तो ऐसे रासायनिक तत्व मुक्त किये जाते है जो मच्छरों की प्रजनन क्षमता कम कर देते है । इस प्रकार इन पौधों के रॉपड द्वारा भी मच्छरों / चूहों को दूर कर जे०ई० / ए०ई०एस रोग से बचाव किया जा सकता है ।

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