Thursday, March 12, 2026
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कार्यपरिषद की बैठक में सहायक आचार्य (संविदा) नियुक्ति सहित अनेक प्रस्तावों को मंजूरी

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की बैठक विश्वविद्यालय की शैक्षणिक आवश्यकताओं और भविष्य की अकादमिक दिशा को ध्यान में रखते हुए प्रशासनिक भवन स्थित समिति कक्ष में संपन्न हुई। बैठक की अध्यक्षता कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने की। बैठक में विश्वविद्यालय के अकादमिक और प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर विचार करते हुए उन्हें स्वीकृति प्रदान की गई।
बैठक में स्ववित्तपोषित विभागों में सहायक आचार्य (संविदा) की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इसके अंतर्गत कुल 23 सहायक आचार्यों (संविदा) की नियुक्ति का निर्णय लिया गया। विभागवार स्वीकृत पदों में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग (CSE) के 12 पद, फार्मेसी के 5 पद, कृषि के 4 पद तथा बी.कॉम. (बैंकिंग एवं इंश्योरेंस) के 2 पद शामिल हैं। इन नियुक्तियों से संबंधित विभागों में शिक्षण व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
इस अवसर पर कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह निर्णय आवश्यक था। उन्होंने कहा कि इन नियुक्तियों से विद्यार्थियों को बेहतर अकादमिक मार्गदर्शन मिलेगा और विश्वविद्यालय रोजगारपरक व व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के प्रभावी संचालन की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है।
बैठक में शासन के निर्देशों के अनुरूप ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ की नियुक्ति प्रक्रिया से भी कार्यपरिषद को अवगत कराया गया, जिससे शिक्षण में व्यावहारिक अनुभव और उद्योग आधारित ज्ञान को शामिल किया जा सकेगा।
इसके साथ ही कार्यपरिषद ने विश्वविद्यालय के लोगो में विश्वविद्यालय के नाम के लेखन में परिवर्तन को भी स्वीकृति प्रदान की। अब लोगो में DDU Gorakhpur University के स्थान पर Deen Dayal Upadhyaya Gorakhpur University अंकित किया जाएगा, जिससे विश्वविद्यालय की पहचान और अधिक स्पष्ट रूप में स्थापित होगी।
बैठक के दौरान सम्बद्धता समिति के निर्णय के क्रम में 12 महाविद्यालयों को कुल 28 पाठ्यक्रमों के लिए स्थायी सम्बद्धता प्रदान करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई। इसके अतिरिक्त एक महाविद्यालय को एक वर्ष का अस्थायी विस्तार स्वीकृत किया गया। कार्यपरिषद का यह निर्णय उच्च शिक्षा के मानकों को सुदृढ़ करने और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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