Tuesday, February 3, 2026
HomeNewsbeatज़िन्दगी की शाम

ज़िन्दगी की शाम

शिशुपन, बचपन, यौवन बीत गया,
चौथा पन भी अब मेरा बीत रहा है,
जीवन एक एक पल घटा जा रहा है,
जैसे जैसे उम्र का हर पल बीत रहा है।

उम्र का विचार यह समझाता है,
अब जिन्दगी की शाम हो गई है,
मगर ये दिल है जो कहता है कि
महफ़िल शाम से ही शुरू होती है।

दिल जो कहता है वह भी सही है,
शाम की फ़िक्र, रात न बेकार हो,
क्या पता क्या कि कल उठने पर,
सूर्योदय का फिर दीदार हो न हो।

आशा निराशा, उम्र का यह मंजर,
दिल चाहता कुछ है होता कुछ है,
दिल की सुने या वास्तविकता देखें,
ज़िंदगी का यही तो फ़लसफ़ा है।

तभी श्रीकृष्ण जी यह कहते हैं कि
पार्थ कर्म कर, फल की इच्छा न कर,
फल तो मैं ही देने वाला हूँ इसलिए,
आदित्य कर्म धर्म व सत्कर्म कर।

  • डॉ. कर्नल
    आदिशंकर मिश्र, ‘आदित्य’

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments