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परिसीमन पर फिर आमने-सामने सरकार और विपक्ष! PM मोदी को खड़गे का चौथा पत्र, बोले- बिना सहमति नहीं चलेगा कोई बड़ा फैसला

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। देश में परिसीमन को लेकर सियासी घमासान एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चौथा पत्र लिखकर परिसीमन प्रस्तावों पर संसद में पेश किए जाने से पहले तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। खड़गे ने सरकार को स्पष्ट संदेश दिया है कि संसद के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करने वाले इतने बड़े संवैधानिक बदलाव पर बिना व्यापक विचार-विमर्श और आम सहमति के आगे नहीं बढ़ना चाहिए।
शुक्रवार को भेजे गए पत्र में खड़गे ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए प्रक्रियात्मक और संवैधानिक चिंताएं सामने रखीं। उन्होंने कहा कि परिसीमन जैसे संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों को भरोसे में लेना जरूरी है। उनका तर्क है कि इस तरह के फैसले केवल सरकार की इच्छा से नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति और पारदर्शी चर्चा के आधार पर होने चाहिए।
खड़गे ने पत्र में संसद के मानसून सत्र का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 13 अगस्त को सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद 64 दिनों का अंतराल हो चुका है, जबकि उनके अनुसार संसद का औपचारिक सत्रावसान भी नहीं हुआ है। उन्होंने इस स्थिति को असाधारण बताते हुए सरकार से सवाल किया कि इतने महत्वपूर्ण संवैधानिक विषय पर सभी दलों के साथ औपचारिक चर्चा करने में देरी क्यों हो रही है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने अप्रैल में हुए घटनाक्रम को याद दिलाते हुए कहा कि सरकार ने परिसीमन से जुड़े संवैधानिक संशोधन विधेयक को पेश करने से पहले विपक्ष की सर्वदलीय बैठक की मांग पर ध्यान नहीं दिया था। खड़गे के मुताबिक, उन्होंने 11 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि परिसीमन से संबंधित कोई भी संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने से पहले सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठक की जाए।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस अनुरोध के बावजूद सरकार ने 14 अप्रैल की देर शाम विधेयकों को सार्वजनिक किया और 16 अप्रैल को विशेष संसदीय सत्र बुलाया। इसके बाद 17 अप्रैल को लोकसभा में संबंधित संवैधानिक संशोधन विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। खड़गे ने इस घटनाक्रम को सरकार की जल्दबाजी और विपक्ष को विश्वास में नहीं लेने की समस्या से जोड़ते हुए अब नए प्रस्तावों पर पहले चर्चा कराने की मांग दोहराई है।
खड़गे ने बताया कि वह इस मुद्दे पर पहले भी कई बार प्रधानमंत्री से संपर्क कर चुके हैं। उन्होंने 16 जुलाई और 27 अगस्त 2026 को भी पत्र लिखकर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी। अब चौथी बार पत्र भेजकर उन्होंने सरकार से अपील की है कि किसी नए कानून या संवैधानिक संशोधन की दिशा में आगे बढ़ने से पहले सभी दलों के विचार सुने जाएं।
परिसीमन का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसके तहत संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था में बदलाव हो सकता है। ऐसे बदलावों का असर राज्यों और विभिन्न क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। इसी वजह से इस विषय पर राजनीतिक दलों के बीच व्यापक सहमति बनाने की मांग लगातार उठती रही है।
खड़गे का कहना है कि राष्ट्रीय महत्व के ऐसे संवैधानिक सुधारों पर एकतरफा फैसला लेने के बजाय सरकार को विपक्ष के साथ व्यवस्थित संवाद करना चाहिए। अब राजनीतिक नजरें केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह कांग्रेस की इस मांग पर क्या रुख अपनाती है और परिसीमन प्रस्तावों को लेकर आगे किस तरह की प्रक्रिया अपनाई जाती है।