मानवता के आईने में सामाजिक सरोकार की असली तस्वीर

कैलाश सिंह

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)।आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, तकनीक हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी है और सुविधाएँ कदम-दर-कदम बढ़ती जा रही हैं, ऐसे दौर में सबसे बड़ा सवाल उठता है—क्या इन सबके बीच सामाजिक सरोकार भी उतनी ही गति से आगे बढ़ रहा है? या फिर विकास की चमक के पीछे सामाजिक संवेदनाएं धुंधली पड़ती जा रही हैं? मानवता के आईने में यदि समाज को देखें तो कई परतें सामने आती हैं—कहीं उजले चेहरे हैं, तो कहीं गहरे धब्बे भी।
सबसे पहले समझना जरूरी है कि सामाजिक सरोकार किसी एक वर्ग, संस्था या व्यक्ति का कार्य नहीं, बल्कि यह समाज की सामूहिक चेतना है। यह वह जिम्मेदारी है जो हमें दूसरों के दर्द को महसूस करने की शक्ति देती है। यही सरोकार समाज को सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि समुदाय बनाता है। लेकिन दुखद यह कि आज इस चेतना में निरंतर गिरावट महसूस की जा रही है। भीड़ बढ़ रही है, पर सामूहिकता सिकुड़ती जा रही है।आज चारों तरफ बदलाव की तेज आँधी है—रोजगार की दौड़, संसाधनों की स्पर्धा, निजी स्वार्थों की मानसिकता, और सोशल मीडिया की कृत्रिम दुनिया ने संवेदनाओं को कहीं-न-कहीं कमजोर किया है। सड़क हादसे पर लोग वीडियो बनाने में अधिक व्यस्त दिख जाते हैं, बजाय मदद करने के। पड़ोसी की पीड़ा अब खबर बनती है, सरोकार नहीं। पंचायत से लेकर शहर तक, सामाजिक जुड़ाव की कड़ी धीरे-धीरे कमजोर दिखाई देती है।
लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है। आईने का दूसरा हिस्सा भी है—जहाँ सामूहिकता आज भी जीवित है, चाहे कम ही सही। अनेक स्थानों पर लोग बेघर बच्चों को खाना बांटते हैं, अस्पतालों में मरीजों की मदद के लिए स्वयंसेवी संगठन जुटते हैं, युवाओं की टीमें रक्तदान शिविर लगाती हैं, और आपदा के समय असंख्य हाथ उठते हैं। ये वही रोशनियां हैं जो बताती हैं कि सामाजिक सरोकार अभी समाप्त नहीं हुआ है, बस उसे जगाने की जरूरत है।
मानवता का आईना तभी चमकेगा जब समाज अपनी जिम्मेदारी को समझेगा। परिवार, स्कूल, समाज और शासन—चारों स्तंभों को मिलकर इस संवेदनशीलता को फिर से मजबूत बनाना होगा। बच्चों में करुणा और सहानुभूति के संस्कार डालना, युवाओं में सामाजिक जिम्मेदारी बढ़ाना, और बुजुर्गों के अनुभवों को सम्मानित करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। समाज तभी जीवंत होता है जब उसकी संवेदना जागृत रहती है।
आज आवश्यकता है कि हम विकास की रफ्तार में सामाजिक सरोकार को पीछे न छोड़ें। एक दूसरे के लिए खड़ा होना, किसी अनजान के आँसू पोंछना, सुरक्षित समाज के लिए आवाज़ उठाना—ये छोटे-छोटे कदम ही समाज की बड़ी पहचान बनाते हैं। मानवता का आईना हमें यही सिखाता है कि सरोकार के बिना समाज अधूरा है और संवेदना के बिना इंसान।
अंत में सवाल सिर्फ इतना है—क्या हम इस आईने में खुद को पहचानने की हिम्मत रखते हैं? अगर हाँ, तो सामाजिक सरोकार की असली तस्वीर बदलने में देर नहीं लगेगी।

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