Thursday, January 15, 2026
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दान, तपस्या और वचन: राजा बलि की अमर गाथा

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। धार्मिक कथाएं केवल अतीत की स्मृतियां नहीं होतीं, बल्कि ये मानव जीवन को दिशा देने वाले शाश्वत संदेश भी हैं। ऐसी ही प्रेरणादायी कथा है दानवीर राजा बलि की, जिनकी तपस्या, दानशीलता और वचनबद्धता को घुघली क्षेत्र के लक्ष्मीपुर शिवाला स्थित दल सिंगार भवन में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान आचार्य रामरक्षा उपाध्याय ने भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया।
आचार्य रामरक्षा उपाध्याय ने बताया कि सतयुग में ऋषि कश्यप के वंशज, भक्त प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र राजा बलि अपनी कठोर तपस्या और यज्ञों के प्रभाव से इतने शक्तिशाली हो गए कि उन्होंने तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। उनकी कीर्ति, दानशीलता और पराक्रम का यश दूर-दूर तक फैल गया था।
राजा बलि का शासन भले ही असुर कुल का था, लेकिन उनके आचरण में दान और धर्म सर्वोपरि था। उनके बढ़ते प्रभाव से जब देवता भी विचलित हो उठे, तब देवमाता अदिति की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया। वामन रूप में भगवान राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे और उनसे मात्र तीन पग भूमि का दान मांगा।
कथा में बताया गया कि दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि को दान न देने की सलाह दी, लेकिन राजा बलि ने अपने वचन और दान धर्म को सर्वोच्च मानते हुए संकल्प पूरा किया। इसके पश्चात भगवान वामन ने विराट रूप धारण कर पहले पग में पूरी पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग लोक नाप लिया। तीसरे पग के लिए जब स्थान शेष नहीं बचा, तब राजा बलि ने श्रद्धा और समर्पण के साथ अपना मस्तक भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया।
आचार्य ने कहा कि राजा बलि के इस अद्वितीय त्याग और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें चिरंजीवी होने तथा पाताल लोक का राजा बनने का वरदान दिया। यही कारण है कि राजा बलि आज भी दान, सत्य और वचन पालन का प्रतीक माने जाते हैं। श्रीमद्भागवत कथा मानव जीवन को अहंकार से मुक्त कर भक्ति, त्याग और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
कथा मंडप में सहायक आचार्य पंडित मनोज पांडेय द्वारा पार्थिव पूजन और माला जप का कार्य निरंतर किया जा रहा है। कथा श्रवण के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है, जो प्रतिदिन अमृतमयी कथा का रसपान कर आत्मिक शांति का अनुभव कर रही है।
इस अवसर पर मुख्य यजमान गिरिजा देवी दास सहित मिथिलेश देवी, शिवकुमार पटेल, आकाश मणि पटेल, कृष्ण मोहन पटेल, प्रेमलता पटेल, राजीव पटेल, अंजनी पटेल, मंशा पटेल, नीरज पटेल, सत्यभामा पटेल, रविंद्र पटेल, रानी पटेल, आराधना पटेल, रूबी पटेल, राजन पटेल, निकिता पटेल, पल्लवी पटेल, आयुषी पटेल, ऋतिक पटेल, अन्वी पटेल, वैभव पटेल सहित बड़ी संख्या में स्वजन, सगे-संबंधी एवं ग्रामवासी उपस्थित रहे।

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