भगवान विश्वकर्मा : सृष्टि के दिव्य शिल्पकार और सनातन परंपरा के प्रथम वास्तुविद

लेखक : पंडित सुधीर तिवारी

सनातन धर्म की विराट परंपरा में भगवान विश्वकर्मा का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्हें देवताओं का शिल्पी, दिव्य वास्तुविद, निर्माण एवं शिल्पकला का अधिष्ठाता तथा सृष्टि के अद्भुत निर्माण-तत्व का प्रतीक माना जाता है। भारतीय धार्मिक परंपरा में 17 सितंबर को मनाई जाने वाली विश्वकर्मा जयंती विशेष रूप से शिल्पकारों, कारीगरों, अभियंताओं, तकनीकी कर्मियों, उद्योगों और निर्माण से जुड़े लोगों के लिए श्रद्धा एवं आस्था का पर्व है।
विश्वकर्मा पूजा केवल मशीनों और औजारों की पूजा तक सीमित नहीं है। इसके पीछे कर्म, कौशल, सृजन, तकनीक और श्रम के प्रति सम्मान की एक व्यापक सनातन दृष्टि दिखाई देती है। भगवान विश्वकर्मा का स्मरण मनुष्य को यह संदेश देता है कि निर्माण की प्रत्येक कला में ज्ञान, अनुशासन और सृजनशीलता का महत्व है।
ऋग्वेद में विश्वकर्मा का शास्त्रीय स्वरूप
भगवान विश्वकर्मा के संबंध में सबसे प्राचीन वैदिक संदर्भ ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद के दशम मंडल में विश्वकर्मा सूक्त का उल्लेख है। यहाँ ‘विश्वकर्मा’ शब्द व्यापक अर्थ में उस दिव्य सत्ता के लिए प्रयुक्त हुआ है जो सृष्टि की रचना, व्यवस्था और संरचना से जुड़ी हुई है।
वैदिक मंत्रों में विश्वकर्मा को सर्वदर्शी और सृष्टि की संरचना से संबंधित दिव्य शक्ति के रूप में संबोधित किया गया है। इस वैदिक अवधारणा को बाद की धार्मिक परंपराओं में एक विशिष्ट देवस्वरूप प्राप्त हुआ और वे देवताओं के दिव्य शिल्पी तथा वास्तु एवं निर्माण-कला के अधिष्ठाता माने जाने लगे।
इस प्रकार भगवान विश्वकर्मा की अवधारणा केवल किसी एक काल या एक कथा तक सीमित नहीं है, बल्कि वैदिक चिंतन से लेकर पुराणों और लोकपरंपराओं तक विकसित होती हुई दिखाई देती है।
भगवान विश्वकर्मा की उत्पत्ति और जन्म कथा
भगवान विश्वकर्मा की जन्मकथा के संबंध में विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। इसलिए सभी कथाओं को एक ही निश्चित जन्मकथा के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनके शास्त्रीय संदर्भों को अलग-अलग समझना उचित है।
कुछ पुराणिक एवं धार्मिक परंपराओं में विश्वकर्मा को प्रजापति ब्रह्मा की वंश परंपरा से जोड़ा गया है। वहीं श्रीमद्भागवत महापुराण की वंशावली में वास्तु नामक वसु और अंगिरसी से संबंधित परंपरा का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि भगवान विश्वकर्मा की उत्पत्ति को लेकर सनातन साहित्य में बहुस्तरीय परंपराएँ विद्यमान हैं।
लोकप्रिय धार्मिक परंपरा में उन्हें स्वयं दिव्य शिल्पविद्या के अधिष्ठाता के रूप में स्मरण किया जाता है। उनका स्वरूप केवल किसी व्यक्ति या कलाकार का नहीं, बल्कि सृजन और निर्माण की दिव्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
विश्वकर्मा के पाँच स्वरूप और शिल्प परंपरा
कुछ शिल्प एवं धार्मिक परंपराओं में भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी पाँच प्रमुख ऋषि-परंपराओं अथवा स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। इनमें मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ के नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
इन नामों को अलग-अलग शिल्प परंपराओं और निर्माण-कौशल से जोड़कर देखा जाता है। भारतीय वास्तु, धातुकर्म, निर्माण-कला, यंत्रविद्या और विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्पों की परंपरा में विश्वकर्मा को मूल प्रेरणास्रोत के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि इन पाँच नामों की व्याख्या विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में समान रूप से नहीं मिलती। इसलिए इन्हें सनातन शिल्प परंपरा की विविध व्याख्याओं के रूप में देखना अधिक उचित है।
देवताओं के दिव्य निर्माण से जुड़ी कथाएँ
पुराणिक और लोकधार्मिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा को अनेक दिव्य निर्माणों का शिल्पी बताया गया है। उनके संबंध में स्वर्गलोक, लंका, द्वारका, हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ जैसे नगरों के निर्माण की कथाएँ अत्यंत लोकप्रिय हैं।
सत्ययुग से संबंधित परंपराओं में स्वर्गलोक की दिव्य संरचना को विश्वकर्मा की शिल्पकला से जोड़ा जाता है।
त्रेतायुग की प्रसिद्ध कथा में सोने की लंका के निर्माण का श्रेय भगवान विश्वकर्मा को दिया जाता है। रामायण की विभिन्न परंपराओं में लंका के निर्माण और उसके स्वामित्व से संबंधित कथाओं के अलग-अलग विवरण मिलते हैं।
