स्वाभिमान की तलवार से इतिहास रचने वाले योद्धा: महाराज छत्रसाल

बलिदान दिवस 20 दिसंबर पर विशेष
नवनीत मिश्र

भारत की धरती पर जब-जब अन्याय, दमन और पराधीनता का अंधकार छाया, तब-तब किसी न किसी वीर ने स्वाभिमान की मशाल जलाकर इतिहास की दिशा बदली। बुंदेलखंड की वीरभूमि से जन्मे महाराज छत्रसाल ऐसे ही योद्धा थे, जिन्होंने सीमित साधनों के बावजूद असीम साहस, अदम्य इच्छाशक्ति और अपराजेय आत्मबल के सहारे मुग़ल साम्राज्य को खुली चुनौती दी। वे केवल तलवार चलाने वाले सेनानायक नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और स्वराज के जीवंत प्रतीक थे।
महाराज छत्रसाल का जन्म 4 मई 1649 को बुंदेला वंश में हुआ। उनके पिता चंपतराय बुंदेला मुग़ल सत्ता के अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। पिता का बलिदान बालक छत्रसाल के जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बना। उसी क्षण उन्होंने मन ही मन यह संकल्प लिया कि वे अपने बुंदेलखंड को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराए बिना चैन से नहीं बैठेंगे।
युवावस्था में प्रवेश करते ही महाराज छत्रसाल ने शस्त्र विद्या, युद्धकौशल और रणनीति में अद्भुत दक्षता प्राप्त की। उस समय औरंगज़ेब की विशाल और क्रूर मुग़ल सेना का आतंक पूरे उत्तर भारत में फैला हुआ था, किंतु छत्रसाल ने भय को कभी अपने समीप नहीं आने दिया। उन्होंने जंगलों, पहाड़ियों और दुर्गम क्षेत्रों को अपना रणक्षेत्र बनाया और गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाकर मुग़ल सेनाओं को बार-बार पराजित किया। उनकी तेज़ी, चतुराई और साहस के सामने शत्रु की संख्या और संसाधन व्यर्थ सिद्ध हुए।
महाराज छत्रसाल का संघर्ष केवल सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं था, बल्कि वह आत्मसम्मान और स्वशासन के लिए था। उन्होंने बुंदेलखंड के बड़े भूभाग को मुग़ल आधिपत्य से मुक्त कर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। उनके शासन में प्रजा सुरक्षित थी, किसानों और साधुओं को संरक्षण प्राप्त था और स्थानीय संस्कृति व परंपराओं का सम्मान किया जाता था। वे जानते थे कि सच्चा राजा वही है, जो अपनी जनता के दुख-सुख का सहभागी बने।
जीवन के उत्तरार्ध में महाराज छत्रसाल ने मराठा वीर पेशवा बाजीराव प्रथम से मित्रता की। यह मित्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि समान विचारों और स्वतंत्रता-चेतना पर आधारित थी। बाजीराव की सहायता से उन्होंने बुंदेलखंड की रक्षा और सुदृढ़ की तथा कृतज्ञता स्वरूप अपने राज्य का एक बड़ा भाग मराठों को सौंप दिया। यह निर्णय उनके उदार और दूरदर्शी व्यक्तित्व को दर्शाता है।
20 दिसंबर 1731 को यह महान योद्धा देह त्याग कर अमरत्व को प्राप्त हुआ, किंतु उनका जीवन संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक हैl यदि संकल्प अडिग हो, तो सबसे बड़ा साम्राज्य भी झुक सकता है। महाराज छत्रसाल ने सिद्ध किया कि स्वाभिमान की तलवार से इतिहास रचा जा सकता है। उनकी प्रेरक गाथा हर उस व्यक्ति को शक्ति देती है, जो अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का साहस रखता है।

rkpNavneet Mishra

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