Tuesday, February 10, 2026
Homeअन्य खबरेलेखसंसदीय मर्यादा बनाम राजनीतिक आक्रामकता: लोकतंत्र के लिए चेतावनी

संसदीय मर्यादा बनाम राजनीतिक आक्रामकता: लोकतंत्र के लिए चेतावनी

लोकसभा के हालिया घटनाक्रम ने भारतीय लोकतंत्र की परंपराओं और संसदीय गरिमा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के बाद प्रधानमंत्री द्वारा उत्तर दिए जाने की दशकों पुरानी परंपरा इस बार टूट गई। विपक्ष के विरोध और लगातार हंगामे के कारण प्रधानमंत्री अगले दिन भी अपना उत्तर नहीं दे सके और बिना उनके वक्तव्य के ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना पड़ा। यह स्थिति न केवल असामान्य रही, बल्कि संसद की स्थापित परंपराओं के लिए भी चिंता का विषय बनी।

संसदीय परंपराओं के अनुसार, धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का उत्तर प्रधानमंत्री द्वारा दिया जाना न केवल अपेक्षित माना जाता है, बल्कि जनता भी इसी उत्तर के माध्यम से सरकार का पक्ष जानने की प्रतीक्षा करती है। जब ऐसी परंपराएं बाधित होती हैं, तो इसका सीधा असर संसद की मर्यादा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर पड़ता है। इससे राजनीतिक तनाव बढ़ता है और आम जनता का लोकतंत्र पर भरोसा कमजोर होता है।

लोकसभा अध्यक्ष द्वारा यह स्पष्ट करना कि संभावित अप्रत्याशित घटनाओं और विपक्षी सांसदों के आक्रामक व्यवहार को देखते हुए प्रधानमंत्री को सदन में आने से रोका गया, स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सदन में व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती इतनी बढ़ गई कि देश के प्रधानमंत्री को बोलने का अवसर तक नहीं मिल सका।

ये भी पढ़े – गांव का नाम बना अभिशाप: बलिया के रूपवार तवायफ में टूटी शादियां, बदली पहचान की मांग

राज्यसभा में भी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान इसी तरह का माहौल देखने को मिला। विपक्षी सांसदों ने हंगामा किया और अंततः सदन से वॉकआउट कर दिया। सवाल उठता है कि क्या इस प्रकार का आक्रामक प्रदर्शन संसदीय उद्देश्यों और देशहित को आगे बढ़ाने में सहायक हो सकता है।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष द्वारा एक अप्रकाशित पुस्तक के कथित अंशों का हवाला देकर प्रधानमंत्री पर आरोप लगाए गए और उन्हें कमजोर शासक साबित करने का प्रयास किया गया। यह न केवल संसदीय मर्यादा के खिलाफ था, बल्कि राजनीतिक समझदारी के लिहाज से भी उचित नहीं माना जा सकता। संसद को आरोप-प्रत्यारोप और हंगामे का मंच बनाने के बजाय, उसे गंभीर चर्चा और नीति निर्माण का केंद्र बनाए रखना आवश्यक है।

हाल के दिनों में संसद परिसर में केंद्रीय मंत्री से जुड़ी घटनाएं भी इसी चिंता को और गहरा करती हैं। जब नेता प्रतिपक्ष द्वारा एक मंत्री को व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए अपमानित किया गया और राजनीतिक शरण का संकेत दिया गया, तो यह साफ दिखाता है कि संसदीय बहस का स्तर गिरता जा रहा है। वैचारिक मतभेदों का स्थान व्यक्तिगत आरोप और कटु भाषा ले रही है, जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

यह विडंबना ही है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव का असर संसद की कार्यवाही और देशहित से जुड़े मुद्दों पर पड़ रहा है। संसद केवल सत्ता संघर्ष का मंच नहीं है, बल्कि यह देश की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है, जहां लोकतांत्रिक मूल्यों, परंपराओं और मर्यादाओं का पालन अनिवार्य है।
समाप्त करते हुए, यह आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दल यह समझें कि हंगामा, व्यक्तिगत आरोप और आक्रामकता से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। बल्कि इससे जनता का विश्वास डगमगाता है। पक्ष और विपक्ष दोनों को संसदीय मर्यादा के उच्च मानकों को अपनाना होगा, ताकि संसद की गरिमा बनी रहे और लोकतंत्र की नींव मजबूत हो सके।

READ THIS: https://ce123steelsurvey.blogspot.com/2025/12/?m=1#google_vignette

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments