नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। पाकिस्तान को आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर एक और बड़ा झटका लगा है। अफगानिस्तान में सत्ता संभाल रहे तालिबान शासन ने पाकिस्तान से दवाओं के आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। अफगानिस्तान के वित्त मंत्रालय ने इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी करते हुए व्यापारियों को पाकिस्तान के बजाय अन्य देशों से वैकल्पिक व्यापारिक रास्ते तलाशने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले को क्षेत्रीय राजनीति में भारत के लिए फायदेमंद कदम के रूप में देखा जा रहा है।
पाकिस्तान से दवाओं पर क्यों लगी रोक?
अफगान मीडिया रिपोर्ट टोलो न्यूज के मुताबिक, अफगानिस्तान के वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देश में दवाओं की तस्करी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। तस्करी के जरिए लाई गई दवाओं को जब्त कर नष्ट किया जाएगा और अवैध मार्गों से होने वाली सप्लाई पर पूरी तरह रोक लगेगी।
अफगानिस्तान चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इन्वेस्टमेंट का मानना है कि इस फैसले से कई सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। इनमें घरेलू दवा उद्योग को बढ़ावा, बाजार में घटिया क्वालिटी की दवाओं की जगह बेहतर विकल्प और नए आयात मार्गों की खोज शामिल है।
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पाकिस्तान से बेहतर हैं अफगान दवाएं?
काबुल की एक फार्मेसी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर हिकमतुल्लाह ने टोलो न्यूज से बातचीत में कहा कि कई मामलों में अफगानिस्तान में बनी दवाएं पाकिस्तान से आयात होने वाली दवाओं से बेहतर गुणवत्ता की हैं। उन्होंने बताया कि लोगों में जागरूकता की कमी के कारण वे अब भी पाकिस्तानी दवाओं की मांग करते हैं, जबकि स्थानीय दवाएं अधिक प्रभावी और सुरक्षित हैं।
भारत को कैसे होगा फायदा?
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान से आयात बंद होने के बाद अफगानिस्तान के लिए भारत एक बड़ा वैकल्पिक दवा आपूर्तिकर्ता बन सकता है। भारत पहले से ही अफगानिस्तान को मानवीय सहायता और दवाओं की सप्लाई करता रहा है। ऐसे में यह फैसला भारत-अफगान व्यापारिक संबंधों को और मजबूत कर सकता है, जबकि पाकिस्तान को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
गौरतलब है कि 12 नवंबर 2025 को अफगानिस्तान के आर्थिक मामलों के उप प्रधानमंत्री मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने वित्त मंत्रालय को निर्देश दिया था कि तीन महीने के भीतर पाकिस्तान से दवाओं का आयात पूरी तरह बंद किया जाए। अब इस आदेश के लागू होने के साथ पाकिस्तान की दवा इंडस्ट्री को करारा झटका लगा है।
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