कैलाश सिंह
महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। इंसानियत केवल शब्द नहीं, बल्कि आचरण, संवेदना और जिम्मेदारी का जीवंत रूप है। लेकिन आज के बदलते दौर में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो गया है कि इंसानियत की असली पहचान आखिर कहां निहित है—प्राचीन मर्यादा में या आधुनिक आजादी में? समाज इसी द्वंद्व से गुजर रहा है, जहां दोनों धाराएं अपनी-अपनी सच्चाई के साथ आमने-सामने खड़ी हैं।
प्राचीन मर्यादा ने समाज को अनुशासन, संयम और कर्तव्य का बोध कराया। रिश्तों में आदर, सामाजिक जिम्मेदारी और सामूहिक हित को प्राथमिकता इसी मर्यादा की देन है। बुजुर्गों का सम्मान, कमजोर की रक्षा और सीमाओं के भीतर रहकर स्वतंत्रता का उपयोग—यही मर्यादा इंसानियत का आधार रही है। यह मर्यादा इंसान को केवल अधिकार नहीं, कर्तव्य भी सिखाती है।वहीं आधुनिक आजादी ने व्यक्ति को अपनी पहचान चुनने, सवाल करने और आगे बढ़ने का साहस दिया। समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों की चेतना आधुनिक सोच की सकारात्मक देन है। लेकिन जब यहआजादी जिम्मेदारी से कट जाती है, तब वह स्वार्थ, असंवेदनशीलता और अराजकता का रूप लेने लगती है।
समस्या मर्यादा या आजादी में नहीं, उनके अतिवाद में है। केवल मर्यादा समाज को जड़ बना सकती है और केवल आजादी उसे दिशाहीन। आज हम ऐसे उदाहरण देख रहे हैं जहां अधिकारों की बात तो खूब होती है, लेकिन कर्तव्यों की चर्चा कम होती जा रही है। रिश्तों की मर्यादा टूट रही है और संवेदना शब्दों तक सीमित रह गई है।
तकनीक और आधुनिक जीवन-शैली ने इस द्वंद्व को और गहरा किया है। संवाद का अभाव, बढ़ती व्यस्तता और आभासी रिश्तों ने इंसानियत को औपचारिक बना दिया है। आज इंसान जुड़ा तो है, लेकिन समझने वाला कम होता जा रहा है। इंसानियत की पहचान किसी एक ध्रुव में नहीं, बल्कि संतुलन में छिपी है। आधुनिक आजादी को मानवीय मर्यादा का सहारा और प्राचीन मर्यादा को आधुनिक विवेक की रोशनी मिले—तभी समाज मानवीय बनेगा। वरना सवाल यही रहेगा कि हम आधुनिक तो हो गए, लेकिन इंसान कितने रह गए?
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