अपना हाथ देखूँ, हाथ अपना है,
पर स्वयं तो हाथ नहीं हूँ मैं,
ऐसे ही अपना पैर देखूँ,
पर पैर भी स्वयं नहीं हूँ मैं,
अपना सिर भी देखूँ,
पर सिर भी स्वयं नहीं हूँ मैं,
अपना तन भी देखूँ,
तो तन भी स्वयं नहीं हूँ मैं।
अपना मन देखूँ,
पर मन भी खुद नहीं हूँ मैं,
अपनी बुद्धि तो है,
पर खुद बुद्धि भी नहीं हूँ मैं,
तो फिर मैं क्या हूँ,
खुद कौन हूँ मैं ?
शायद शुद्ध चेतना तत्व हूँ क्या,
क्योंकि यही चेतना तत्व नित्य है।
चेतना तत्व की मृत्यु नहीं होती,
मृत्यु तन की होती है,
और मैं तन नहीं हूँ,
तो खुद की कभी मृत्यु नहीं होती,
जीवन तन का हुआ, मेरा नहीं,
पुरुषार्थ भी शरीर का हुआ मेरा नहीं,
दुखी सुखी, विकल अविकल होना,
मन का धर्म है मेरा नहीं।
निर्णय करना बुद्धि का धर्म है,
मेरा आपका नहीं,
हम आप तो इन सब के ज्ञाता, दृष्टा हैं,
जन्म, मृत्यु तन के होते हैं
मेरे या आपके नहीं,
हम या आप अमर हैं,
ब्रह्म स्वरूप हैं,
ब्रह्म सभी में है,
इसके अलावा कोई दूसरा तत्व नहीं।
यही अद्वैत भाव है कि हम आप
अपने स्वरूप में स्थित हों प्रकृति में नहीं,
सभी विकार प्रकृति में हैं,
हम में या आप में नहीं,
हम, आप निराकार, प्रकृति से परे हैं,
दुख, सुख, काम, मद, लोभ आदि
सभी विकार प्रकृति में हैं,
हम या आप शुद्ध चेतन में नहीं।
हम या आप कौन हैं ये जान लें,
जन्म मृत्यु को भूल कर अमर हो जायँ,
क्योंकि जन्म मृत्यु तन के धर्म है,
आदित्य हम या आप, शुद्ध चेतन के नहीं।
डॉ. कर्नल
आदिशंकर मिश्र, ‘आदित्य’
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