नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा )बुधवार को राज्यसभा में “लोक भवन नाम विवाद” (राजभवन का नाम बदलकर लोक भवन) पर तीखी बहस देखी गई। विपक्षी नेता और कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे ने किसी एक पक्ष विशेष की ओर इशारा करते हुए सभापति सी.पी. राधाकृष्णन से कहा कि यह मामला पूरे “लोक भवन नाम विवाद” से जुड़ा है, और इस पर चर्चा केवल एक सांसद तक सीमित क्यों रही। उन्होंने स्पष्ट किया कि “संसद नहीं चल रही, बुलडोजर चल रही है” जैसा माहौल खड़ा करना लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन है।
इस बहस की शुरुआत तब हुई जब तृणमूल कांग्रेस की सांसद डोला सेन ने “लोक भवन नाम विवाद” के सिलसिले में आवाज उठाई। उन्होंने आरोप लगाया कि राजभवन का नाम बदलने से पहले राज्य सरकारों से सलाह-मशविरा तक नहीं किया गया, जबकि राजभवन का खर्च वर्षों से राज्य सरकार उठा रही थी। सेन ने कहा कि इस कदम को “एक समानांतर सरकार” के गठन और पार्टी विस्तार की रणनीति का हिस्सा बताया जा सकता है। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार पर पश्चिम बंगाल का विकासकोंष, मज़दूर योजना, चक्रवात राहत व ग्रामीण आवास के लिए लंबित भुगतान न करने का आरोप लगाया।
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उनकी बातों के बाद, बीजेपी सांसद जेपी नड्डा ने राज्यसभा सभापति से अनुरोध किया कि वे डोला सेन के विवादित बयानों की जांच करें और जो भी विषय से असंबंधित हों, उन्हें रिकॉर्ड से हटाया जाए। इस पर खड़गे ने सवाल दागा कि क्या संसदीय लोकतंत्र इसी प्रकार चलेगा, जहाँ चर्चा का दायरा सीमित कर देना लोकतंत्र का अपमान है।
“लोक भवन नाम विवाद” अब केवल बंगाल या एक राज्य का मसला नहीं रह गया है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक परंपरा और संसदीय मर्यादा पर एक बड़ा सवाल बन चुका है। विपक्ष ने चेताया है कि यह कदम केवल एक नामकरण नहीं — बल्कि संवैधानिक जमीनी अस्थिरता की शुरुआत हो सकता है।
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