सुख दुःख का जिम्मेदार इंसान स्वयं होता है,
सुर या असुर भाव मन में स्वतः छिपा होता है,
बिचार ही हमे सज्जन और दुर्जन बनाते हैं,
और हम इंसान से शैतान बन जाते हैं।
जिन के मन में सबके लिए प्रेम है,
वह अनावश्यक गुस्सा नहीं करते हैं,
वही गलतियो को माफ़ कर सकते हैं,
सबके लिए मन में दया भाव होते हैं।
सज्जन व्यक्ति जहाँ भी होते हैं
ईश्वर सदा वहीं वास करते हैं,
जिनके मन में ईर्ष्या लोभ होता है
वही बहुत अधिक गुस्सा कर्रते हैं।
उनके मन में कभी किसी के लिए
कोई दया का भाव नहीं होता है,
उनके मन मंदिर में कभी ईश्वर का
शुभ व पवित्र निवास नहीं होता है।
क्रोध मनुष्य के पतन का कारक है,
ऐसे लोग अपने तामसी बिचारों के
कारण ही समाज का और स्वयं का
सिर्फ सदा अनहित ही करते रहते हैं।
क्रोध में व्यक्ति आपा खो देता है,
फिर सही निर्णय नहीं ले पाता है,
क्रोध काल बन सर नाचने लगता है,
वह किसी पर भी वार कर सकता है।
फिर वह खुद का नुकसान करता है,
उन के मन में ईश का वास नहीं होता,
जिनके मन में दया, क्षमा भावना है,
उनके मन में प्रभू के प्रति श्रद्धा है।
इस कविता से ये मर्म को समझना है,
जिसके मन में दया व क्षमा भाव है,
उसके मन में धर्म क़र्म का वास है,
आदित्य ईश्वर के प्रति विश्वास है।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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