द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका के निर्माण की कथा भगवान विश्वकर्मा की दिव्य वास्तुकला से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार समुद्र के बीच दिव्य एवं सुरक्षित नगरी का निर्माण उनकी अद्भुत शिल्पविद्या का उदाहरण था।
इसी प्रकार महाभारत की लोकप्रचलित परंपराओं में इंद्रप्रस्थ की अद्भुत वास्तुकला को भी दिव्य शिल्पकला से जोड़ा जाता है।
दिव्य अस्त्रों और यंत्रों के शिल्पी
भगवान विश्वकर्मा की शिल्पकला केवल भवनों और नगरों तक सीमित नहीं मानी जाती। धार्मिक कथाओं में अनेक दिव्य अस्त्रों एवं उपकरणों के निर्माण से भी उनका संबंध बताया गया है।
लोकप्रिय परंपरा में भगवान शिव के त्रिशूल, देवराज इंद्र के वज्र और अन्य दिव्य उपकरणों के निर्माण में विश्वकर्मा की शिल्पविद्या का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार पुष्पक विमान को भी लोकप्रिय धार्मिक कथाओं में दिव्य शिल्प परंपरा से जोड़ा जाता है।
इन कथाओं का मूल भाव यह है कि सनातन चिंतन में तकनीकी ज्ञान और शिल्पकला को दिव्य एवं सम्माननीय माना गया। ज्ञान, कौशल और निर्माण क्षमता को समाज की उन्नति का आधार समझा गया।
विश्वकर्मा जयंती और पूजा की परंपरा
प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है। इस अवसर पर उद्योगों, कारखानों, कार्यशालाओं और निर्माण स्थलों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
कारीगर अपने औजारों की पूजा करते हैं। मशीनों की साफ-सफाई की जाती है और कार्यस्थलों पर भगवान विश्वकर्मा का पूजन किया जाता है। अनेक स्थानों पर वाहन, उपकरण, कंप्यूटर, तकनीकी मशीनरी और उत्पादन से जुड़े साधनों को भी पूजा में सम्मिलित किया जाता है।
इस परंपरा के पीछे गहरा सांस्कृतिक संदेश है—जिस साधन से आजीविका और निर्माण होता है, उसका सम्मान किया जाए।
कर्म और कौशल का सनातन संदेश
भगवान विश्वकर्मा की आराधना हमें श्रम की गरिमा का स्मरण कराती है। कोई भी निर्माण केवल सामग्री से नहीं होता; उसके पीछे ज्ञान, अनुभव, कल्पना, मेहनत और कुशल हाथों का योगदान होता है।
एक शिल्पकार अपने औजारों में केवल लोहे या लकड़ी को नहीं देखता, बल्कि अपनी कला और आजीविका का साधन देखता है। इसी भाव को विश्वकर्मा पूजा धार्मिक सम्मान प्रदान करती है।
आज के आधुनिक युग में जब इंजीनियरिंग, वास्तुकला, मशीनरी, रोबोटिक्स, निर्माण तकनीक और डिजिटल तकनीक मानव जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं, तब भगवान विश्वकर्मा की परंपरा को सृजनशीलता, तकनीकी ज्ञान और कर्म के सम्मान के प्रतीक के रूप में समझा जा सकता है।
शास्त्र और लोकपरंपरा का समन्वय
भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी कथाओं में वैदिक, पुराणिक, शिल्पशास्त्रीय और लोकपरंपराओं के अनेक स्तर दिखाई देते हैं। इसलिए किसी एक लोकप्रिय कथा को ही उनकी संपूर्ण शास्त्रीय पहचान मान लेना उचित नहीं होगा।
ऋग्वेद में विश्वकर्मा का व्यापक वैदिक स्वरूप दिखाई देता है, जबकि बाद की परंपराओं में वे देवताओं के शिल्पी, वास्तुकार और निर्माण-कला के अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित हुए। विभिन्न पुराणों तथा शिल्प परंपराओं में उनकी वंशावली और संतानों के संबंध में भिन्न-भिन्न विवरण मिलते हैं।
इसी विविधता में सनातन परंपरा की व्यापकता भी दिखाई देती है।
आज के युग में भगवान विश्वकर्मा की प्रासंगिकता
आज भगवान विश्वकर्मा की पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रम, तकनीक और कौशल के प्रति सम्मान का सांस्कृतिक पर्व भी बन चुकी है।
एक इंजीनियर की योजना, एक वास्तुविद की कल्पना, एक कारीगर के हाथों का कौशल, एक मशीन ऑपरेटर की दक्षता और एक श्रमिक का परिश्रम—सभी निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
भगवान विश्वकर्मा का स्मरण इसी सामूहिक सृजनशक्ति को नमन है।
सनातन दृष्टि में निर्माण केवल ईंट-पत्थर जोड़ना नहीं है। निर्माण का अर्थ है—विचार को आकार देना, कल्पना को वास्तविकता में बदलना और श्रम के माध्यम से समाज को आगे बढ़ाना।
भगवान विश्वकर्मा की पूजा इसलिए शिल्प की पूजा है, कौशल की पूजा है, कर्म की पूजा है और सृजन की शक्ति को प्रणाम है।
विश्वकर्मा जयंती के पावन अवसर पर सभी शिल्पकारों, कारीगरों, अभियंताओं, तकनीकी विशेषज्ञों, उद्योग कर्मियों और श्रमजीवी साथियों को सादर नमन।
ॐ विश्वकर्मणे नमः।
लेखक — पंडित सुधीर तिवारी