- नवनीत मिश्र
पूरी दुनिया में 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों और हमारे ग्रह के लिए आर्द्रभूमियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है। आर्द्रभूमियाँ केवल जल से भरे क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति की ऐसी जीवनदायिनी प्रणालियाँ हैं जो पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में मौन लेकिन सशक्त भूमिका निभाती हैं।
विश्व आर्द्रभूमि दिवस पहली बार 2 फरवरी 1997 को मनाया गया था। यह तिथि इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन वर्ष 1971 में ईरान के रामसर शहर में रामसर सम्मेलन पर हस्ताक्षर किए गए थे, जो आर्द्रभूमियों के संरक्षण से जुड़ा एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौता है। इसके 16 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में इस दिवस की शुरुआत हुई।
नमी या दलदली भूमि वाले क्षेत्रों को आर्द्रभूमि या वेटलैंड कहा जाता है। ये वे क्षेत्र होते हैं जहाँ वर्ष भर आंशिक या पूर्ण रूप से जल भरा रहता है। झीलें, तालाब, दलदल, नदियों के तटवर्ती क्षेत्र, मैंग्रोव वन—ये सभी आर्द्रभूमियों के उदाहरण हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली जैव विविधता इन्हें और भी विशिष्ट बनाती है।
आर्द्रभूमियाँ जल को प्रदूषण से मुक्त रखने में सहायक होती हैं। ये प्राकृतिक फिल्टर की तरह कार्य करती हैं, जहाँ जल में मौजूद हानिकारक तत्व और अवसाद छान लिए जाते हैं। इसके साथ ही ये भूजल स्तर को बनाए रखने और बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाती हैं, जो आज के जल संकट के दौर में अत्यंत आवश्यक है।
पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से आर्द्रभूमियाँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकीय तंत्र हैं। बाढ़ के समय ये अतिरिक्त जल को अवशोषित कर लेती हैं, जिससे नदियों का पानी झीलों और तालाबों में फैल जाता है और मानव बस्तियाँ जलमग्न होने से बच जाती हैं। इसके अतिरिक्त आर्द्रभूमियाँ कार्बन अवशोषण में भी सहायक होती हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है।
आज आवश्यकता है कि हम विकास की अंधी दौड़ में आर्द्रभूमियों के अतिक्रमण और विनाश को रोकें। इनके संरक्षण के बिना सतत विकास की कल्पना अधूरी है। विश्व आर्द्रभूमि दिवस हमें यह याद दिलाता है कि यदि हमें भविष्य सुरक्षित चाहिए, तो प्रकृति की इन अमूल्य धरोहरों को बचाना ही होगा।
