सूर्य देवता का यह प्रकोप है,
या गर्म हवा के जलते झोंके हैं,
सूरज बाबा का तेज व्याप्त है,
या पछुवा पवन के शोर ज़ोर हैं।
दोनों को ये कैसा साथ मिला है,
संग संग मिल कर सारे जग को,
अपनी तपती मुट्ठी में कर लेते हैं,
तीनों लोकों में त्राहि मचा देते हैं।
पछुआ की लू लपटें बनकर,
फैलाती रहती हैं अपना ताप,
कहीं किसी का घर जलता है,
कहीं कहीं पर है उठती भाप।
दोनों मिल करते ऐसा उत्पात,
सब इंसानों का भुनता है गात,
हाथ जोड़ विनती करे सारा जग,
नहीं सुनते हैं वह किसी की बात।
टप-टप टपके तन से पसीना,
हो सुबह सुबह या सायंकाल,
एसी, पंखे दिन – रात हैं चलते,
आदित्य इस गर्मी से सब बेहाल।
डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’
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