पिता तो साक्षात वट वृक्ष होते हैं,
अंदर से नर्म प्रत्यक्ष सख़्त होते हैं,
अब जब नहीं हैं वह इस संसार में,
बस स्मृतियाँ आती हैं मेरे ज़ेहन में।
ज़िंदगी का जोड़ घटाना गुणा भाग
पहले का ठीक नहीं कर सकते हैं,
परंतु अब आज सही राह पर चल
कर जीवन में सुधार ला सकते हैं।
समस्याओं का बोझ कपास से
भरे एक गट्ठर की तरह होता है,
जो देखने में बहुत बड़ा लगता है,
हल करने में समाधान हो जाता है।
इस दुनिया का दस्तूर देखिये,
कितने अच्छे काम कर लीजिये,
लोग वह सब कुछ भूल जाते हैं,
अपनी ज़रूरत पर याद करते हैं।
मददगार, वफादार व साफ़दिल,
आदित्य तीनों सदा परेशान रहते हैं,
यह सदा सत्य का सहारा लेते हैं,
किसी से कभी धोखा नहीं करते हैं।
इंसान की वाणी और उसका धन
दोनों में यदि अहंकार का भाव हो,
इंसान – इंसान से दूर हो जाता है,
इंसान में इन तत्वों में अतिरेक हो।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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