Monday, February 16, 2026

स्मृति

संत स्वरूप जीवनदृष्टा: परम पूज्य स्वर्गीय रुद्र नारायन सिंह जी

  • राम शंकर सिंह
    गृहस्थ जीवन जीते हुए भी संत स्वरूप आचरण करने वाले, शिक्षा और समाज सेवा को जीवन का साधन बनाने वाले, परोपकार में निरंतर रमे रहने वाले थे स्वर्गीय रुद्र नारायन सिंह जी।
    उनका जन्म सन् 1898 में खलीलाबाद तहसील के देवरिया गंगा गाँव में हुआ। मात्र 14 वर्ष की आयु में उनका विवाह जनपद देवरिया के बरडीहा ग्राम में हुआ, किंतु वैवाहिक सुख उन्हें अल्पकाल ही मिला। उनकी धर्मपत्नी विवाह के चार वर्ष पश्चात गोलोकवासी हो गईं। जीवन की इस पीड़ा को सहते हुए भी उन्होंने पुनः विवाह न कर शिक्षा, अध्यापन और समाज सेवा को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया।
    लालगंज के विद्यालय में हेड मास्टर पद पर रहते हुए उन्होंने बच्चों को केवल पाठ्यज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि जीवन जीने का गुरुमंत्र भी सिखाया। उनकी निष्ठा और कार्यकुशलता को देखकर प्रशासन ने उन्हें पोस्ट मास्टर का दायित्व भी सौंपा। दोनों पदों का निर्वहन उन्होंने सत्यनिष्ठा, परिश्रम और समर्पण से किया। उनके जीवन में रामचरितमानस ही श्वास-प्रश्वास बन चुका था। वे हर समय “राम नाम” का जप करते और दूसरों को भी भक्ति और सेवा की राह दिखाते थे।
    उस काल में जब अन्न का संकट गहराता था और घरों के चूल्हे अक्सर ठंडे रहते थे, तब वे जरूरतमंदों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्नदान करते। असहाय, ईमानदार और पीड़ित व्यक्ति की हर संभव सहायता करना उनके जीवन का नियम था। छोटे भाई मुकुंद नारायन सिंह के असमय निधन के बाद उन्होंने उनके पुत्रों राम किंकर सिंह और राम शंकर सिंह की परवरिश, शिक्षा-दीक्षा और गृहस्थ जीवन की हर आवश्यकता को आपने पुत्रवत पूरा किया।
    उनकी प्रेरणा से उनके भतीजे राम किंकर सिंह ने 1975 में कृषक वैस पूर्व माध्यमिक विद्यालय, देवरिया गंगा की स्थापना की, जिसने ग्रामीण बच्चों में शिक्षा की ज्योति प्रज्वलित की। आज उसी परंपरा को उनके पौत्र संतोष सिंह (एमएलसी एवं भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष) और अन्य परिजन समाज सेवा और शिक्षा क्षेत्र में आगे बढ़ा रहे हैं।
    रुद्र नारायन सिंह जी की पावन स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके पौत्र राम कुमार सिंह ने 2014 में संत कबीर नगर के महदेवा नानकार गांव में रुद्र नारायन सिंह स्मृति शिक्षण संस्थान द्वारा आरएनएस मेमोरियल एकेडमी की स्थापना की। यह विद्यालय पिछड़े क्षेत्र के गरीब बच्चों को नाम मात्र के शुल्क पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करा रहा है।
    सन् 1981 में 83 वर्ष की आयु में वे ब्रह्मलीन हो गए। किंतु उनका जीवनदर्शन, त्याग, सेवा और शिक्षा की ज्योति आज भी उनके परिवार और संस्थानों के माध्यम से प्रज्वलित है।
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