✍️ विजय गुंजन
स्नेह है, अनुराग है, पवित्रता का बंधन है,
ममता भरे एक धागे का हृदय से वंदन है।
अंतरिक्ष-सा विस्तार लिए, प्रकाशमय विश्वास का,
राखी का यह पर्व तो समता का चंदन है।
भाषा की मर्यादा की हर भाई से आशा है,
भारतवर्ष की बहनों की बस इतनी अभिलाषा है।
रक्षा के इस सूत्र का पावन संकल्प हो,
बहनों को मिले सम्मान—यही एक विकल्प हो।
स्त्री-अधिकार की गरिमा का अभिनंदन हो,
हर बहन के जीवन में खुशियों का स्पंदन हो।
प्रेम से भरे हृदय उजालों से परिपूर्ण हों,
बहनों के मन उमगें, आनंद से संपूर्ण हों।
मिठास घुले रिश्तों में, प्रेम बने जीवन का धन,
स्नेह की रोशनी से जगमग हो हर आँगन।
राखी केवल धागा नहीं, विश्वास का दर्पण है,
भाई-बहन के पावन रिश्ते का सुंदर समर्पण है।
— विजय गुंजन
कवि
