चंदौली में पहली बार बीएचयू के दो धुरंधर आमने-सामने

यहीं से सीखे राजनीति का ककहरा

चंदौली/यूपी(राष्ट्र की परम्परा)
वाराणसी के डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय 1977 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जिला संयोजक बनाए गए और 1978 में बीएचयू छात्र संघ के महामंत्री बने। उन्होंने बीएचयू से हिंदी में पीएचडी के साथ-साथ पत्रकारिता में पोस्टग्रेजुएशन किया है। वहीं, वीरेंद्र सिंह 1990 में पहली बार चिरईगांव विधानसभा से चुनाव लड़े और हार गए। दूसरी बार, वहीं से चुनाव लड़े और विधायक बने।
भाजपा की ओर से डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद यह पहली बार होगा, जब चंदौली सीट पर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के दो मानस पुत्र आमने-सामने होंगे। समाजवादी पार्टी ने चंदौली लोकसभा सीट पर पहले से ही वीरेंद्र सिंह को प्रत्याशी बनाया है।
वीरेंद्र सिंह और डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय दोनों ने ही बीएचयू से शिक्षा ग्रहण की है। सही मायने में कहा जाए तो दोनों धुरंधर नेताओं ने बीएचयू से ही राजनीति का ककहरा सीखा है।

बीएचयू छात्रसंघ के रहे महामंत्री

डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय बीएचयू छात्रसंघ के महामंत्री भी रह चुके हैं।
केंद्रीय मंत्री डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय ने 1977 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जिला संयोजक बनाए गए और 1978 में, बीएचयू छात्र संघ के महामंत्री बने। उन्होंने बीएचयू से हिंदी में पीएचडी के साथ-साथ पत्रकारिता में पोस्टग्रेजुएशन किया है। इस दौरान वे कई छात्र आंदोलनों में सक्रिय रहे। बीएचयू में पढ़ने के दौरान ही उनका संपर्क भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं से हुआ। जिसके बाद वे राजनीति की मुख्य धारा में आए।

सांख्यिकी से परास्नातक

वहीं चिरईगांव निवासी वीरेंद्र सिंह ने सांख्यिकी से परास्नातक की पढ़ाई के लिए बीएचयू में दाखिला लिया। पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में काफी सक्रिय रहे। यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई। हालांकि बीएचयू से उन्हें काफी कुछ सीखने को मिला। चंदौली लोकसभा सीट पर सातवें चरण में एक जून को वोट पड़ेंगे।

वीरेंद्र से एक दशक पहले से राजनीति में सक्रिय हैं पांडेय

डॉ. पांडेय ने पहली बार 1980 में भाजपा के टिकट पर गाजीपुर जिले की सैदपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, मगर हार गए। 1991 में पहली बार सैदपुर सीट से विधायक चुने गए। 1996 में दोबारा विधायक बनने के बाद कल्याण सिंह की सरकार में पंचायती राज और नियोजन मंत्री बनाए गए।
वहीं, वीरेंद्र सिंह 1990 में पहली बार चिरईगांव विधानसभा से चुनाव लड़े और हार गए। दूसरी बार, वहीं से चुनाव लड़े और विधायक बने। 2003 में लोकतांत्रिक पार्टी से चिरईगांव से ही विधायक बने और वन मंत्री भी बने।

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