28 नवंबर : इतिहास में अमर हुए वे महान व्यक्तित्व जिनके योगदान आज भी प्रेरणा देते हैं
भारत के इतिहास में 28 नवंबर का दिन कई महान विभूतियों को स्मरण करने का अवसर प्रदान करता है। समाज सुधार, साहित्य, सिनेमा, संगीत और सामाजिक चेतना के विविध क्षेत्रों में असाधारण योगदान देने वाले इन व्यक्तित्वों की जीवन-यात्रा आज भी प्रेरणा का स्रोत है। उनके संघर्ष, विचार और कृतित्व भारतीय समाज को नई दिशा देते हैं। आइए जानते हैं उन महान नामों के बारे में, जिन्होंने अपने जीवन से इतिहास में अमर स्थान बनाया।
- महात्मा ज्योतिबा फुले (निधन: 28 नवंबर 1890)
महाराष्ट्र के सतारा जिले के कटगुण गाँव में जन्मे ज्योतिबा फुले समाज सुधार, शिक्षा विस्तार और महिला अधिकारों की आवाज बने। साधारण कृषक परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने प्रचलित जातिगत भेदभाव को खुलकर चुनौती दी। पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर उन्होंने भारत का पहला बालिका विद्यालय पुणे में स्थापित किया। उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना कर शोषित वर्गों के लिए सम्मान और समानता की लड़ाई लड़ी। भारत के सामाजिक पुनर्जागरण में उनका योगदान अमिट है और 28 नवंबर का दिन उनके क्रांतिकारी विचारों को स्मरण करता है। - ये भी पढ़ें –शास्त्र: ज्ञान, तर्क और परंपरा का शाश्वत आधार
- देवनारायण द्विवेदी (निधन: 1989)
उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद में जन्मे देवनारायण द्विवेदी हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित उपन्यासकारों में गिने जाते हैं। साहित्यिक चेतना से भरपूर उनका लेखन ग्रामीण समाज, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ का गहरा चित्रण करता है। विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने साहित्य को जीवन का माध्यम बनाया। उनकी कथाशैली में सहजता, संवेदनशीलता और यथार्थ का गहरा संवाद मिलता है। हिंदी उपन्यास विधा को समृद्ध करने में उनका योगदान अत्यंत मूल्यवान माना जाता है। - बी. एन. सरकार (निधन: 1980)
पूर्वी बंगाल में जन्मे बिरेंद्रनाथ सरकार भारतीय फिल्म उद्योग के प्रेरक स्तंभ थे। उच्च शिक्षा प्राप्त बी.एन. सरकार ने कोलकाता में न्यू थियेटर्स की स्थापना करके भारतीय सिनेमा को नई दिशा दी। उनकी कंपनी ने हिंदी और बंगाली फिल्मों के स्वर्णिम युग को आकार दिया और के.एल. सहगल जैसे दिग्गज कलाकारों को मंच दिया। तकनीकी नवाचार, संगीत प्रधान फिल्मों और कहानी-प्रधान सिनेमा को बढ़ावा देने में उनका योगदान निर्णायक रहा। भारतीय फ़िल्म इतिहास में उनका नाम सदा सम्मानपूर्वक लिया जाता है। - सी. डे (निधन: 1962)
बंगाल के एक साधारण परिवार में जन्मे सी. डे दृष्टिहीन होते हुए भी संगीत जगत के चमकते नक्षत्र बने। पारंपरिक संगीत शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने गायन के क्षेत्र में अपनी अनूठी आवाज, भावपूर्ण प्रस्तुति और समृद्ध बंगाली संगीत संस्कृति के माध्यम से पहचान बनाई। उनकी रचनाओं में समर्पण, भक्ति तथा लोकसंगीत की झलक मिलती है। दृष्टिबाधा के बावजूद उन्होंने अपनी कला से लाखों मनों में आशा और आत्मविश्वास जगाया। भारतीय संगीत में उनका योगदान प्रेरणा और संघर्ष की जीवंत मिसाल है। - भालजी पेंढारकर (निधन: 1994)
महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में जन्मे भालजी पेंढारकर मराठी फिल्म उद्योग के स्तंभ माने जाते हैं। कोल्हापुर की सांस्कृतिक विरासत के बीच पले-बढ़े पेंढारकर ने ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों पर दर्जनों फिल्में बनाईं। उन्होंने निर्देशन और निर्माण दोनों क्षेत्रों में उच्च स्तर स्थापित किया। छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित उनकी फिल्मों ने मराठी समाज में नई चेतना जगाई। भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा को मजबूत पहचान दिलाने में उनका योगदान अतुलनीय है। - शंकर शेष (निधन: 1981)
मध्य प्रदेश के जबलपुर में जन्मे शंकर शेष हिंदी रंगमंच और सिनेमा लेखन के महत्वपूर्ण स्तंभ थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने नाटक लेखन को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। उनके प्रसिद्ध नाटक एक और द्रोणाचार्य, आधे अधूरे और रक्तपात सामाजिक विडंबनाओं और मानवीय संघर्षों को सशक्त तरीके से प्रस्तुत करते हैं। सिनेमा कथालेखन में भी उन्होंने अपनी मौलिकता का परिचय दिया। हिंदी नाट्य साहित्य में उनका नाम सृजनशीलता का प्रतीक माना जाता है।