भारतीय संस्कृति की आत्मा: गायत्री मंत्र में निहित चेतना, विवेक और नैतिक शक्ति

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय संस्कृति केवल रीति-रिवाजों, पर्व-त्योहारों और अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चेतना, विवेक, करुणा और नैतिक मूल्यों की एक जीवंत परंपरा है। यदि इस सांस्कृतिक चेतना की आत्मा किसी एक सूत्र में निहित दिखाई देती है, तो वह है गायत्री मंत्र। वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक गायत्री मंत्र भारतीय जीवन-दर्शन का मूल आधार रहा है, जिसने व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की सोच को दिशा दी है।

बुद्धि के शोधन का संदेश

गायत्री मंत्र का मूल भाव है—बुद्धि का शोधन और सद्बुद्धि का विकास। मंत्र की पंक्ति “धियो यो नः प्रचोदयात्” यह स्मरण कराती है कि शक्ति, संपत्ति और सत्ता से भी बड़ा मूल्य विवेक है। भारतीय संस्कृति ने सदैव बाहरी वैभव की तुलना में आंतरिक पवित्रता, संयम और आत्मिक शुद्धता को सर्वोपरि माना है, और यही भावना गायत्री मंत्र में पूर्ण रूप से प्रतिबिंबित होती है।

संस्कार से समाज तक प्रभाव

भारतीय समाज की जीवन-पद्धति—संस्कार, अनुशासन, करुणा, सहअस्तित्व और सेवा—गायत्री चेतना से ही पुष्ट हुई है। बालक के उपनयन संस्कार से लेकर जीवन के अंतिम चरण में आत्मचिंतन तक, गायत्री मंत्र हर अवस्था में मार्गदर्शक की भूमिका निभाता रहा है। यह मंत्र व्यक्ति को केवल निजी हित तक सीमित नहीं रखता, बल्कि समष्टि के कल्याण के लिए सोचने और कार्य करने की प्रेरणा देता है।

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आधुनिक दौर में प्रासंगिकता

वर्तमान समय में जब वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और भौतिकता के प्रभाव से भारतीय संस्कृति अपनी जड़ों से कटती प्रतीत हो रही है, तब गायत्री मंत्र का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। यह मंत्र आधुनिक जीवन की भागदौड़ में मानसिक शांति, आत्म-संतुलन और नैतिक दृढ़ता प्रदान कर सकता है। विज्ञान और आध्यात्म के बीच सेतु बनकर गायत्री मंत्र मानव जीवन को समग्रता और संतुलन की ओर ले जाता है।

गायत्री मंत्र केवल एक वैदिक मंत्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यह मनुष्य को स्वार्थ से सेवा, अज्ञान से ज्ञान और विभाजन से समरसता की ओर अग्रसर करता है। यदि भारतीय समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान, नैतिक शक्ति और आध्यात्मिक चेतना को बनाए रखना है, तो गायत्री मंत्र की भावना को केवल जप तक सीमित न रखकर उसे जीवन में उतारना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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Karan Pandey

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