दफ्तर में सालगिरह का ‘डांस-बार’, महंगे तोहफों का शौक; क्या शिक्षक की गाढ़ी कमाई से उड़ती थी शराब?

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)जिस बेसिक शिक्षा कार्यालय में एक ईमानदार शिक्षक ने फांसी लगाकर अपनी पीड़ा समेटी, उसी दफ्तर में कभी शाही जश्न गूंजते थे। निलंबित बीएसए शालिनी श्रीवास्तव के रॉयल स्टाइल के किस्से अब विभागीय गलियारों में जुबान पर चढ़ गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, हाल ही में उनकी ‘मैरिज एनिवर्सरी’ पर सरकारी कार्यालय देर रात तक पार्टी हॉल में तब्दील रहा। सवाल यह नहीं कि पार्टी हुई, सवाल यह है कि इस दावत का बिल किसकी जेब से निकला?

सरकारी दफ्तर, निजी महफिल, और ‘वसूली’ का हिसाब-किताब

बताया जाता है कि इस ‘प्राइवेट सेलिब्रेशन’ में दफ्तर के कुछ ‘चहेते’ बाबुओं के अलावा बाहर से भी कई रसूखदार शामिल हुए। लजीज व्यंजनों की महक और देर रात तक चले इस इवेंट ने यह सवाल जरूर छोड़ दिया कि आखिर एक सरकारी कार्यालय में निजी आयोजन की अनुमति किसने दी? और क्या यह वही ‘सिंडिकेट’ नहीं था, जो शिक्षकों की गाढ़ी कमाई से पैदा हुआ था?

‘गिफ्ट कल्चर’ का भूत: महंगे तोहफों का शगल

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जिले के रसूखदार और प्रशासनिक हलकों में एक और चर्चा जोरों पर है – महंगे तोहफों का शौक। सूत्र बताते हैं कि निलंबित बीएसए को विभिन्न कार्यक्रमों और इवेंट्स में लग्जरी गिफ्ट्स भेंट करने का चलन काफी समय से था। ये तोहफे इतने कीमती होते थे कि आम शिक्षक की एक महीने की तनख्वाह भी उनके सामने फीकी पड़ जाती। अब पूछा जा रहा है कि क्या ये ‘शगल’ भी उसी वसूली मनी से चलता था, जिसकी भेंट शिक्षक कृष्ण मोहन सिंह चढ़ गए?

खास इंतजाम और ‘करीबी बाबुओं’ की एंट्री

चर्चाओं का दायरा और भी आगे बढ़ता है। कहा जा रहा है कि इन पार्टियों में ‘खास इंतजाम’ भी किए जाते थे। हालांकि आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन दबी जुबान यह भी कहा जा रहा है कि अगर इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच होती है, तो कई ‘करीबी बाबुओं’ के चेहरे बेनकाब हो सकते हैं। वे बाबू, जो इस सिंडिकेट की रीढ़ थे, और जिन्होंने शायद इस ‘जश्न’ को अंजाम दिया।

सवाल वही: सिर्फ निलंबन या सलाखों की सजा?

अब जब शालिनी श्रीवास्तव निलंबित हो चुकी हैं, तो ये सारे किस्से-कहानियां एक नई रोशनी में देखी जा रही हैं। क्या यह सिर्फ अफवाहें हैं, या फिर इस भ्रष्टाचार के अंधेरे में छिपे और भी कई राज हैं? देवरिया की जनता अब सिर्फ निलंबन से संतुष्ट नहीं होने वाली। उसे देखना है कि क्या इस ‘शाही ठाठ-बाट’ का हिसाब देने की घड़ी भी आएगी? क्या उन ‘महंगे तोहफों’ और ‘दफ्तर की दावतों’ के पीछे का पैसा वाकई शिक्षकों की जेब से निकला था?

एक बात तो तय है – यह सिर्फ एक निलंबन का मामला नहीं रह गया है। यह उस तंत्र के खिलाफ जंग है, जिसने एक शिक्षक को मौत के घाट उतार दिया। और अगर इस तंत्र की जड़ें नहीं खोदी गईं, तो शायद अगली ‘सालगिरह’ किसी और दफ्तर में मनाई जाएगी, किसी और शिक्षक की गाढ़ी कमाई पर।

Editor CP pandey

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