जब 29 दिसंबर ने छीन लिए युगपुरुष: इतिहास के अमर हस्ताक्षर जिनकी स्मृति आज भी जीवित है
भारतीय इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होतीं, वे स्मृतियों, योगदानों और विरासतों की वाहक बन जाती हैं। 29 दिसंबर भी ऐसी ही एक भावनात्मक तिथि है, जब देश ने आध्यात्म, कला, विज्ञान, संगीत और चिकित्सा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान देने वाली महान विभूतियों को खोया। ये सभी व्यक्तित्व आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका कार्य, विचार और समाज के प्रति समर्पण आज भी पथप्रदर्शक है। आइए 29 दिसंबर को हुए इन महत्वपूर्ण निधन पर विस्तार से दृष्टि डालते हैं।
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स्वामी विश्वेशतीर्थ (निधन: 29 दिसंबर 2019)
स्वामी विश्वेशतीर्थ जी एक प्रतिष्ठित हिंदू संत और पेजावर मठ (उडुपी परंपरा) के प्रमुख थे। उनका जन्म कर्नाटक राज्य के दक्षिण कन्नड़ क्षेत्र में हुआ माना जाता है। उन्होंने धार्मिक शिक्षा, वैदिक परंपरा और सामाजिक समरसता को जीवन का लक्ष्य बनाया।
स्वामी जी न केवल आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि वे शिक्षा, राष्ट्रवाद और सामाजिक सेवा के प्रबल समर्थक भी रहे। राम जन्मभूमि आंदोलन से लेकर हिंदू समाज को संगठित करने तक, उनका योगदान राष्ट्रीय स्तर पर स्मरणीय है। सरल जीवन, ओजस्वी वाणी और निर्भीक विचारों के कारण वे लाखों श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा बने। उनका जीवन त्याग, तप और धर्मनिष्ठा का प्रतीक रहा।
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मंजीत बावा (निधन: 29 दिसंबर 2008)
मंजीत बावा आधुनिक भारतीय कला जगत के अत्यंत चर्चित और मौलिक चित्रकार थे। उनका जन्म धुरी, जिला संगरूर, पंजाब, भारत में हुआ था। उन्होंने भारतीय पौराणिक कथाओं, पशु-पक्षियों और प्रकृति को अपनी विशिष्ट शैली में चित्रित किया।
उनकी कला में रंगों की सादगी और विषयों की गहराई एक अनूठा संतुलन प्रस्तुत करती है। मंजीत बावा ने भारतीय कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। भारतीय चित्रकला को नई संवेदना और दृष्टि देने वाले इस कलाकार का निधन कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति रहा।
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शिवराज रामशरण (निधन: 29 दिसंबर 2003)
शिवराज रामशरण एक समर्पित भारतीय वैज्ञानिक थे, जिन्होंने विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनका जन्म भारत में हुआ और उन्होंने देश की वैज्ञानिक प्रगति के लिए विभिन्न अनुसंधान परियोजनाओं में कार्य किया।
वे विज्ञान को समाजोपयोगी बनाने के पक्षधर थे और नई पीढ़ी को वैज्ञानिक सोच से जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध रहे। अनुसंधान, शिक्षा और बौद्धिक विकास में उनका योगदान भले ही आम जन में कम चर्चित हो, लेकिन भारतीय विज्ञान जगत में उनका स्थान सम्मानजनक रहा। उनका जीवन अनुशासन, अध्ययन और राष्ट्रहित के लिए समर्पण का उदाहरण था।
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पंडित ओंकारनाथ ठाकुर (निधन: 29 दिसंबर 1967)
पंडित ओंकारनाथ ठाकुर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान गायक, शिक्षाशास्त्री और सांस्कृतिक चिंतक थे। उनका जन्म झज्जर, हरियाणा, भारत में हुआ था। वे ग्वालियर घराने की परंपरा से जुड़े और अपनी सशक्त गायकी के लिए प्रसिद्ध हुए।
उन्होंने संगीत को केवल मंच तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। “वंदे मातरम्” की उनकी प्रस्तुति आज भी ऐतिहासिक मानी जाती है। संगीत शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान अतुलनीय रहा। उनका जीवन भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता और संगीत साधना का उज्ज्वल प्रतीक था।
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हकीम अजमल ख़ाँ (निधन: 29 दिसंबर 1927)
हकीम अजमल ख़ाँ यूनानी चिकित्सा पद्धति के विश्वविख्यात चिकित्सक और राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक थे। उनका जन्म दिल्ली, भारत में हुआ था। उन्होंने यूनानी चिकित्सा को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया और उसे आधुनिक युग से जोड़ा।
वे केवल चिकित्सक ही नहीं, बल्कि शिक्षाविद, स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थक और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक थे। समाज सेवा, शिक्षा और राष्ट्रीय एकता के लिए उनका योगदान अद्वितीय रहा। भारतीय चिकित्सा इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
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