गांव का विकास या चौमुखी विनाश (पोस्टर वार)

भागलपुर/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। गांव का विकास आज सिर्फ भाषणों, नारों और बैनरों में सिमट कर रह गया है। जिन गलियों में कभी मिल-जुलकर बैठकर लोग पंचायत की समस्याओं का हल निकालते थे, वहां आज कटाक्ष से भरे पोस्टर लटक रहे हैं। कहीं लिखा है।
“गांव के चौमुखी विनाश के लिए मुझे चुनिए”, तो कहीं तंज कसा गया है।
“काम दिखाओ वोट पाओ।” कुछ लोग तो साफ़ लिख देते हैं।
“इस एरिया में वोट मांगने मत आना।” यह केवल नाराज़गी नहीं है, बल्कि जनता के भीतर उमड़ता आक्रोश है, जो अब सड़क और चौराहों से होते हुए बैनर-पोस्टरों तक पहुंच चुका है।
*जनता की बढ़ती नाराज़गी
गांव की जनता अब समझ चुकी है कि चुनाव केवल एक स्वार्थ की दुकान बन चुका है। चुनाव जीतने के बाद नेता जनता से कट जाते हैं और पांच साल तक सिर्फ अपनी गद्दी बचाने की जुगत में रहते हैं। यही कारण है कि लोग खुलेआम पोस्टर पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष लिखवाकर अपनी बात कह रहे हैं। यह कटाक्ष सीधे-सीधे नेताओं की विफलता का आईना है।
*करोड़ों की योजनाएं, मगर विकास ग़ायब
सरकार करोड़ों रुपए गांव के विकास के नाम पर भेजती है। कागजों पर सड़कें बनती हैं, पुल खड़े होते हैं, स्कूलों का कायाकल्प होता है और स्वास्थ्य केंद्र आधुनिक दिखते हैं। मगर ज़मीनी हकीकत यही है कि सड़क पर चलने से पहले आदमी गड्ढे गिन लेता है, स्कूलों में मास्टर से ज्यादा ताले मिलते हैं और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर से ज्यादा मक्खियां गूंजती हैं। यह सब जनता देख रही है। सवाल यह है कि आखिर यह पैसा कहां जा रहा है?
*जातिवाद और गुटबाज़ी की राजनीति
गांवों में विकास से ज्यादा चर्चा अब जातिवाद की होती है। प्रत्याशी गांव को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करते हैं। “तुम्हारा वोट मेरी जाति को, तुम्हारा वोट मेरे गुट को” की राजनीति ने गांव की सामाजिक एकता को खोखला कर दिया है। जो गांव कभी एक परिवार की तरह खड़ा रहता था, वहां अब जातीय टुकड़ों में बंटकर लोग एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।
*पोस्टरों में छुपी सच्चाई_
यह पोस्टर वार केवल हंसी-मजाक नहीं है, यह गांव के आम लोगों की गहरी पीड़ा है। जब कोई लिखता है—“गांव के चौमुखी विनाश के लिए मुझे चुने”, तो यह केवल कटाक्ष नहीं, बल्कि उन नेताओं पर करारा तमाचा है जो जनता के पैसे से अपनी तिजोरी भरते हैं। “काम दिखाओ वोट पाओ” केवल नारा नहीं, यह जनता की सख्त चेतावनी है कि अब खाली वादों पर वोट नहीं मिलेंगे।
योग्य और कर्मठ प्रत्याशी की तलाश
गांव की जनता अब किसी ऐसे नेता की तलाश में है, जो केवल भाषण न दे, बल्कि सच्चे मायनों में गांव का कायाकल्प करे। लेकिन अफसोस यह है कि हर चुनाव में वही चेहरे सामने आ जाते हैं—जो भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं, जो जातिवाद को हवा देते हैं और जो जनता की मेहनत की कमाई को अपनी ऐशो-आराम की जिंदगी पर खर्च करते हैं। यही कारण है कि लोग आज पोस्टर पर लिख देते हैं।
“योग्य कर्म 3 भ्रष्ट प्रधान पद प्रत्याशी में से चुनिए।” यह लाइन अपने आप में नेताओं पर गहरा व्यंग्य है।
*गांव का विकास बनाम राजनीति का विनाश_
गांव की गलियां आज भी अंधेरे में डूबी हैं, हैंडपंपों का पानी खारा है, किसान खाद-बीज के लिए तरस रहे हैं, नौजवान रोज़गार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। मगर चुनाव आते ही प्रत्याशी हेलीकॉप्टर से उतरते हैं, लंबी-चौड़ी गाड़ियां निकालते हैं और लोगों को सपनों की दुनिया दिखाने लगते हैं। जनता यह सब देख-समझ रही है, तभी तो अब गुस्सा पोस्टर बनकर दीवारों पर उतर आया है।
*जनता की त्रासदी_
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जनता त्रस्त होकर भी मजबूर है। चुनाव में खड़ा हर प्रत्याशी किसी न किसी गुट से जुड़ा होता है, और अंततः वही चुना जाता है जो सबसे ज्यादा वोटों को जातीय आधार पर बांट सके। ऐसे में जनता का विश्वास लगातार टूट रहा है। यही टूटा हुआ विश्वास बैनरों पर व्यंग्य बनकर सामने आ रहा है।
*क्या यही है लोकतंत्र का भविष्य?
*लोकतंत्र की असली ताकत जनता है, लेकिन जब जनता का विश्वास ही टूट जाए, तो लोकतंत्र खोखला हो जाता है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में गांवों का विकास नहीं बल्कि चौमुखी विनाश ही होगा।
*बदलाव की ज़रूरत_
गांव की जनता अब जाग चुकी है। पोस्टर केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि चेतावनी हैं। अगर नेताओं ने अब भी सबक नहीं लिया, तो आने वाले चुनाव में उन्हें अपने ही गांव की गलियों में जगह नहीं मिलेगी। जनता अब ऐसे समाज सेवक की तलाश में है, जो जात-पात से ऊपर उठकर गांव को जोड़ने का काम करे, जो सरकारी योजनाओं का पैसा सही जगह खर्च करे और जो केवल चुनाव के वक्त नहीं, बल्कि हर वक्त जनता के बीच खड़ा रहे।

Karan Pandey

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