बेसहारा ज़िंदगी का वालिद कौन? समाज, परिवार और व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। आज समाज के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा है, जो जितना संवेदनशील है उतना ही शर्मनाक भी—बेसहारा ज़िंदगी का वालिद कौन? सड़कों पर भटकते बच्चे, वृद्धाश्रमों में आंसुओं के साथ जीवन काटते बुजुर्ग, अनाथालयों में पलती मासूम आंखें और न्याय के लिए संघर्ष करती महिलाएं—ये सभी किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक विफलता की तस्वीर पेश करते हैं।

आज यह सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि बेसहारा होने के पीछे केवल किस्मत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से भागता इंसान और संवेदनहीन व्यवस्था है। सवाल यह नहीं कि बेसहारा कौन है, बल्कि यह है कि उसे बेसहारा बनाने वाला कौन है?

हर बच्चा माता-पिता की छांव में सुरक्षित भविष्य के सपने के साथ जन्म लेता है। लेकिन गरीबी, नशा, घरेलू हिंसा और सामाजिक दबावों के कारण जब माता-पिता अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हैं, तब एक मासूम ज़िंदगी बेसहारा हो जाती है। कई मामलों में पिता का नाम केवल कागज़ों तक सीमित रह जाता है, वास्तविक जीवन में उसकी भूमिका शून्य हो जाती है।

वहीं दूसरी ओर, जिन वृद्ध माता-पिता ने पूरी उम्र अपनी संतान के लिए त्याग किया, वही संतान उन्हें बोझ समझने लगती है। ऐसे में यह सवाल उठता है—क्या केवल जन्म देना ही वालिद होने की पहचान है, या जीवन भर साथ निभाना भी उसकी जिम्मेदारी है?

ये भी पढ़ें – ई-रिक्शा चालक पर हथौड़े से हमला दबंगों ने लूटी दिनभर की कमाई

व्यवस्था की उदासीनता भी जिम्मेदार

परिवार के बाद समाज और शासन की जिम्मेदारी बनती है, लेकिन हकीकत यह है कि सरकारी योजनाएं और कानून अक्सर कागज़ों में ही सिमट कर रह जाते हैं। बेसहारा बच्चों के संरक्षण और बुजुर्गों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधान अमल के अभाव में दम तोड़ देते हैं। जब सिस्टम सोया रहता है, तब शोषण फलता-फूलता है।

सड़कों पर भीख मांगते बच्चे, मजदूरी करते नाबालिग और अकेलेपन में दम तोड़ते बुजुर्ग—ये किसी एक घर की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की हार का प्रमाण हैं।

समाज का नैतिक पतन

आज रिश्ते संवेदना पर नहीं, सुविधा पर टिके हैं। जब तक कोई उपयोगी है, तब तक उसका महत्व है; उपयोग खत्म, तो रिश्ता भी खत्म। यही सोच बेसहारा ज़िंदगी की सबसे बड़ी वजह बन रही है। हम दूसरों के दुख से आंखें फेर लेते हैं, यह सोचकर कि यह हमारी जिम्मेदारी नहीं।
लेकिन सच्चाई यह है कि जब समाज सवाल पूछना छोड़ देता है, तभी अन्याय जन्म लेता है।

बेसहारा ज़िंदगी किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि लापरवाह परिवार, असंवेदनशील समाज और उदासीन व्यवस्था—तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी है।
यह लेख केवल सवाल उठाने के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए है। क्योंकि अगर आज हमने जवाब नहीं ढूंढा, तो कल कोई हमसे पूछेगा—जब ज़रूरत थी, तब आप कहां थे?

Read this: https://ce123steelsurvey.blogspot.com/2025/12/?m=1

Karan Pandey

Recent Posts

रोहिन नदी में नहाने गए दो मासूम डूबे एक की मौत एक की तलाश जारी

एनडीआरएफ की टीम का सर्च ऑपरेशन जारी, गांव में पसरा मातम मौके पर पहुंचे जनप्रतिनिधि…

7 hours ago

मोहर्रम को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने पर जोर, पीस कमेटी की बैठक सम्पन्न

सिकंदरपुर /बलिया (राष्ट्र क़ी परम्परा ) आगामी मोहर्रम पर्व को शांतिपूर्ण एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण में…

7 hours ago

डीडीयू के पीजी एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का परिणाम घोषित

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर द्वारा सत्र 2025-26 के विभिन्न स्नातकोत्तर…

7 hours ago

रिंग से लेकर समाज सेवा तक: डीडीयू के सनी सिंह बने खेल और सामाजिक बदलाव के नए यूथ आइकॉन

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। प्रतिभा, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर दीनदयाल उपाध्याय…

8 hours ago

निंबस डिस्कवरी टूल से डिजिटल संसाधनों तक पहुँच पर बीबीएयू में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के गौतम बुद्ध केंद्रीय पुस्तकालय द्वारा…

8 hours ago

राप्ती नदी में चार बच्चे डूबे तलाश में जुटी एनडीआरएफ

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)जिले के माधवपुर क्षेत्र में राप्ती नदी में नहाने गए चार बच्चों के…

9 hours ago