मऊ (राष्ट्र की परम्परा)। समय के साथ भले ही मिठाइयों के रूप बदल गए हों, लेकिन बताशे का महत्व आज भी कायम है। त्योहारों, धार्मिक अनुष्ठानों और मांगलिक कार्यक्रमों में बताशे का उपयोग एक पारंपरिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। धनतेरस, दीपावली और भैया दूज जैसे पर्वों पर चीनी से बने बताशे, खिलौने और मटकियों की मांग आज भी बनी हुई है।
विद्वानों का कहना है कि सत्यनारायण कथा, भैया दूज और अन्य व्रत-पूजाओं में बताशे के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। विशेष रूप से भैया दूज के दिन बहनें चीनी से बने खिलौनों और घरिया के साथ मां गौरी और भगवान गणेश की पूजा कर भाई की लंबी आयु की कामना करती हैं।
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पुरोहितों के अनुसार, बादाम या काजू की मिठाइयों का प्रयोग धार्मिक पूजा में वर्जित माना गया है। वहीं, व्यापारियों का कहना है कि बताशे का कारोबार सालभर चलता है, जबकि खिलौना और घरिया केवल दीपावली व भैया दूज के समय बनाए जाते हैं। हालांकि, चीनी की बढ़ती कीमतों के कारण कारोबार में थोड़ी मंदी आई है।
करीब ढाई दशक पहले तक जनपद के बाजारों में बताशों, घरिया और खिलौनों की रौनक अलग ही होती थी। कारखानों की भट्ठियाँ लगातार जलती रहती थीं और कारीगर दिन-रात काम करते थे। उस दौर में मेहमानों को पानी के साथ बताशा परोसना परंपरा थी, वहीं मांगलिक कार्यों और लड़कियों की विदाई में झपोली में बताशे देना शुभ माना जाता था। हालांकि अब यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।
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