डॉ सतीश पाण्डेय
महराजगंज ( राष्ट्र की परम्परा)। आज समाज अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। ऊपर से देखने पर ये समस्याएं अलग-अलग प्रतीत होती हैं—बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अपराध, नशाखोरी, पारिवारिक विघटन, नैतिक पतन और सामाजिक असमानता। लेकिन गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि इन सबके पीछे एक साझा कारण छिपा है—मूल्यबोध और सामाजिक चेतना का क्षय। यही वह समस्या है, जो समाज की जड़ में बैठकर उसे भीतर से खोखला कर रही है।
आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार में भौतिक सफलता को ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य मान लिया गया है। नैतिकता, संवेदना और कर्तव्य बोध पीछे छूटते जा रहे हैं। जब लाभ ही सर्वोपरि हो जाता है, तब सही-गलत का भेद मिटने लगता है। इसी मानसिकता से भ्रष्टाचार जन्म लेता है, अपराध को बढ़ावा मिलता है और रिश्तों में स्वार्थ हावी हो जाता है। यह स्थिति किसी एक वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज में फैल चुकी है।
परिवार, जो कभी संस्कारों की पहली पाठशाला हुआ करता था, आज स्वयं संकट में है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, संवाद की जगह टकराव ने ले ली है। बच्चों को सुविधा तो मिल रही है, लेकिन दिशा नहीं। जब बचपन से ही नैतिक शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध नहीं कराया जाता, तो आगे चलकर वही पीढ़ी समाज के लिए समस्या बन जाती है।
शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण से हटकर केवल डिग्री और रोजगार तक सीमित हो गया है।
परिणामस्वरूप शिक्षित युवा तो बढ़ रहे हैं, लेकिन संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक कम होते जा रहे हैं। यही कारण है कि पढ़ा-लिखा वर्ग भी कई बार सामाजिक कुरीतियों का हिस्सा बनता दिखाई देता है। सामाजिक असमानता और अन्याय भी समाज की जड़ को कमजोर कर रहे हैं। जब कुछ लोग सुविधाओं और संसाधनों पर एकाधिकार जमाए रखते हैं और बड़ी आबादी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करती है, तो असंतोष और विद्रोह जन्म लेते हैं। यह स्थिति सामाजिक एकता को खंडित करती है और व्यवस्था के प्रति अविश्वास को बढ़ाती है।समाधान की बात करें तो केवल कानून या प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। समाज की जड़ में बैठी समस्या का समाधान सामूहिक आत्ममंथन से ही संभव है। परिवार को फिर से संस्कारों का केंद्र बनाना होगा, शिक्षा में नैतिक और सामाजिक मूल्यों को स्थान देना होगा और प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना होगा।
अंततः यह समझना होगा कि समाज कोई बाहरी संरचना नहीं, बल्कि हम सबका प्रतिबिंब है। जब व्यक्ति सुधरेगा, तभी समाज सुधरेगा। यदि आज भी हम चेत नहीं पाए, तो यह जड़ में बैठी समस्या आने वाली पीढ़ियों के लिए और भी गंभीर संकट बन सकती है। इसलिए समय की मांग है कि हम केवल समस्याओं पर चर्चा न करें, बल्कि समाधान का हिस्सा बनें—क्योंकि स्वस्थ समाज ही सशक्त राष्ट्र की नींव होता है।
