बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। व्यक्ति को अपने कमाए गए धन को पांच भागों में विभक्त करना चाहिए , एक भाग धर्म हेतु दूसरा यश हेतु तीसरा व्यापार हेतु चौथा आपने शरीर हेतु तथा पांचवा भाग स्वजनों हेतु *धर्माय यशसे अर्थाय कामाय स्वजनाय च।पंचधा विभजन्वित्तमिहामुत्र च मोदते।जो व्यक्ति अपने परिश्रम से प्राप्त धन को उपरोक्त विधि से व्यय करता है, वह इहलोक तथा परलोक दोनो स्थानों पर सुखी रहता है। यह उद्गार प.प्रमोद शास्त्री के हैं जिसे पूर गांव में चल रही भागवत कथा के चौथे दिन उन्होंने व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं उत्तम, मध्यम तथा अधम ;जो मात्र अपने लिए जीता है वह अधम है, जो भाई बान्धवों सहित पूरे परिवार के लिए जीता है वह मध्यम तथा जो समाज के लिए अर्थात परोपकार के लिए (धर्म के लिए)जीता है वह उत्तम माना जाता है ।उत्तम प्रकृति के महामानव के पास महालक्ष्मी स्वयं आती हैं तथा श्रीहरि नारायण स्वयं सदैव उसकी रक्षा करते हैं।
बलि वामन की कथा को उद्घृत करते हुए उन्होंने समझाया कि बलि ने वामन को अपना सर्वस्व दान कर दिया। फलस्वरूप सुतल लोक में भगवान उसके द्वारपाल बन गए और अपने पति को बलि की पहरेदारी से मुक्त करवाने के लिए स्वयं महालक्ष्मी ने बलि को अपना भाई बनाया तथा राखी बंधाई का उपहार अपने पति की पहरेदारी से मुक्ति मांगी। बलि ने वह भी दे दिया जिसका परिणाम यह है कि अब भी भगवान चातुर्मास मे सुतललोक की रक्षा हेतु वहां जाते हैं और चार महीने वहीं रहते हैं। तात्पर्य यह है कि जब भी सुअवसर मिले तो अपने सामर्थ्यानुसार दान करना चाहिए इससे भगवान प्रसन्न होते हैं तथा हमें सुख मिलता है।ू
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