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निर्विरोध चुनाव, NOTA और संविधान: क्या यह जन-सहमति का हनन है?

भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, क्योंकि यहाँ प्रत्येक नागरिक को राजनीतिक भागीदारी का अधिकार प्राप्त है। चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता की सहमति और असहमति की सामूहिक अभिव्यक्ति हैं। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब किसी निर्वाचन क्षेत्र में केवल एक उम्मीदवार बचता है और उसे निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है, तब मतदाता की भूमिका कहाँ रह जाती है?

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 53(2) के अनुसार, यदि जितनी सीटें हैं उतने ही उम्मीदवार शेष रह जाएँ, तो बिना मतदान के उन्हें निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। यह व्यवस्था प्रशासनिक सुविधा के लिए बनाई गई थी, किंतु आज के लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में यह प्रावधान मतदाता की इच्छा को अदृश्य बना देता है।

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने PUCL बनाम भारत संघ मामले में NOTA को मान्यता दी। इसका उद्देश्य मतदाता को यह अधिकार देना था कि वह चुनाव प्रक्रिया में भाग ले, लेकिन किसी भी उम्मीदवार को स्वीकार न करे। NOTA नकारात्मक सहमति का प्रतीक है—यह कहने का अधिकार कि “मैं लोकतंत्र में विश्वास करता हूँ, लेकिन प्रस्तुत विकल्पों में नहीं।”

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जब चुनाव ही नहीं होता, तो NOTA का अस्तित्व अर्थहीन हो जाता है। एकल उम्मीदवार की स्थिति में मतदाता न समर्थन कर सकता है, न विरोध। यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत—चयन (Choice)—को निष्प्रभावी कर देता है। यदि मतदाताओं का बड़ा वर्ग किसी उम्मीदवार को अनुपयुक्त मानता है, फिर भी कानून उसे प्रतिनिधि बना देता है, तो यह लोकतंत्र नहीं बल्कि वैधानिक एकाधिकार है।

इस संवैधानिक प्रश्न को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई है, जहाँ न्यायालय ने इसे गंभीर मुद्दा मानते हुए सरकार से विचार की अपेक्षा की है। चुनाव आयोग भले ही निर्विरोध चुनावों को दुर्लभ बताए, परंतु लोकतंत्र में सिद्धांतों का मूल्य आँकड़ों से अधिक होता है।

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आज आवश्यकता है कि धारा 53(2) पर पुनर्विचार हो, नामांकन वापसी पर नियंत्रण लगे और NOTA को वास्तविक प्रभाव मिले। क्योंकि लोकतंत्र केवल जीत नहीं, बल्कि जन-स्वीकृति का उत्सव है।

Karan Pandey

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