नई दिल्ली(राष्ट्र की परम्परा)
ज्यूडिशियल काउंसिल ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को औपचारिक पत्र लिखकर मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष क्षेत्रों में फंसे नागरिकों को बचाने हेतु सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय निगरानी में मानवीय निकासी गलियारे (ह्यूमैनिटेरियन इवैक्युएशन कॉरिडोर) की तत्काल स्थापना का आग्रह किया है।
अपने अत्यंत महत्वपूर्ण ईमेल द्वारा भेजे गए पत्र में ज्यूडिशियल काउंसिल ने संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी शत्रुता के कारण बिगड़ती मानवीय स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। काउंसिल ने चेतावनी दी कि लगातार बढ़ती सैन्य कार्रवाई के चलते लाखों निर्दोष नागरिक—जिनमें विदेशी नागरिक, प्रवासी श्रमिक, छात्र तथा असहाय परिवार शामिल हैं—तत्काल खतरे में हैं।
पत्र में संयुक्त राष्ट्र से निम्नलिखित कदम उठाने का आग्रह किया गया है
नागरिकों की सुरक्षित निकासी हेतु अस्थायी मानवीय युद्धविराम की घोषणा और उसका सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
ज्यूडिशियल काउंसिल के अध्यक्ष राजीव अग्निहोत्री ने लिखा “ संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में एक निष्पक्ष निकासी गलियारा स्थापित किया जाए, जिसे किसी भी सैन्य कार्रवाई से संरक्षित रखा जाए।
निकासी की व्यवस्थाओं के समन्वय के लिए अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और मानवीय एजेंसियों को तैनात किया जाए।
स्वदेश लौटने के इच्छुक विदेशी नागरिकों के लिए सुरक्षित वायु और समुद्री मार्ग सुनिश्चित किए जाएं।
अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन के लिए सभी युद्धरत पक्षों को जवाबदेह ठहराया जाए।“
ज्यूडिशियल काउंसिल ने जोर देकर कहा कि मानवीय सिद्धांतों को भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं से ऊपर रखा जाना चाहिए। काउंसिल ने कहा, “युद्ध को मानवता की आवाज दबाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। राष्ट्रों के रणनीतिक टकराव में नागरिक कभी भी ‘कोलैटरल डैमेज’ नहीं बन सकते।”
काउंसिल को प्राप्त प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार हजारों नागरिक पर्याप्त चिकित्सा सुविधा, खाद्य सामग्री और सुरक्षित आश्रय के बिना फंसे हुए हैं। विशेष रूप से छात्र, बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे अत्यंत चिंताजनक स्थिति में हैं, जिनके पास सुरक्षित निकासी के स्वतंत्र साधन उपलब्ध नहीं हैं।
काउंसिल ने रेखांकित किया कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के सिद्धांतों के तहत सशस्त्र संघर्ष के समय नागरिकों की रक्षा करना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी है। सुरक्षित निकासी तंत्र स्थापित करने में विफलता नैतिक और कूटनीतिक लापरवाही के समान होगी।
ज्यूडिशियल काउंसिल ने महासचिव से यह भी आग्रह किया कि वे संबंधित संयुक्त राष्ट्र निकायों की आपात बैठक बुलाएं, ताकि राजनीतिक वार्ताओं से स्वतंत्र होकर केवल नागरिक सुरक्षा पर केंद्रित तत्काल मानवीय हस्तक्षेप को अधिकृत किया जा सके।
काउंसिल के वक्तव्य में कहा गया, “अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विश्वसनीयता संकट के समय निर्णायक कार्रवाई करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करती है। इतिहास वैश्विक नेतृत्व का आकलन चिंता व्यक्त करने वाले बयानों से नहीं, बल्कि जीवन बचाने के लिए उठाए गए ठोस कदमों से करेगा।”
काउंसिल ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से भी अपील की है कि वे इस निकासी पहल का समर्थन करें—जिसमें लॉजिस्टिक सहायता, हवाई क्षेत्र की अनुमति, आवश्यक होने पर नौसैनिक सुरक्षा और विस्थापित व्यक्तियों के लिए आपातकालीन वीजा सुविधा शामिल है।
न्याय, शांति और मानवीय संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए ज्यूडिशियल काउंसिल ने घोषणा की कि वह स्थिति पर लगातार नजर रखेगी और यह सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ संवाद जारी रखेगी कि नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहे।
“मानवता को शत्रुता पर विजय प्राप्त करनी ही होगी। निर्दोष जीवन दांव पर लगे
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