भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल तिथियों और घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि वह उन व्यक्तित्वों की जीवंत स्मृति है जिन्होंने राष्ट्र की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी थे “मास्टर दा” सूर्य सेन, इंडियन रिपब्लिकन आर्मी के संस्थापक और चटगांव विद्रोह के सफल नेतृत्वकर्ता। उनकी पुण्यतिथि हमें उस निर्भीक चेतना का स्मरण कराती है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नींव को हिला दिया।
सूर्य सेन का जीवन विचार और कर्म की अद्भुत एकता का प्रतीक था। एक शिक्षक के रूप में उनका व्यक्तित्व अनुशासन, सादगी और राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत था। विद्यार्थियों के बीच वे केवल ज्ञानदाता नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का स्वप्न बोने वाले मार्गदर्शक थे। यही कारण था कि उन्हें स्नेह से “मास्टर दा” कहा गया। एक ऐसा संबोधन, जो उनके व्यक्तित्व की आत्मीयता और प्रभाव को दर्शाता है।
बीसवीं सदी के तीसरे दशक में, जब औपनिवेशिक सत्ता अजेय प्रतीत होती थी, तब मास्टर दा ने सशस्त्र क्रांति को संगठित रूप दिया। इंडियन रिपब्लिकन आर्मी के माध्यम से उन्होंने युवाओं को अनुशासित, प्रशिक्षित और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध किया। उनका उद्देश्य अराजक हिंसा नहीं, बल्कि सुनियोजित प्रतिरोध था। ऐसा प्रतिरोध जो जनता के आत्मसम्मान को जगाए और गुलामी की मानसिकता को तोड़े।
1930 का चटगांव विद्रोह मास्टर दा की क्रांतिकारी दृष्टि का शिखर था। शस्त्रागारों पर अधिकार, संचार-व्यवस्था को बाधित करना और ब्रिटिश सत्ता के प्रतीकों को चुनौती देना। ये सभी कदम एक सुविचारित रणनीति का हिस्सा थे। यद्यपि यह विद्रोह दीर्घकालिक रूप से सफल न हो सका, परंतु उसने यह सिद्ध कर दिया कि विदेशी शासन अडिग नहीं है। चटगांव ने पूरे देश में साहस का संचार किया और यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता केवल याचना से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प से प्राप्त होती है।
मास्टर दा का बलिदान उनकी महानता की पराकाष्ठा है। गिरफ्तारी के बाद अमानवीय यातनाएँ, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न। इन सबके बावजूद उन्होंने अपने साथियों का नाम नहीं बताया। 1934 में उनका शहीद होना किसी एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि एक विचार का अमर होना था। उनके बलिदान ने यह स्थापित किया कि क्रांति केवल हथियारों से नहीं, बल्कि चरित्र की दृढ़ता से भी लड़ी जाती है।
आज, जब स्वतंत्र भारत नई चुनौतियों का सामना कर रहा है, मास्टर दा सूर्य सेन का जीवन हमें नैतिक साहस, संगठनात्मक क्षमता और राष्ट्रहित में व्यक्तिगत त्याग का पाठ पढ़ाता है। उनकी विरासत हमें यह याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की रक्षा उतनी ही आवश्यक है जितनी उसकी प्राप्ति।
पुण्यतिथि के इस अवसर पर मास्टर दा को नमन करते हुए यह संकल्प लेना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उनके सपनों के भारत, न्यायपूर्ण, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर राष्ट्र के निर्माण में अपने कर्तव्य का निर्वाह करें।
“मास्टर दा” सूर्य सेन: क्रांति, साहस और बलिदान की अमर गाथा
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