स्वामी करपात्री जी महाराज
भारत की शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, रक्षा, सेवा और उत्सव त्योहार जैसी व्यवस्थाएँ सदियों से समाज को संतुलित रूप में दिशा देती रही हैं। ये तंत्र केवल प्रशासनिक ढाँचे नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवित रूप हैं, जिनका मूल उद्देश्य हर व्यक्ति को समान रूप से सुलभ और उपयोगी व्यवस्था प्रदान करना है। इसके बावजूद आज इन सभी व्यवस्थाओं के प्रति विश्वस्तर पर जो अविश्वास और अनास्था दिखाई देती है, वह अपने आप नहीं उत्पन्न हुई। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज इस अविश्वास के पीछे दो प्रमुख कारण बताते हैं, योजनाबद्ध दुष्प्रचार और स्वतंत्रता के बाद का सत्तालोलुप, अदूरदर्शी तथा दिशाहीन शासन–व्यवस्था और व्यापारतंत्र।
भारतीय व्यवस्थाओं के खिलाफ लंबे समय तक एक ऐसा वातावरण बनाया गया, जिसमें परंपरा, शिक्षा, भारतीय चिकित्सा, न्याय तंत्र और त्योहारों को पिछड़ा, अवैज्ञानिक या अप्रासंगिक बताकर प्रस्तुत किया गया। आधी-अधूरी जानकारियाँ, पश्चिमी चश्मे से की गई तुलना और प्रचार के माध्यमों का उपयोग कर यह भ्रम पैदा किया गया कि भारतीय तंत्र आधुनिक आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। इस योजनाबद्ध दुष्प्रचार ने समाज की मानसिकता को प्रभावित किया और व्यवस्था पर से विश्वास कम होता गया।
स्वतंत्रता के बाद शासन को जिन आदर्शों के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए था, उसमें निरंतरता और दूरदर्शिता की कमी दिखाई दी। सत्ता की राजनीति, स्वार्थ, नीतियों में अस्थिरता और प्रशासनिक अव्यवस्था ने शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय तंत्र की प्रगति को प्रभावित किया। दूसरी ओर व्यापारतंत्र ने भारतीय समाज को संस्कृति से जोड़ने के बजाय उपभोक्तावाद की ओर धकेला। लाभ-केन्द्रित दृष्टिकोण के कारण उत्सव, परंपराएँ, शिक्षा और स्वास्थ्य तक बाज़ार का हिस्सा बन गए, जिससे लोगों के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास और गहराता गया।
स्वामी करपात्री जी महाराज का विचार इस सत्य को सामने लाता है कि समस्या भारतीय तंत्रों में नहीं, बल्कि उनकी प्रस्तुति और संचालन में आई गड़बड़ियों में है। भारतीय व्यवस्था की आत्मा आज भी जीवित है। हमारी शिक्षा में मूल्य आज भी मौजूद हैं, स्वास्थ्य सेवाओं में सेवा-भाव अब भी मिलता है, न्याय व्यवस्था सुधार की ओर बढ़ रही है और त्योहार समाज को जोड़ते हैं।
यदि योजनाबद्ध दुष्प्रचार का प्रभाव समाप्त हो और शासन तथा व्यापारतंत्र सही दिशा में कार्य करें, तो भारतीय जीवन-व्यवस्था पुनः विश्व के लिए आदर्श बन सकती है। समाधान व्यवस्था को दोष देने में नहीं, बल्कि सत्य की पहचान करने और विश्वास को पुनः स्थापित करने में है।
