बहराइच (राष्ट्र की परम्परा)। यह कहानी है बहराइच जनपद मुख्यालय से लगभग 120 किलोमीटर दूर विकास खण्ड मिहीपुरवा के भारत-नेपाल सीमा एवं कतर्नियाघाट वन्यजीव विहार के बीच बसे थारू जनजाति बाहुल्य गांव फकीर पुरी के प्रतिमा स्वयं सहायता समूह की दीदियों की। स्वयं सहायता समूह का गठन सितम्बर, 2018 में बिहार आजीविका मिशन से आई दीदियों ने किया था। इस स्वयं सहायता समूह में कुल 11 दीदियां जुडी जिसमें कुछ अलग करने की लगन थी। समूह में जुडने के बाद राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से इनकों रिवाल्विंग फण्ड के रूप में सामुदायिक निवेश निधि के रूप में रू. 1,50,000 दिये गये।
समूह की दीदियों से जब रोजगार एवं प्रशिक्षण के विषय में बात की गई तो इन लोगो ने अपने परम्परागत उत्पादों को बनाने एवं उसको अलग पहचान दिलाने में रूचि दिखाई। इसी कड़ी में वर्ष 2023 में विश्व प्रकृति निधि (डब्लूडब्लूएफ) के माध्यम से 15 दिवस एवं वर्ष 2024 में 10 दिवस का परम्परागत उत्पाद जैसे डलिया जूट बैग, कैप, हैडबैग, टोकरी, रोटी बॉक्स एवं फूलदान बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण प्राप्त करने के उपरान्त समूह की सभी दीदीयां जूट एवं जल कुम्भी से उपरोक्त सभी उत्पाद बना रही है। यह पर्यावरण के अनूकूल भी है। आज इस समूह की दीदियां स्वयं तो आत्मनिर्भर है। साथ ही अपने आस-पास के अन्य समूहों की दीदियों को भी प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बना रहीं हैं। इस समूह की दीदियों द्वारा आज अपने उत्पाद की बिक्री कतर्नियाघाट वन्यजीव विहार आने वाले पर्यटकों के अलावा अन्य स्थानों पर भी की जा रही है। सम्पूर्णता अभियान अन्तर्गत आडिटोरियम परिसर में भी समूह की दीदियों द्वारा स्टाल लगाकर अपने उत्पादों की बिक्री की जा रही है।
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