डीडीयू के गोरक्षनाथ शोधपीठ में योग पर आनलाईन व्याख्यान का संपन्न
गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पूनम टंडन के संरक्षण में महायोगी गुरु श्रीगोरक्षनाथ शोधपीठ द्वारा व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत ऑनलाइन व्याख्यान ‘योग यात्रा में क्रमिक विकास: चित्त वृत्ति, संस्कार और प्रज्ञा के विशेष सन्दर्भ में’ विषय पर संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारम्भ शोधपीठ के उप निदेशक डॉ. कुशलनाथ मिश्र के द्वारा मुख्य वक्ता के सामान्य परिचय एवं प्रस्ताविकी के साथ हुआ।
व्याख्यान के मुख्य वक्ता महाराजा सुहेल देव राज्य विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के शारीरिक शिक्षा विभाग के प्रो. प्रशांत कुमार राय ने योग के यात्रा में आने वाले विभिन्न पड़ावों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने चित्त, चित्त वृत्ति, संस्कार, प्रज्ञा, समाधि, ज्ञान, प्रज्ञान, संज्ञान, असंप्रज्ञान एवं संस्कार आदि योग के विभिन्न पदों को व्याख्यायित किया।
उन्होंने शरीर शुद्धि से चित्त शुद्धि की महत्व पर जोर दिया। वृति पर चर्चा करते हुए कहा कि बहु वृत्ति से कुछ वृत्ति, कुछ वृत्ति से एक वृत्ति और एक वृत्ति से शून्य वृत्ति के तरफ योग की यात्रा चलती है। ज्ञान के प्रति वैराग्य से ही असंप्रज्ञात की यात्रा तय की जाती है। चित्त वृत्ति का निरोध होने पर द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।
उन्होंने योग और व्यायाम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि योगसूत्र एवं हठयोग प्रदीपिका ही योग का मानक है। व्यायाम कब योग नहीं है। हमें शास्त्र परम्परा से सीखना चाहिए। अंत में उन्होंने विद्यार्थियों के पूछे गए प्रश्न का भी उत्तर दिया।
कार्यक्रम का संचालन शोधपीठ के रिसर्च एसोसिएट डॉ. सुनील कुमार व शोधपीठ के सहायक निदेशक डॉ. सोनल सिंह द्वारा धन्यवाद ज्ञापित किया गया।
शोधपीठ के सहायक ग्रन्थालयी डॉ. मनोज कुमार द्विवेदी, वरिष्ठ शोध अध्येता डॉ. हर्षवर्धन सिंह, चिन्मयानन्द मल्ल, डॉ. रितेंद्र नाथ पांडे, आशु आदि विद्यार्थी जुड़े रहे।
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