नाना पाटेकर के अभिनय, संवेदनाओं और अद्भुत संवाद अदायगी को समर्पित भावपूर्ण कविता
जिस आवाज़ में था सच का साहस,
जिस आँखों में दर्द का एहसास,
जिसके संवादों में जीवन बोलता था,
हर किरदार में एक इंसान डोलता था।
‘परिंदा’ में संघर्ष की ज्वाला थी,
‘तिरंगा’ में देशभक्ति की मशाल थी।
‘प्रहार’ में स्वाभिमान की हुंकार,
‘क्रांतिवीर’ में गूँजा जन-जन का विचार।
‘अग्निसाक्षी’ में संवेदनाओं की गहराई,
‘खामोशी’ में दर्द की सिसकियाँ समाई।
‘अब तक छप्पन’ में सख्त मिज़ाज का चेहरा,
‘वेलकम’ में हँसी ने दिलों को घेरा।
जब ‘नटसम्राट’ बनकर मंच पर आए,
तो लगा, जैसे रंगमंच स्वयं बोल उठे।
संवाद नहीं, मानो जीवन की कहानी थी,
हर आँख में भावों की रवानी थी।
कभी आग बने, कभी आँसू बनकर बहे,
कभी हँसी बनकर दिलों में चुपके से रहे।
उनकी कला में केवल अभिनय नहीं,
हर किरदार में जीवन की सच्चाई रही।
पर्दे पर किरदार अनेक निभाए,
हर रूप में अपने निशान छोड़ आए।
कलाकार की पहचान तालियों से नहीं,
दिलों में उसकी जगह से होती है कहीं।
पर्दा गिरा तो क्या, कहानी कहाँ थमती है,
सच्ची कला कभी समय से नहीं हारती है।
नाना की आवाज़, अंदाज़ और अदाकारी,
यादों में रहेगी उनकी दुनिया सारी।
पर्दा गिर गया, मगर किरदार अमर हो गए,
संवाद ख़ामोश हुए, मगर एहसास अमर हो गए।
कला के इस सफ़र को सलाम बार-बार,
नाना पाटेकर—अभिनय की एक अनोखी मिसाल!
— संजय एम. तराणेकर
(कवि, लेखक एवं समीक्षक)
इन्दौर–452011, मध्य प्रदेश
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