सच्चाई कड़वी होती है,
सोच समझ कर लिखना होगा।
बुरा न माने लोग कहीं,
कदम फूंक कर रखना होगा।
श्रीराम सरीखी मर्यादा में,
रहकर भी, निंदा तो सहना होगा।
राहें पथरीली हैं जग में,
देख देख कर चलना होगा।
सोसल फ़ोरम में रहकर,
वाइरल रोग से बचना होगा।
सच्ची सीधी बात करोगे,
तो बुरी नज़र से बचना होगा।
एक ज़माना वह होता था,
विश्वास सभी पर करते थे।
दरवाज़े बंद नहीं होते थे,
घर खुले खुले ही बनते थे।
अविश्वास जो फैला है जग में,
दरवाज़े और, दरवाज़ों पे लगे ताले।
अविश्वास जगत में और बढ़ा,
ऊपर से सीसीटीवी लगे निराले।
वैसे तो मुश्किल जीवन में,
आती रहतीं है कदम दर कदम।
सच्चे पथ पर चलना शायद,
मुश्किल होता है हर दिन हर दम।
मुश्किल जिस दिन ना आये तो,
समझो उस दिन कुछ ग़लत हुआ।
है यही रीति भाई जग की,
जो जान गया, वह समझ सका।
जीवन की पसंद और प्रेम में,
मर्म भरा भावुक अन्तर जो होता है।
सुंदर फूलों की ‘पसंद’ और,
फूलों से ‘प्रेम’ विलग भाव होता है।
फूलों की ‘पसंद’ जिसे होती,
फूलों को तोड़ महक से मोहित है।
पर जिसे ‘प्रेम’ हो फूलों से,
पौधे को पानी देना उसकी चाहत है।
पसंद और प्रेम हम सबके,
जीवन में फूलों सा अंतर रखते हैं।
उपभोग पसंद का द्योतक है,
प्रेम जगत में सभी हृदय से करते हैं।
ऐसे ही हम सब रहें प्रेम से,
अपनी पसन्द की चिंता छोड़ें।
दूरी बेशक़ बढ़े फ़ासलों से,
पर सोच समझ सुन्दर रक्खें।
पात्र सुपात्र सब साथ रहें,
मिल जुल कर वाणी पर संयम हो।
आदित्य हृदय से शुभ सोचें,
कामना दुआ दया की हर मन में हो।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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