Thursday, February 12, 2026
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राष्ट्र निर्माण में आध्यात्मिक शक्ति

कैलाश सिंह

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। किसी भी राष्ट्र की मजबूती केवल उसकी आर्थिक प्रगति, सैन्य क्षमता या भौतिक संसाधनों से नहीं आंकी जाती, बल्कि उसकी आत्मा—उसके नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकता से तय होती है। भारत जैसे प्राचीन सभ्यता वाले देश के लिए आध्यात्मिक शक्ति कोई अमूर्त अवधारणा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला रही है। जब-जब भारत ने आत्मिक चेतना को अपनाया, तब-तब उसने विश्व को दिशा दी।
आध्यात्मिक शक्ति व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है। यह आत्मसंयम, विवेक और कर्तव्य बोध का विकास करती है। एक ऐसा नागरिक जो नैतिक रूप से जागरूक हो, वही समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार बनता है। भ्रष्टाचार, हिंसा, असहिष्णुता और स्वार्थ जैसी समस्याओं की जड़ कहीं न कहीं नैतिक पतन में छिपी है। आध्यात्मिक चेतना इन विकृतियों पर अंकुश लगाने का कार्य करती है।भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन इसका सशक्त उदाहरण है। अहिंसा, सत्य और त्याग जैसे आध्यात्मिक मूल्यों ने जन-आंदोलन को शक्ति दी,और साधारण नागरिकों को असाधारण साहस से भर दिया। यह स्पष्ट करता है कि आध्यात्मिक शक्ति केवल ध्यान और साधना तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक ऊर्जा है।
आज के आधुनिक और तकनीकी युग में भी आध्यात्मिक शक्ति की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। तेज विकास के साथ बढ़ता तनाव, सामाजिक विघटन और मूल्यहीन प्रतिस्पर्धा यह संकेत देते हैं कि भौतिक उन्नति अकेले पर्याप्त नहीं। जब तक विकास के साथ विवेक नहीं जुड़ता, तब तक प्रगति अधूरी रहती है। आध्यात्मिकता इसी विवेक का स्रोत है।
राष्ट्र निर्माण के लिए केवल योजनाएं और कानून पर्याप्त नहीं, उन्हें लागू करने वाले चरित्रवान नागरिक भी चाहिए। आध्यात्मिक शिक्षा व्यक्ति को न केवल अपने अधिकारों का बोध कराती है, बल्कि कर्तव्यों की याद भी दिलाती है। यही संतुलन किसी भी लोकतंत्र को स्थायी बनाता है।सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, सेवा भाव और राष्ट्र के प्रति निष्ठा—ये सभी आध्यात्मिक चेतना से ही पुष्ट होते हैं। जब नागरिक मैं से ऊपर उठकर हम की भावना अपनाते हैं, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है।
अतः समय की मांग है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में आध्यात्मिक शक्ति को हाशिये पर न रखा जाए, बल्कि उसे मूल में स्थान दिया जाए। शिक्षा, नीति और सामाजिक जीवन में नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश ही एक सशक्त, संतुलित और समृद्ध राष्ट्र की नींव रख सकता है।
अंततः मजबूत इमारतें और तेज अर्थव्यवस्था राष्ट्र की पहचान हो सकती हैं,लेकिन उसकी आत्मा आध्यात्मिक शक्ति से ही जीवित रहती है।

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