UP Division Demand: उत्तर प्रदेश को अलग राज्यों में बांटने की मांग तेज, जानिए किससे लेनी होती है परमिशन

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश—देश का सबसे बड़ा राज्य, सबसे ज्यादा आबादी और सबसे अधिक सांसदों वाला प्रदेश—एक बार फिर बंटवारे की मांग को लेकर चर्चा में है। लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि क्या इतना बड़ा राज्य एक साथ प्रभावी तरीके से संचालित हो पा रहा है? पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाद अब पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने की मांग भी तेज हो गई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वाकई यूपी का बंटवारा संभव है और इसके लिए अनुमति किससे लेनी होती है?

यूपी बंटवारे की मांग फिर क्यों उठी?

उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांग कोई नई नहीं है। समय-समय पर अलग-अलग क्षेत्रों से यह आवाज उठती रही है। हाल के महीनों में पश्चिमी यूपी में छोटे राज्य की जरूरत को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हुईं। अब अमेठी से पूर्वांचल राज्य की मांग खुलकर सामने आई है।

एक कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह और पूर्व प्राविधिक शिक्षा मंत्री डॉ. अमीता सिंह ने कहा कि पूर्वांचल का विकास तभी संभव है, जब उसे अलग राज्य का दर्जा मिले। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि यह मुद्दा सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि जनभावनाओं से भी जुड़ा है।

पूर्वांचल अलग राज्य की दलील क्या है?

पूर्वांचल को लेकर यह तर्क दिया जाता है कि यहां विकास की रफ्तार पश्चिमी और मध्य यूपी की तुलना में काफी धीमी रही है।

• शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं कमजोर
• औद्योगिक निवेश की कमी
• रोजगार के सीमित अवसर

समर्थकों का कहना है कि अगर पूर्वांचल अलग राज्य बने, तो प्रशासनिक फोकस बढ़ेगा, योजनाएं तेजी से लागू होंगी और स्थानीय समस्याओं का समाधान बेहतर तरीके से हो सकेगा।

क्या राज्य को बांटना आसान है?

किसी भी राज्य को बांटना आसान प्रक्रिया नहीं होती। यह एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें कई स्तरों पर सहमति और औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं। भारत के संविधान में इसके लिए स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं।

संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को यह अधिकार देता है कि वह कानून बनाकर:

• किसी राज्य का क्षेत्र घटा या बढ़ा सके
• दो या दो से अधिक राज्यों को मिला सके
• या नया राज्य बना सके

यानी राज्य विभाजन का अंतिम फैसला संसद के पास होता है।

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राज्य विधानसभा की भूमिका क्या है?

जब राज्य बंटवारे का प्रस्ताव आता है, तो राष्ट्रपति उस प्रस्ताव को संबंधित राज्य की विधानसभा के पास राय के लिए भेजते हैं। विधानसभा इस पर चर्चा कर अपनी राय देती है।
हालांकि विधानसभा की राय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होती, लेकिन राजनीतिक और व्यावहारिक रूप से इसे काफी महत्व दिया जाता है।

जनता से परामर्श क्यों जरूरी है?

राज्य के बंटवारे का सीधा असर वहां रहने वाले लोगों पर पड़ता है। इसलिए इस प्रक्रिया में जनता, सामाजिक संगठनों और अन्य हितधारकों से विचार-विमर्श किया जाता है, ताकि यह साफ हो सके कि मांग सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि वास्तविक जरूरत और जनसमर्थन पर आधारित है।

संसद में कैसे पास होता है राज्य गठन का कानून?

राज्य बंटवारे से जुड़ा विधेयक संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में पेश किया जाता है। इसे पारित करने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत होती है।
यह संविधान संशोधन जैसा जटिल मामला नहीं होता, जिससे राज्य गठन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान हो जाती है।

राष्ट्रपति की मंजूरी क्यों अहम है?

संसद से कानून पास होने के बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति की सहमति मिलते ही अधिसूचना जारी होती है और नया राज्य कानूनी रूप से अस्तित्व में आ जाता है। इसके बाद प्रशासनिक ढांचा, सरकार और अन्य व्यवस्थाएं लागू की जाती हैं।

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पहले भी बन चुके हैं नए राज्य

भारत में पहले भी राज्यों का पुनर्गठन हुआ है:

• 2000: उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड, मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़, बिहार से झारखंड

• 2014: आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना का गठन

इन उदाहरणों से साफ है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो, तो नया राज्य बनना संभव है।

Karan Pandey

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